कहावतें, जो खेती का भविष्‍य और तरीका बताती थीं

टेक्‍नॉलॉजी के बावजूद आज भी कायम है इन कहावतों का रुतबा

हमारे देश में खेती को खाने-कमाने का प्रथम साधन माना गया है। शायद इसीलिए खेती-किसानी करने वाले को खूब मेहनत करने की सलाह देते हुए ‘आलस्य’ न होना उसका पहला धर्म माना गया है। लोक ज्योतिष वर्षा को बहुत मान्यता देता है, कब किस ग्रह-नक्षत्र में क्या किया जाए कि अच्छी फसल हो, नुकसान (बरबादी) न हो। ये सब कहावतों में बताया गया है।

कुछ ऐसी ही कहावतें आप की जानकारी के लिए

उत्तम खेती मध्यम बान। अधम चाकरी भीख निदान॥
अर्थ – सर्वश्रेष्ठ व्यवसाय खेती (कृषि) है। मध्यम कोटि का व्यवसाय वाणिज्य (व्यापार) है। नौकरी अधम है। किन्तु भीख मांगना सबसे निकृष्ट (निचले स्तर) कोटि का है।

भूमि न भुमियां छोडि़ये, बड़ौ भूमि कौ वास। भूमि बिहीनी बेल जो, पल में होत बिनास॥
अर्थ – अपनी जमीन (आधार) नहीं छोड़नी चाहिये। भूमि पर वास का अपना बड़प्पन है। भूमि छोड़ देने वाली बेल का कुछ ही क्षणों में नाश हो जाता है।

खेती उत्तम काज है, इहि सम और न होय। खाबे कों सबकों मिलै, खेती कीजे सोय॥
अर्थ – कृषि उत्तम कार्य है, इसके बराबर और कोई कार्य नहीं है। यह सबको भोजन देती है इसलिये खेती करनी चाहिये।

असाड़ साउन करी गमतरी, कातिक खाये, पुआ। मांय बहिनियां पूछन लागे, कातिक कित्ता हुआ॥
अर्थ – आषाढ़ और सावन माह में जो गाँव-गाँव में घूमते रहे तथा कार्तिक में पुआ खाते रहे (मौज उड़ाते रहे) वह माँ, बहिनों से पूछते हैं कि कार्तिक की फसल में कितना (अनाज) पैदा हुआ। अर्थात् जो खेती में व्यक्तिगत रुचि नहीं लेते हैं उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होता है।

उत्तम खेती आप सेती, मध्यम खेती भाई सेती। निक्कट खेती नौकर सेती, बिगड़ गई तो बलाय सेती॥
अर्थ – उत्तम खेती वह है जो स्वयं की जाय (स्वयं द्वारा सेवित हो), मध्यम खेती वह है जो भाई देखे, निकृष्ट खेती वह है जिसे नौकर देखें। जो बला की तरह की जाय वह खेती बिल्कुल बिगड़ जाती है।

नित्तई खेती दूजै गाय, जो ना देखै ऊ की जाय। खेती करै रात घर सोवै, काटै चोर मूंड़ धर रोवै॥
अर्थ – नित्य ही खेती और गाय को जो स्वयं नहीं देखते हैं उसकी (खेती या गाय) चली जाती है। जो खेती करके रात्रि में घर पर सोते हैं- उनकी खेती चोर काट ले जाते हैं, और वह सिर पीटकर रोते हैं अर्थात् कृषि कार्य और गौ सेवा स्वयं करनी चाहिये, दूसरों के भरोसे नहीं।

कच्चौ खेत न जोतै कोई। नईं तो बीज न अंकुरा होई॥
अर्थ – कच्चा खेत किसी को नहीं जोतना चाहिये नहीं तो बीज अंकुरित नहीं होता है। कच्चे खेत से तात्पर्य फसल बोने के पूर्व की गयी तैयारी जैसे जोतना, गोड़ना, खाद मिलाने आदि मृदा-संस्कार से है।

जरयाने उर कांस में, खेत करौ जिन कोय। बैला दोऊ बैंच कें, करो नौकरी सोय॥
अर्थ – कंटीली झाडि़यों और कांस से युक्त खेत में खेती नहीं करनी चाहिये अन्यथा उससे क्षति होगी। इससे बेहतर है कि दोनों बैल बेचकर नौकरी करें और निश्चिन्त होकर सोवें।

अक्का कोदों नीम बन, अम्मा मौरें धान। राय करोंदा जूनरी, उपजै अमित प्रमान॥
अर्थ – जिस वर्ष अकौआ, कोदों, नीम, कपास, और आम अधिक फूलें उस वर्ष धान राय करोंदा तथा ज्वार अधिक मात्रा में पैदा होते हैं।

आलू बोबै अंधेरे पाख, खेत में डारे कूरा राख। समय समय पै करे सिंचाई, तब आलू उपजे मन भाई॥
अर्थ – आलू कृष्ण पक्ष में बोना चाहिये, खेत में कूड़ा, राख की खाद डालकर सिंचाई करनी चाहिये तब आलू भारी मात्रा में पैदा होता है।

गेंवड़े खेती, मेंड़ें महुआ। ऐसौ है तो कौन रखउआ॥
अर्थ – गाँव के निकट खेती और सीमा पर फलदार वृक्ष नहीं लगाने चाहिये। ऐसा करने पर रखवाली कौन करेगा? अर्थात् कोई नहीं।

हरिन फलांगन काकरी, पेंग, पेंग कपास। जाय कहौ किसान सें, बोबै घनी उखार॥
अर्थ – हिरण की छलांग की दूरी पर ककड़ी बोनी चाहिये, किन्तु कपास कदम-कदम की दूरी पर बोना चाहिये। ऊख (गन्ना) को घना बोना चाहिये। ऐसा किसान से जाकर कहना।

कातिक मास, रात हर जोतौ। टांग पसारें, घर मत सूतौ॥
अर्थ – कार्तिक के मास में खेत तैयार करने के लिये रात्रि में भी हल जोतना चाहिये। (उन दिनों) घर में टांग पसारकर नहीं सोना चाहिये। अर्थात् रात-दिन का परिश्रम अपेक्षित हैं।

उत्तर उत्तर दैं गयी, हस्तगओ मुख मोरि। भली बिचारी चित्रा, परजा लइ बहोरि॥
अर्थ – उत्तरा और हस्त नक्षत्रों में वर्षा न होने से कृषि कार्य होने में बाधा रही उन्हें चित्रा ही भली लगती है जिसके बरसने से खेती संभल गयी और प्रजा बच गयी।

चित्रा बरसें तीन भये, गोंऊसक्कर मांस। चित्रा बरसें तीन गये, कोदों तिली कपास॥
अर्थ – चित्रा नक्षत्र में बर्षा होने से कोदों, तिली तथा कपास की फसल नष्ट हो जाती है। किन्तु गेहूं, गन्ना, दाल और में वृद्घि होती है।

चैत चमक्कै बीजली, बरसै सुदि बैसाख। जेठै सूरज जो तपैं, निश्चै वरसा भाख॥
अर्थ – चैत्र में बिजली चमके, बैशाख के शुक्ल पक्ष में पानी बरसे तथा ज्येष्ठ में सूरज की गर्मी अधिक हो तो निश्चय ही अच्छी बरसात होगी।

चौदस पूनों जेठ की बर्षा बरसें जोय। चौमासौ बरसै नहीं नदियन नीर न होय॥
अर्थ – ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तथा पूर्णिमा को यदि पानी बरसे तो बरसात में पानी नहीं बरसेगा तथा नदियों में पानी नहीं होगा।

मघा पूर्वा लागी जोर, उर्द मूँग सब धरो बहोर। बऊत बनै तो बैयो, नातर बरा-बरीं कर खैयो॥
अर्थ – मघा तथा पूर्वा नक्षत्र में अधिक वर्षा होने पर कृषि का नाश हो जाता है, ऐसी स्थिति में उड़द तथा मूंग सब हिफाजत से रख लेना चाहिये। बोते बन सके तो बोना, अन्यथा इन्हीं उड़द मूंग की बड़ी-बरा खाकर संतोष कर लेना-क्योंकि अन्य उपज की आशा नहीं है।

माघ मास में हिम परै बिजली चमके जोय। जगत सुखी निश्चय रहै वृष्टि घनेरी होय॥
अर्थ – माघ मास में बिजली चमके और ओले पड़ें तो घनी बर्षा होगी तथा समस्त संसार सुखी रहेगा।

सावन में पुरवैया, भादों में पछयाव। हरंवारे हर छांड़कें लरका जाय जिबाव॥
अर्थ – सावन में पूर्व की ओर से (पुरवाई) हवा चले तथा भादों में पश्चिम की ओर से (पछुआ) हवा चले तो अकाल पड़ने की सम्भावना होती है तब किसानों हल छोड़कर बच्चे जीवित रखने का अन्य साधन तलाशना चाहिए।

सांझें धनुष सकारें मोरा। जे दोनों पानी के बौरा॥
अर्थ – शाम को इन्द्रधनुष का दिखाई देना और प्रात: काल मोर का नाचना- दोनों पानी बरसने के संकेत हैं।

सोम, सुक्र, गुरुवार कों फूस अमावस होय। घर-घर बजें बधाइयां, दुखी न दीखै कोय॥
अर्थ – यदि पौष माह की अमावस्या, सोमवार गुरुवार या शुक्रवार को हो, तो सुकाल आयेगा, कोई दीन दुखी नहीं होगा और घर-घर बधाइयां बजेंगी।