मैरी पिकफोर्ड…वो दुनिया की पहली महिला सेलेब्रिटी थी

1911 में विलियम डेमिल ने अभिनय के इतिहास की सबसे बचकानी भविष्यवाणी की थी. विलियम ने थिएटर छोड़ने वाली एक बच्ची को लेकर कहा था कि, “वो 17 साल से अधिक की नहीं है. और अभी से वो थिएटर का अपना अच्छा खासा करियर खाक में मिलाकर सस्ते मनोरंजन की दुनिया में जा रही है.”
विलियम ने कहा था, “वहां न उसे पैसा मिलेगा, न शोहरत. मैरी पिकफोर्ड को अलविदा कहिए क्योंकि अब आप उसके बारे में दोबारा कभी नहीं सुनेंगे.”
आज से एक सदी से भी ज्यादा पहले विलियम डेमिल ने सिनेमा में काम करने जा रही जिस किशोरी के बारे में ये भविष्यवाणी की थी, उसका नाम था मैरी पिकफोर्ड.
मैरी ने विलियम की भविष्यवाणी को न सिर्फ़ झुठलाया बल्कि उनके मुंह पर कालिख भी पोत दी थी. वो चार साल के भीतर ही दुनिया की सबसे मशहूर महिला बन गई थीं. वो दुनिया की पहली महिला सेलेब्रिटी थीं.
और ऐसा केवल नाम, तस्वीर, स्केच या सम्मान के लिए नहीं था. बल्कि उनकी सहज सरल मुस्कान की वजह से भी हुआ, जिसने करोड़ों दिल जीत लिए था.
जिसने भी मैरी पिकफोर्ड को बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों की फ़िल्मों टेस ऑफ द स्टॉर्म (1914), रैग्स (1915) में देखा है, उन्हें पता है कि वो कैसी मासूम दिखती थीं. बचकानी पोशाकें, मासूमियत भरी बेगुनाह सी शक्ल के करोड़ों शैदाई थे. मैरी अपने उसी अक्स में हमेशा के लिए बंध गईं.
उनके छल्लेदार बाल उस वक्त 50 डॉलर के पड़ते थे. जब फिल्म का टिकट कुछ पैसों का हुआ करता था. वो घुंघराले बाल तो उनके थे. मगर, मैरी खुद सारी दुनिया की थीं.
अनजाने लोग उनके हैट से फूल चुरा लिए करते थे. जब वो फिल्मों में नंगे पांव भागती दिखतीं, तो न जाने कितने दिलों को चोट पहुंचती थी. जब एक बच्चे ने उनके नाखून देख लिए, तो वो दौड़ कर अपनी मां को ये बताने गया कि मां वो बच्ची नहीं है. उसके नाखून बड़े-बड़े हैं. इसके बाद मैरी पिकफोर्ड ने अपने नाखून काट लिए.
वो फिल्मों में भी पेंसिल से खिलवाड़ करते हुए उसे अपने होंठों से नहीं लगाती थीं. इसलिए ताकि कोई ये न समझ ले कि वो सिगरेट पीती हैं.
उनसे कभी न मिलने वाली महिलाएं भी उनसे हजारों डॉलर मांगती थीं. और, पैसे नहीं दिए तो वेश्यावृत्ति शुरू करने की धमकी दे डालती थीं और कहतीं कि ये मैरी की ग़लती है.
रेशम भी, फौलाद भी
आज की अभिनेत्रियां चाहती हैं कि उन पर हजारों लोगों की निगाह पड़े. इस ख्वाहिश का आविष्कार मैरी पिकफोर्ड ने ही किया था. लेकिन, मैरी ने इस शोहरत के लिए कड़ी मेहनत की थी. उन्हें मेहनत करना ही तो आता था.
अगर आप मैरी से ये पूछते कि जनता उनकी इतनी दीवानी क्यों है, तो वो यही जवाब देतीं कि उन्हें कोई मुगालता नहीं है कि वो हॉलीवुड की सबसे काबिल और खूबसूरत अभिनेत्री हैं.
कैमरामैन उन्हें “बंदरिया वाली शक्ल की लड़की” कहते थे. मैरी को पता था कि वो हल्के-फुल्के मनोरंजन वाली फिल्मों के लिए ही ठीक हैं. न कि दुखद कहानियों के लिए.
लोगों को उनकी नरमदिली और मजबूत इरादों का कॉकेटल बहुत अच्छा लगता था. ‘द लिटिल प्रिंसेज’ (1917), ‘डैडी लॉन्ग लेग्स’ (1919) जैसी फिल्मों में उनके किरदार को मजलूम दिखाया गया था. वो गरीब के रोल में थीं. या फिर अमीरी से गुरबत में आ गईं. वो अनाथ के रोल में आईं और परिवार से बिछड़ी लड़की का किरदार जिया. लेकिन, उनका कोई भी किरदार पर्दे पर हार मानता नहीं दिखता था.
हॉलीवुड सिनेमा में बुनियादी बदलाव लाने का श्रेय मैरी को ही दिया जाता है. वो हॉलीवुड की आत्मा थीं. जंग पर जाने वाले सिपाही अपने लॉकेट में उनकी तस्वीरें लगाया करते थे. वो पुराने दौर की दिखती थीं, पर नए दौर की प्रतीक थीं. वो फिल्मों में हवाई जहाज़ में उड़ने वाली पहली अभिनेत्री थीं.
उन्होंने ही स्पॉट लाइटिंग का आविष्कार किया, ताकि खुद को और जवां दिखा सकें. मैरी पिकफोर्ड से पहले फिल्मी दुनिया बदनाम हुआ करती थी. शायद इसीलिए जब मैरी ने थिएटर छोड़ा, तो विलियम डेमिल सकते में आ गए और उनकी तबाही की भविष्यवाणी कर डाली थी.
लेकिन, हॉलीवुड ने मैरी को बर्बाद नहीं किया, बल्कि उन्होंने हॉलीवुड में नई जान डाल दी.
वैसे, बचपन में मैरी ने कभी भी हॉलीवुड पर राज करने का ख्वाब नहीं देखा था. जब मैरी पिकफोर्ड पांच बरस की थीं, तब तक उनका नाम नहीं बदला था. तब मैरी को ग्लैडस स्मिथ के नाम से ही जाना जाता था.
उनकी विधवा मां शार्लोट ने उन्हें एक घुमंतू थिएटर ग्रुप के साथ जाने दिया. एक्टिंग के बदले में मैरी को कुछ पैसे और ढेर सारी तारीफ मिलती थी.
पैसे की परिवार को सख्त ज़रूरत थी. वो अपने गालों में पिन चुभोकर ख़ुद को गुलाबी गाल वाली हीरोइनों जैसा दिखाने की कोशिश करतीं. मुफ़लिसी के दौर में मैरी के लिए कभी स्कूल जाना मयस्सर न हुआ. मैरी ने सड़कों पर लगे इश्तिहारों के बोर्ड से पढ़ना सीखा.
ब्रॉडवे थिएटर में 15 बरस की उम्र में एक नाटक करते हुए ही मैरी की मुलाक़ात विलियम डेमिल से हुई थी. विलियम का छोटे भाई भी उसमें एक रोल कर रहा था. बाद में दोनों भाइयों ने हॉलीवुड में ख़ूब शोहरत बटोरी.
1910 में मैरी पिकफोर्ड हॉलीवुड पहुंची थीं. हॉलीवुड को तो उसका नाम भी इसके एक महीने बाद ही मिला. उन्हें पहला मौक़ा दिया डी डब्ल्यू ग्रिफिथ की कंपनी ने.
फैन्स का जमावड़ा
फिल्मों में आने का फ़ैसला मैरी का नहीं, उनकी मां शार्लोट का था. मैरी को उम्मीद थी कि ग्रिफिथ उन्हें देखते ही मना कर देंगे. लेकिन, उस दौर में फ़िल्में बदनाम थीं. लिहाज़ा निर्देशकों को अभिनेत्रियां मुश्किल से ही मिलती थीं.
सो ग्रिफिथ ने मैरी को देखते ही हां कर दी. दोनों के बीच लव-हेट का रिश्ता लंबे वक़्त तक रहा. ये मैरी ही थीं, जो ग्रिफिथ के सामने खड़े होने और उन्हें ना करने का साहस दिखा सकीं.
दोनों के मेल से बनी ‘विलफुल पेगी’ बेहद कामयाब रही. मैरी मशहूर हो गई थीं. जब तीन फैन्स ने उन्हें पहचान लिया, तो मैरी ने ग्रिफिथ से अपनी फीसद 5 डॉलर बढ़ाने को कहा. ग्रिफिथ ने मना किया तो मैरी ने उनकी कंपनी छोड़ दी.
कुछ ही साल के अंदर मैरी सालाना 5 लाख 60 हज़ार डॉलर कमा रही थीं. इसका तीन चौथाई हिस्सा वो पूरी ईमानदारी से बचाती थीं.
इतने पैसे कमाने के लिए मैरी केवल खुद और अपने फैन्स के प्रति वफ़ादार हो सकती थीं. इसीलिए वो किसी एक स्टूडियो के साथ बंधना नहीं चाहती थीं. बेहतर ऑफ़र मिलते ही मैरी पुरानी कंपनी छोड़ देती थीं.
इसीलिए जब 103 फ़िल्मों के बाद ग्रिफ़िथ ने उन्हें अपनी टांगों की नुमाइश के लिए कहा, तो मैरी ने कंपनी ही छोड़ दी थी.
दर्शकों के प्रति वफ़ादार रहने के लिए उन्हें हमेशा अपनी मासूमियत बनाए रखनी पड़ती थी. इसके लिए वो लाख जतन करती थीं.
मैरी ने अपने ही अंदाज़ में बग़ावत की. उन्होंने पहले अपने से ज़्यादा उम्र के अभिनेता ओवेन मूर से ब्याह किया, ताकि ये साबित कर सकें कि वो भी वयस्क हो चुकी हैं.
जब पार्टियों में ओवेन मूर उनका अपमान करने लगे, तो उन्होंने मूर से नाता तोड़ लिया. इसके बाद मैरी ने डगलस फेयरबैंक्स के साथ घर बसाया. लेकिन, मैरी को बदनामी का इतना डर था कि उन्होंने तीन साल तक ओवेन मूर से तलाक़ नहीं लिया.
उन्होंने बेवर्ली हिल्स में अपने आलीशान घर को पार्टियों का अड्डा बना लिया. वहां आने वालों में आइंस्टाइन, जॉर्ज बर्नाड शॉ, हेलेन केलर, एचजी वेल्स, एमेलिया इयरहार्ट और फेयरबैंक्स के पक्के दोस्त चार्ली चैपलिन शामिल थी.
शादी करने से पहले ही फेयरबैंक्स और मैरी ने मिलकर यूनाइटेड आर्टिस्ट्स नाम से कंपनी बना ली थी ताकि बड़ी कंपनियों के हाथों कलाकारों का शोषण होने से रोक सकें. वो ये भी साबित करना चाहती थीं कि महिलाओं को फिल्म कारोबार की ज़्यादा समझ है.
यूनाइटेड आर्टिस्ट्स कंपनी में मैरी के दोस्त और दुश्मन ग्रिफिथ भी शामिल हुए और चार्ली चैपलिन भी साझीदार बने. हालांकि मैरी को चैपलिन से चिढ़ दी थी कि ये मसखरा इंसान उनसे दोगुने पैसे कमाता है. लेकिन, मैरी ने अपनी अना को किनारे रखा और बड़े हित के लिए चैपलिन को साझीदार बनाया.
मैरी, जो कभी भी स्कूल नहीं गई थीं, उन्होंने हॉलीवुड को सिखाया कि बड़ा स्टार कैसे बनता है.
मैरी पिकफोर्ड ऑस्कर देने वाली 1927 में बनी संस्था एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स ऐंड साइंसेज़ की संस्थापक सदस्यों में से एक थीं.
जब मूक फ़िल्मों का दौर ख़त्म हुआ और फ़िल्मों को आवाज़ मिली, तब तक छोटी मैरी उम्र के चालीसवें पड़ाव तक पहुंच गई थीं. उनकी फ़िल्में पहली बार फ्लॉप होने लगी थीं. तब मैरी ने फ़िल्मी दुनिया को अलविदा कहने का फ़ैसला किया.
लेकिन, इससे पहले उन्होंने बेहतरीन अभिनेत्री का दूसरा ऑस्कर पुरस्कार जीत लिया था. उन्हें 1929 की फ़िल्म ‘कॉक्वेट’ के लिए ये पुरस्कार मिला था.
उन्होंने आराम की ज़िंदगी बिताने के लिए काफ़ी पैसे कमा लिए थे. उन्होंने विलियम डेमिल के शब्दों को सही साबित करते हुए अपना पूरा करियर मिट्टी में डाला.
इसके बाद वो फ़िल्म निर्माता और समाजसेवी का किरदार निभाने के लिए तैयार थीं.
मैरी ने कहा कि, “मेरे साथ मेरी फ़िल्में भी जाएंगी.” अब, मासूम मैरी पिकफोर्ड को कोई नहीं भुला सकेगा.
-BBC

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