SEBI ने NSE पर ठोका 687 करोड़ रुपए का जुर्माना

नई दिल्‍ली। पूंजी बाजार नियामक सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया SEBI ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज NSE को एक खास जगह स्थापित एक्सचेंज के कुछ सर्वर को कारोबार में कथित रूप से वरीयता देने (को-लोकेशन) के मामले में 687 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। इसके अलावा कंपनी के दो पूर्व प्रमुखों पर भी कार्यवाही की गई है। NSE की को-लोकेशन सुविधा के माध्यम से हाई फ्रिक्वेंसी वाले कारोबार में अनियमितता के आरोपों की जांच के बाद SEBI ने यह आदेश दिया है। आदेश में कहा गया है, ‘NSE को 624.89 करोड़ रुपये और उसके साथ उस पर 1 अप्रैल 2014 से 12 प्रतिशत सालाना ब्याज दर सहित पूरी राशि SEBI द्वारा स्थापित निवेशक सुरक्षा एवं शिक्षा कोष (आईपीईएफ) में भरनी होगी।’
1. को-लोकेशन क्या है?
को-लोकेशन के कारण ब्रोकर सर्वर के ज्यादा नजदीक होकर काम कर सकते हैं। इस सुविधा के लिए ब्रोकरों को अतिरिक्त शुल्क चुकाना पड़ता है। इस सुविधा का इस्तेमाल करने वाले ब्रोकर्स को दूसरे ब्रोकर्स पर बढ़त मिल जाती है क्योंकि एक्सचेंज सर्वर से ज्यादा नजदीक होने के कारण उन्हें दूसरों के मुकाबले कम वक्त में डेटा ट्रांसमिशन का लाभ मिलता है। यह सुविधा लेने वाले ब्रोकर्स के ऑर्डर्स एक्सचेंज सर्वर उन ब्रोकर्स के मुकाबले जल्दी पहुंच जाते हैं जिन्होंने यह सुविधा नहीं ले रखी है।
2. इसमें क्या घोटाला हुआ?
2014-15 में एक मुखबिर ने SEBI से शिकायत की थी कि कुछ ब्रोकरों ने NSE के कुछ शीर्षस्थ अधिकारियों के साथ मिलीभगत से कोलोकेशन सुविधा का दुरुपयोग किया। तब NSE के सदस्यों के बीच आंकड़े प्रसारित करने के लिए तथाकथित टिक-बाय-टिक (TBT) सर्वर प्रोटोकॉल का इस्तेमाल हुआ करता था। इस सिस्टम की प्रमुख विशेषता सूचना भेजने का इसका तरीका थी। सामान्य तौर पर नेटवर्क से जुड़े सभी यूजर्स को एक वक्त में ही डेटा भेजे जाते हैं लेकिन टीबीटी में ऑर्ड्स प्राप्त करने के क्रम में ही डेटा भेजे जाते हैं। कुछ ब्रोकर्स ने NSE अधिकारियों और ऑम्नेसिस टेक्नोलॉजी (NSE को टेक्नोलॉजी मुहैया कराने वाली कंपनी) की मिलीभगत से NSE सर्वर को सबसे पहले एक्सेस किया करते थे।
3. SEBI को क्या मिला?
SEBI ने ओपीजी सिक्योरिटीज, जीकेएन सिक्योरिटीज और वेकटुवेल्थ के साथ-साथ इंटरनेट सेवा प्रदाता संपर्क इन्फोटेनमेंट को अनुचित व्यापारिक कार्यप्रणाली (अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस) का दोषी पाया। ये ब्रोकर्स लगातार NSE सर्वर्स का इस्तेमाल दूसरों से पहले करते रहे।
4. ओपीजी और दूसरों ने कैसे किया खेल?
ओपीजी ने NSE के बैकअप सर्वर्स तक पहुंच बना ली। एक्सचेंज इसका रखरखाव मेन सर्वर में तकनीकी गड़बड़ियां आने की स्थिति में ट्रेडिंग ऑपरेशन को अबाध गति से जारी रखने के लिए करता है। इन सर्वर्स पर बेहद कम या तो बिल्कुल भी ट्रैफिक नहीं होता है क्योंकि ये सिर्फ बैकअप के लिए होते हैं। आम दिनों में जब मेन सर्वर काम करते हैं, तब बैकअप सर्वर से लॉगइन करने वाले को बहुत तेजी से डेटा मिल जाता है। SEBI के मुातबिक ओपीजी और दूसरों ने इसी का फायदा उठाया।
5. क्या NSE ने कानून तोड़ा?
NSE ने ओपीजी और दूसरों को बैक-अप सर्वर का ऐक्सेस दिया। इन ब्रोकरों को तेजी से डेटा मिलने से ऑर्डर पूरा करने में दूसरों पर बढ़त मिल रही थी। NSE ने यह तथ्य भी नजरअंदाज किया कि संपर्क इन्फोटेनमेंट के पास टेलिकॉम डिपार्टमेंट का वैध लाइसेंस भी नहीं है ताकि वह कुछ ब्रोकर्स को डार्क फाइबर कनेक्टविटी दे सके। SEBI ने ब्रोकर्स के साथ-साथ NSE के कुछ अधिकारियों पर भी जुर्माना लगाया। इनमें NSE की पूर्व सीईओ चित्रा रामकृष्णन, पूर्व एमडी रवि नारायण, एनएसई में कोलो डिपार्टमेंट के पूर्व प्रमुख देवी प्रसाद सिंह, मौजूदा बिजनस डिवेलपमेंट हेड रवि वाराणसी और सीटीओ उमेश जैन समेत कुछ अन्य लोग शामिल हैं। SEBI ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा कि प्रमुख पदाधिकारियों ने उचित नियमों का पालन नहीं किया। NSE पर 687 करोड़ रुपये और ब्याज का जुर्माना लगाया गया।
6. डार्क फाइबर क्या है?
डार्क फाइबर से मिले कनेक्शन में ज्यादा बैंडविड्थ होता है और इससे मिलने वाले आंकड़ों में बहुत कम गड़बड़ी पाई जाती है। यानी, इसके जरिए सर्वर्स तक तेज और सटीक पहुंच मिलती है।
7. SEBI के आदेश से NSE पर क्या असर होगा?
SEBI ने NSE को 687 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया। साथ ही, एनएसई को अगले छह महीने तक कैपिटल मार्केट्स की पहुंच से रोक दिया है। इसके आईपीओ इस वर्ष के आखिर तक टल जाएंगे लेकिन इसका एनएसई या इसके वैल्युएशन पर असर पड़ने की संभावना नहीं है। जुर्माना चुकाने के लिए एनएसई के पास पर्याप्त रकम है। जुर्माना भरने के बाद भी उसकी आर्थिक स्थिति पर मजबूत ही रहेगी।
8. क्या सामान्य परिचालन प्रभावित होंगे?
नहीं। सेबी के आदेश से एक्सचेंज पर होने वाले सामान्य कारोबार निष्प्रभावी रहेंगे।
-एजेंसियां

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