खुशियों का सैंडविच

जीवन में बहुत बार ऐसे हालात बन जाते हैं जब आप किसी को कुछ बताना चाहते हैं, लेकिन जो बताना चाहते हैं वह कड़ुवा सच है। अपना विचार देना भी आवश्यक है और यह भी आवश्यक है कि लीपापोती न करें ताकि संबंधित व्यक्ति का काम या व्यवहार ठीक हो जाए। एक शुभचिंतक के रूप में आप संबंधित व्यक्ति की गलती सुधारना चाहते हैं ताकि उनका और उस कार्य से संबंधित लोगों का नुकसान न हो। किसी की आलोचना करनी हो, या किसी को सही रास्ता दिखाना हो तो क्या करना चाहिए? क्या तरीका है हमारे पास कि हम अपनी बात भी कहें, दृढ़ता से कहें, स्पष्ट रूप से कहें और रिश्ते भी न बिगड़ें और सामने वाले को बात समझ भी आ जाए। यह स्थिति चाहे परिवार में हो, रिश्तेदारी में हो, दोस्ती में हो, या कार्यालय में हो, बस एक छोटे से नुक्ते का ध्यान रखेंगे तो बात बन जाएगी।
अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत में मेरी पहली नौकरी में हमारे एक मैनेजर ने मेरे एक सहकर्मी को इस बुरी तरह से अपमानित किया कि उसका दिल टूट गया। मेरा वह सहकर्मी बहुत मेहनती और विनम्र व्यक्ति था। उससे यह अपमान सहा नहीं गया और वह इतना परेशान रहने लगा बाद में वह कभी अपनी पहले वाली काबलियत से काम कर ही नहीं पाया, बार-बार गलतियां करने लगा और अंतत: उसे त्यागपत्र देना पड़ा। उल्लेखनीय यह है कि मेरा वह सहकर्मी जिस नई कंपनी में गया, वहां उसका काम बहुत अच्छा रहा और फिर ऐसा भी होने लगा कि हमारी कंपनी के ग्राहकों से बार-बार उसकी प्रशंसा सुनने को मिलती। चूंकि नई कंपनी में जाने के बाद भी मेरी और उसकी दोस्ती बरकरार रही तो मैंने जिज्ञासावश उससे पूछा कि वह नई कंपनी में इतना अच्छा काम कर रहा है तो हमारी कंपनी में ही उसे दिक्कत क्यों आई? मेरे उस सहकर्मी ने जो उत्तर दिया, वह मेरे लिए जीवन भर का सबक बन गया।
मेरे उस सहकर्मी ने बताया कि नई कंपनी ज्वायन करते वक्त वह बहुत डरा-डरा सा था। हर बात पर वह अपने मैनेजर की अनुमति मांगता था। लेकिन नई कंपनी के मैनेजर के व्यवहार से आश्वस्त होकर उसने अपने काम को नये नज़रिये से देखना शुरू किया। कई बार जोखिम भी लिये। अक्सर उसका जोखिम काम कर गया पर कभी-कभार कंपनी का नुकसान भी हुआ। एक बार तो स्थिति बहुत जटिल हो गई। उन सब स्थितियों में नई कंपनी के मैनेजर ने हमेशा उसका उत्साह बढ़ाया ही। उसे कभी डांट नहीं पड़ी, नई कंपनी के मैनेजर ने हमेशा उसे सिर्फ प्रेरणा ही दी, उत्साहित ही किया, कोई काम गलत हो जाता था तो उसको सही ढंग से करने का तरीका बताते थे और उसकी आलोचना भी ऐसे करते थे कि उस आलोचना से भी प्रेरणा ही मिले। तब मेरे उस सहकर्मी ने कहा कि मैंने यह सीखा है कि आलोचना करना भी एक कला है। आलोचना की यह कला ही खुशियों का सैंडविच है।
हमारा कोई सहकर्मी गलती पर गलती किये जा रहा है, अपने वरिष्ठ अधिकारियों की बात नहीं सुन रहा, उसके व्यवहार से बाकी टीम पर भी बुरा असर पड़ रहा है, लेकिन हम यह भी जानते हैं कि वह मेहनती है और काबिल है, बस व्यवहार में जरा सी परिपक्वता की आवश्यकता है, तो हमारा रुख क्या होना चाहिए? जब ये मजबूरी ही हो जाए कि उस सहकर्मी को उसके व्यवहार के बारे में, या कारगुज़ारी के बारे में सच्ची और सही फीडबैक देना जरूरी हो और स्थिति इतनी संवेदनशील हो कि प्रतिक्रिया देना आवश्यक हो ही तो आपको अपनी प्रतिक्रिया कैसे देनी चाहिए? सैंडविच बनाते वक्त हम पहले ब्रेड लेते हैं, उस पर कुछ मेयोनीज़ लगाते हैं फिर उसमें सब्जी-मसाला डालते हैं, फिर कुछ सॉस डालते हैं, फिर ब्रेड का एक और टुकड़ा लगाते हैं, उस पर फिर क्रीम लगाते हैं या सॉस लगाते हैं। यही तरीका आलोचना के समय भी होना चाहिए। सबसे पहले संबंधित व्यक्ति के किसी अच्छे काम या व्यवहार की प्रशंसा कीजिए, सच्ची प्रशंसा कीजिए, खुलकर प्रशंसा कीजिए। अब वो बात कहिए जो आप उसे समझाना चाहते हैं। गोलमोल नहीं, स्पष्ट कहिए, पर यूं कहिए कि अगर इसकी जगह ये होता तो क्या ही अच्छा होता। आलोचना के बजाए सुझाव के रूप में कहिए। अब इसमें थोड़ी सी सॉस डालिए, यानी कुछ मीठा-मीठा बोलिए। उसके बाद ब्रेड का ऊपर का पीस लगाइये, यानी, उसकी किसी खूबी की बात कीजिए। उसके ऊपर मीठी क्रीम लगाइये, मेयोनीज़ लगाइये पनीर लगाइये, जितनी भी मीठी-मीठी परतें और जोड़ सकें, जोड़ लें। फिर देखिए कि उस सहकर्मी का व्यवहार कैसे बदलना शुरू होता है। एकदम से तो कुछ नहीं होगा, कुछ समय तो लगेगा पर आपको फर्क पहली बार से ही नज़र आना शुरू हो जाएगा। इसका अभ्यास कीजिए और देखिए कि यह सैंडविच कैसे चमत्कार करता है।
एक हीरा बढ़िया तराशा गया हो, पॉलिश ढंग की हो तो वह चमकता है और चमक को रिफलेक्ट भी करता है। तराशे हुआ हीरा देखना आनंददायक अनुभव है, लेकिन एक डायमंड कटर से पूछिये। तराशा हुआ हीरा उसके किसी काम का नहीं क्योंकि उसमें उसके करने के लिए कुछ नहीं है। वह तो एक अनगढ़ हीरा देखकर उत्साहित होता है क्योंकि वह उसे तराश सकता है। एक कुम्हार कच्ची मिट्टी को देखकर खुश होता है क्योंकि वह उसे एक शानदार बर्तन या मनभावन शो पीस या आकर्षक मूर्ति का रूप दे सकता है। मेरे सहकर्मी की नई कंपनी का नियम था कि गलती करने वाले व्यक्ति को डांटा न जाए बल्कि उसे सही ढंग से काम करने का तरीका सिखाया जाए और सफल होने का मौका दिया जाए। परिणाम यह था कि पूरी टीम अच्छा काम करती थी और लोग नौकरी भी नहीं छोड़ते थे।
ज्यादातर उद्यमी इस गुर को बेहतर समझते हैं और अपनाते हैं इसीलिए वो सफल हो जाते हैं और सफल बने रहते हैं। यह मेरे लिए एक बहुत बड़ा सबक था। मैंने इसे समझा और तुरंत अपने जीवन में उतारा। नतीजा यह रहा कि मैं अपनी कंपनी में सर्वोच्च पद पर पहुंच सका और जब मैंने अपना व्यवसाय आरंभ किया तो इस गुर का हमेशा पालन किया। सबक यही है कि जब हम अपने किसी सहकर्मी को या घर में अपने बच्चों को कुछ गलती करते देखें और उन्हें कुछ सिखाना चाहें तो सैंडविच फार्मूला अपनाएं। सिखाने का तरीका हमारा सही है या गलत है, प्रेम भरा है या अपमानजनक, इस पर निर्भर करेगा कि हमारा वह सहकर्मी या हमारे बच्चे क्या सीखेंगे, कितना सीखेंगे और हमसे कुछ सीखना श्रसर चाहेंगे या नहीं। खूबी होगी तो भी हम में और कमी होगी तो भी हम में। इसके लिए सहकर्मी को या बच्चे को दोष देना गलत है। हम अगर खुद पर निगाह डालें, अपने अंदर झांकें तो जीवन ही बदल जायेगा।

– पी. के. खुराना,
हैपीनेस गुरू, मोटिवेशनल स्पीकर

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