सनातन धर्म में तो सेवा ही है धर्म का आधार और सार

सभी धर्मों में “सेवा” के महत्व का बहुत ही विस्तार से उल्लेख है। सनातन धर्म में तो सेवा को धर्म का सार बताया गया है। जीवमात्र और प्रकृति की सेवा का भाव सनातन धर्म की पूजा पद्धति और मान्यताओं में निहित है। सनातन धर्म में सेवा और धर्म को पृथक कर नहीं समझा गया है। यह भी कह सकते हैं कि यदि सनातन धर्म में पूर्ण निष्ठा है, तो आचरण में किसी भी अंश में हो, सेवा भाव रहेगा ही। ”सेवा धर्म का आधार है” सनातन धर्म में इस भाव को बड़े ही विस्तार से उद्घाटित और प्रतिष्ठित किया है। संतजन अपने तप के प्रताप से बिना किसी प्रत्यक्ष सेवा कार्य के भी निरन्तर धर्म, प्रकृति और मानवता की सेवा करते रहे हैं। उनके आचरण और तपोनिष्ठ जीवन में एकमात्र परोपकार और सेवा का भाव ही दिखायी देता है, ऐसे अनेक प्रसंग शास्त्रों में उल्लिखित भी हैं।

किसी के सेवा कार्यों को देख कर उसके धार्मिक अथवा अधार्मिक होने की धारणा नहीं बनायी जा सकती किंतु इसमें संदेह नहीं कि धर्मपरायणजन जो भी कार्य करेंगे, उसमें सेवा का भाव अवश्य निहित होगा। अनेक दंत कथाओं में स्पष्ट वर्णन है कि अधार्मिक जन भी अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए सेवा का ढोंग बड़े जोरशोर से करते रहे हैं। सत्य है कि सेवा धर्म का सार है, परमात्मा का मार्ग है परन्तु ”सेवा परमो धर्म:” के भाव को समझना और धारण करना सहज नहींं है।

किसी महापुरुष का मत है धर्म से सेवा का भाव उत्पन्न होता है किंतु सेवा से धर्म उत्पन्न नहीं हो सकता। ईसाई धर्म में सेवा पर बहुत ज़ोर दिया है और सेवा को ही परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बताया गया है। स्वयं जीसस ने सेवा भाव को परमात्मा की प्राप्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना है। जीसस की सेवा प्रेम का ही एक रूप है, या कहें प्रेम की पर्यायवाची है। जिस सेवा को जीसस ने परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बताया है, वह तो जीसस के प्रेम में निष्पादित हो रही है। सेवा, निर्मल भाव है और जहां इसमें कोई अर्थ अथवा स्वार्थ जोड़ दिया, सेवा का निर्मल भाव समाप्त हो जाएगा।

जीवन में परमात्मा के लिए प्रेम है तो सेवा सहज ही होती रहेगी। जीसस का प्रेम तो दरिद्र के अंत: में विराजमान परमात्मा से था, न क‍ि उसकी ग़रीबी और अभाव में। ऐसी सेवा में दया का भाव नहीं अपितु हर श्वास के साथ प्रेम प्रकट हो रहा होगा। कितनी विडम्बना है कि सेवा निष्पादित हो सके इसके लिए लम्बे समय से ईसाई मिशनरीज़ सारे विश्व के जंगल, पहाड़, मैदान सभी में घूम-घूम कर भोलेभाले अनपढ़, गरीब और आदिवासी खोज रही हैं अथवा गरीब को सीढ़ी बना कर परमात्मा को खोज रही हैं।

भावान्तर से यदि ग़रीबी मिट गयी तो फिर तो ऐसे धार्मिक जन का परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग ही बंद हो जाएगा क्या? यह तो जीसस की प्रेममय सेवा नहीं हो सकती कि भोजन और कपड़ा देकर धर्म ही परिवर्तन करा दो। यह तो सेवा का आवरण मात्र है। निष्काम सेवा भाव धर्म का एक रूप है किंतु किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए की जा रही सेवा तो समाज के स्वरूप और विश्व बंधुत्व के भाव को ही खंडित कर रही है। सन्तोष के परमानन्द में अपना जीवन व्यतीत कर रहे वनवासियों के जीवन में सेवा के ढोंग से असन्तोष का बीजारोपण कर दिया तो इसमें कौन सी सेवा का भाव उत्पन्न हो रहा है, जो परमात्मा का मार्ग है।

भौतिकवादी विचारधारा उन पर थोपे बिना स्वार्थ सिद्ध हो नहीं हो सकते, भले ही उनका धर्म परिवर्तन कराना हो अथवा प्राकृतिक संसाधनों का दोहन। यह निर्विवाद सत्य है कि अनेकानेक स्वार्थपरक कारणों से जंगल और वहाँ के मूल निवासी सदैव ही कथित विकसित जगत के निशाने पर रहे हैं।

विश्वभर के जंगलों में अपनी ही मस्ती, अपनी ही दुनिया में आनन्द से जीवन बिता रहे लोगों ने ऐसे ही सेवाभावी सेवकों पर भरोसा किया था, इन्होंने पहले तो उनके धर्म और मान्यताओं को छीन लिया और अब वो लोग अपने संसाधन-अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। क्या मिला ऐसी सेवा से ? मात्र असंतोष और दुःख। कोई एक उदाहरण नहीं है, जहां ऐसी कथित सेवा ने वहाँ की मूल सभ्यता का संरक्षण अथवा संवर्धन किया हो। जहां जहां ऐसे सेवक पहुँचे वहाँ की मूल संस्कृति और परम्परागत ज्ञान को ही नष्ट कर दिया और वहाँ के अधिकांश मूल निवासी आज भी भीषण कष्ट में जी रहे हैं। सेवा भाव से गए ग़रीबों और वनवासियों के बीच पहुँचे कथित सेवक, आज शासक बने बैठे हैं।

पाश्चात्य जगत के एक सम्मानित प्रसिद्ध चिंतक बर्ट्रेड रसेल ने जब आदिवासियों को जंगल में अपनी प्रसन्नता में झूमते अपनी ही मस्ती में नृत्य करते हुये देखा तो आश्चर्यचकित होते हुए कहा कि ऐसी अदभुत चाँदनी रात में , इतना उद्दाम नृत्य और गायन यदि मैं भी सीख सकूँ तो मैं अपना सारा ज्ञान-सम्पदा दाँव पर लगाने को तैयार हूँ। कल्पना कीजिए आदिवासियों के जीवन में उस संतुष्टि और प्रसन्नता की, जिसको देख कर बर्ट्रेड रसेल जैसे प्रतिष्ठित चिन्तक को अपनी समस्त उपलब्धियाँ, अपना समस्त वैभव फीका लगने लगा और वो तैयार था अपना सब कुछ दाँव पर लगाने के लिए ; उस पवित्र प्रसन्नता और संतुष्टि के लिए, जो उसने देखी या कहें खोजी आदिवासियों के जीवन में।

बर्ट्रेड रसेल कह रहा है कि सब कुछ जो अर्जित किया है, उसकी क़ीमत पर यदि यह मस्ती आ जाए जीवन में तो सौदा महँगा नहीं है और वह यह भी जानता है क‍ि सब कुछ देकर भी इस आनन्द को ख़रीदा नहीं जा सकता। जिनकी सोच और ज्ञान पर लाखों लोगों ने भरोसा किया है, उसी बर्ट्रेड रसेल को आदिवासियों के जीवन में उस संतुष्टि और प्रसन्नता के सामने अपनी समस्त भौतिक और बौद्धिक सम्पदा तुच्छ लग रही है। प्रसिद्धि‍ और सम्पन्नता के मुक़ाम पर पहुँच कर भी वो तत्पर है सब कुछ त्याग कर उस आनन्द को प्राप्त करने के लिए। वनवासियों के उसी आनंद को बिना समझे या कहें स्वयं की मूर्खतापूर्ण धारणाओं अथवा स्वार्थ के कारण नष्ट करना पुण्य का मार्ग है या परमात्मा का?

भौतिकवादी समझ ही नहीं सकते उस सम्पन्नता को जो संतुष्टि में ही दिख सकती है। आज जब कोरोना के क़हर से कंपकंंपा रहे हैं तो ढूँढ रहे हैं एकान्त और बना रहे हैं भौतिक जीवन से दूरी और जब अपने पर आन पड़ी तो जीवनशैली की नयी नयी व्याख्यायें हो रही हैं।

सेवा तो एक सहज भाव है, जिसकी निष्पत्ति प्रेम से ही हो सकती है। सोच विचार और योजनाबद्ध तरीक़े से की जा रही सेवा तो घातक भी सिद्ध हो सकती है। ऐसे कथित समाजसेवी तो समाज का जितना अहित करते हैं उतना तो अन्य नहीं कर सकते। समाज सेवा ऐसे अहंकारियों के लिए एक व्यवसाय है। स्वार्थवश विनम्र भाव से सेवा में लगे ऐसे समाजसेवक के अहंकार को देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि सेवक भी सेवा के माध्यम से स्वामी बनने के प्रयास में ही लगा हुआ है। किसी स्वार्थ पूर्ण उद्देश्य अथवा प्रभुत्व के लिए किए जा रहे सेवा कार्य भ्रम उत्पन्न करते हैं और यही भ्रम अंतोगत्वा समाज का अहित करते हैं।

प्रेम के अतिरिक्त दया और करुणा के भाव को भी सेवा के साथ जोड़ कर देखा जाता है। ऐसे सेवा कार्यों में प्रेम-दया अथवा करुणा के भाव को समझना नितान्त असम्भव ही है।

यह सब भाव एक नही हैं। दया के प्रकट होने के लिए तो कोई माध्यम होना चाहिए। किसी दीन दुखी को देख कर जो सहायता की, यह करुणा नही अपितु दया है। जब उसको देखा तभी दया का भाव आया और कुछ मदद कर दी। यदि वह दीन दुखी न दिखता तो सेवा का भाव पैदा ही नहींं होता, यह जो दया है यह अन्य पर निर्भर है। यह भी समझना होगा कि बिना प्रेम के तो दया में भी अहंकार छुपा है। दया तो प्रायः अपने से कमजोर पर ही प्रकट होगी और इसमें दाता का अहंकार छुपा है। दया की तुलना भिक्षा से करें तो अतिशयोक्ति नहींं हो सकती।

जब हृदय में परमात्मा और प्रकृति के लिए निरंतर कृतज्ञता और प्रेम का भाव बना हुआ है और कोई दीन दुखी देख कर हृदय में उसके लिए प्रेम उमड़े और जो पास में है उसको ईश्वर की कृपा समझ कर उसकी सहायता करने में संतुष्टि और आनंद मिले तो यही प्रेम से सेवा है क्योंकि भाव में तो दरिद्र नारायण हैं कोई अन्य अपेक्षा अथवा कामना नही है।

सेवा का निर्मल भाव मात्र प्रेम में ही निहित है। सेवा को कर्तव्य समझ कर करो तो कर्तव्य पालन तो बोझ ही लगता ही है, किंतु हृदय में यदि प्रेम है और सेवा कर रहे हो तो कभी बोझ नही लगेगी।

जब तक दया और प्रेम का भेद नही समझेंगे, जीवन में प्रेम रस का प्रवाह नही होगा। पुत्र दया कर रहा है अपनी माँ पर , माँ स्वयं को बोझ समझ रही है क्योंकि उसे प्रेम चाहिए, दया नही। पति दया कर रहा है पत्नी पर , पत्नी तृप्त नही हो सकती क्योंकि उसे कामना है प्रेम की , दया तो उसने कभी चाही ही नही। कभी कभी दया का प्रकटिकरण दुःख में वृद्धि ही करता है। यह भी स्पष्ट है कि दया अहंकार का पोषण करती है और करुणा अहंकार से विरत। यदि दया भाव से भी सेवा हो रही है, तो यह भी सज्जनों का मार्ग है।

करुणा की बात करें तो बड़ा अदभुत और निर्मल भाव है करुणा। करुणा तो आध्यात्मिक उन्नति और प्रेम की पराकाष्ठा है , जब कोई भी न हो सामने तब भी हृदय में करुणा हिलोरें ले रही होगी और करुणा से ओतप्रोत तरंगें स्वयं को भी अभिभूत कर रही होंगी।

यह दिव्य अनुभूति तो दुखी को देख कर भी हो रही होगी और सुखी को देखकर भी, बीमार को देखकर भी और स्वस्थ को देखकर भी। करुणा तो हृदय का ऐसा भाव है कि यदि एकान्त में नेत्र बंद कर बैठे होगे तब भी हृदय में करुणा का प्रवाह हो रहा होगा। न किसी की अपेक्षा और न किसी की प्रतीक्षा। दया परिस्थितिजन्य है और करुणा मनःस्थितिजन्य और यही दोनों में मुख्य अन्तर है।

यह तो ऐसा ही भाव है कि किसी दुर्गम स्थान में फूल खिले हैं , सुगन्धी और सुन्दरता चारों ओर फैल रही है। न कोई यात्री निहारेगा , न कवि की कविता प्रकट होगी और न ही कोई चित्रकार चित्र बनाएगा, फिर भी पुष्प की सुगन्धी और सुंदरता तो स्वभाव के अनुसार फैल रही है। संत और महापुरुषों के हृदय में जो करुणा और सेवा का भाव है ,वह भी इसी प्रकार शून्य और एकान्त में भी निरन्तर प्रभावित होता रहता है।

बंगाल के छोटे से स्टेशन गुष्करा पर ट्रेन रुकी। एक वृद्धा किसी तरह से खींच कर अपनी पोटली द्वार तक तो ले आयी किंतु उतार नहींं पा रही थी। नीचे खड़े होकर मदद की गुहार लगा रही थी। लोग उस पोटली को लांघ कर ट्रेन में चढ़ उतर रहे थे परन्तु कोई उस वृद्धा की मदद को तैयार नहींं था। गाड़ी ने सीटी दी और चल पड़ी, वृद्धा अपनी पोटली को देख देख बिलख कर रो रही थी। एकाएक प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठे एक सज्जन की दृष्टि उस वृद्धा पर पड़ी। गाड़ी चल चुकी थी, लेकिन फिर भी उसने गाड़ी की चेन खींची और और डिब्बे से शीघ्रता से उतरकर वृद्धा के पास आए।उसने वृद्धा की पोटली उठाकर उसके सिर पर रख दी और अपने डिब्बे की ओर चल दिए, लेकिन तभी उन्हें पुलिस बल ने चेन खींचने के जुर्म में पकड़ लिया। उन्होंने इस अपराध के लिए जुर्माना अदा कर दिया और फिर गाड़ी चल दी।

वह महापुरुष थे कासिम बाजार के राजा मणीन्द्र चन्द्र नन्छी, जो उस गाड़ी से कोलकाता जा रहे थे जिसके पास वैभव राजपाट या फिर बड़ी सेना है और हृदय में प्रेम-करुणा नहींं है , वह शासक हो सकता है; राजा नहींं।
सच्चा राजा तो वह है जो उदार हो, दीन-दु:खियों और दुर्बलों की सहायता करता हो और ऐसा सच्चा राजा बनने का अधिकार तो सभी के पास है, आवश्यकता है इस अधिकार के प्रयोग करने की।

दिन यामिन्यौ सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायु तदपि न मुञ्चत्याशावायुः।।

दिन-रात, सवेरे-सांझ, शीत और वसंत आते और जाते हैं, काल क्रीड़ा करता है, जीवनकाल चला जाता है, तो भी संसार आशा को नहीं छोड़ता । भाव यही कि इस क्षणभंगुर संसार में धर्म और सेवा कार्यों को यथा सम्भव करते रहना ही मनुष्य जीवन की उत्तम प्राप्ति है। यदि सेवा को सांसारिक अथवा आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग मान बैठे हैं तो यह भी उचित नहींं है अपितु आध्यात्म और धर्म का आश्रय लेकर निर्मल सेवा का भाव हृदय में जागृत हो सके, ऐसा प्रयास होना चाहिए, इसी में मानव जीवन की सार्थकता भी है।

Kapil-sharma-KJS-Mathura

 

– कप‍िल शर्मा ,

सच‍िव , श्रीकृष्ण जन्मस्थान , मथुरा

 

 

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