संदीपन नागर पंच तत्त्व में विलीन, रंगकर्मियों की अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

मथुरा। राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नाट्य एवं फिल्म निर्देशक तथा कलाकार संदीपन नागर का सोमवार को ध्रुवघाट स्थित श्मशान पर उनके पुत्र सुयश नागर द्वारा अश्रुपूरित वातावरण में अन्तिम संस्कार किया गया।

इस अवसर पर फिल्म निर्देशक सिद्धार्थ नागर, फिल्म – कलाकार ब्रजेन्द्र काला, आकाशवाणी दिल्ली की श्रुति पुरी, पद्मश्री मोहन स्वरूप भाटिया, डा0 राजेन्द्र कृष्ण अग्रवाल, दीपक गोस्वामी, वीरेन्द्र अग्रवाल, मनमोहन गुप्ता, अनुपम गौतम, सईद अहमद सईद, देवेन्द्र पाल, प्रचेता नागर, डा0 विश्वकर्मा, वी. के. शर्मा, कपिल नागर, प्रमोद सारस्वत, पारिजात नागर, मानव मेहरा, रवि सरीन, मदार बन्धु आदि उपस्थित थे।

इस तरह हुई ‘स्वास्तिक‘ रंगमंच की स्थापना

8 जनवरी 1977 को सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा0 अमृतलाल नागर की पुत्री डा0 अचला नागर तथा उनके पुत्र संदीपन नागर, मोहन स्वरूप भाटिया आदि कुछ नवोदित कलाकारों के मध्य मथुरा में नाटकों की प्रस्तुति के अभाव के प्रति गहन चिन्तन के पश्चात् ‘स्वास्तिक‘ की स्थापना हुई और इसे डा0 अमृतलाल नागर का वरद् संरक्षण प्राप्त हुआ और कुछ समय पश्चात् ही प्रसिद्ध नाटककार मोहन राकेश के नाटक ‘शायद‘ की प्रस्तुति ‘ज्ञानदीप रंगमंच पर हुई। यह रंगमंच एक कक्षा के आगे मात्र लगभग 10×15 गज आकार का बरामदा था। इसी मंच पर आगामी 15 वर्षों तक निरन्तर एक से एक उत्कृष्ट नाटकों की प्रस्तुतियाँ होती रहीं।
‘स्वास्तिक‘ के कलाकारों ने संदीपन नागर के कुशल निर्देशन में मथुरा की सीमाओं को लाँघकर दिल्ली, आगरा, बरेली, अलीगढ़, करौली, आदि में प्रतिष्ठा अर्जित की, विषेशता यह थी कि अधिकांश नाट्य-प्रस्तुतियाँ का ब्रजभाशा में रूपान्तरण किया गया था, उनमें नौंटंकी, रसिया का आदि का भी समावेष किया गया था और सभी कलाकार नवोदित थे।
स्वास्तिक के अध्यक्ष पद्मश्री मोहन स्वरूप भाटिया ने बताया कि स्वास्तिक की उपलब्ध्यिों का एक मात्र श्रेय संदीपन नागर का था जिन्होंने कलाकारों की प्रतिभाओं को निखारा-सँवारा और स्वयं भूखे-प्यासे रहकर, जीवन की सुख-सुविधाओं को छोड़कर अपनी साधना – तपस्या से नाट्य – चेतना जागृत की और ब्रजेन्द्र काला जैसे तब के सामान्य कलाकार को आज फिल्म क्षेत्र की ऊँचाइयों पर पहुँचाया।

संदीपन नागर के निर्देशन में प्रस्तुत सैंकड़ों नाटकों का पटाक्षेय 30 दिसम्बर को एल0पी0 नागर रोड स्थित संदीपन नागर के निवास स्थान पर 29 दिसम्बर को हृदयाघात से अनन्त तत्त्व में विलीन होने के पश्चात् हुआ जब कि नाट्य-निर्देशक, प्रमुख कलाकार और नाट्य – सृष्ट‍ि के सम्पूर्ण सूत्रधार के प्रतीक संदीपन नागर न निर्देशन कर रहे थे, न अभिनय, शान्त भाव में थे किन्तु इस शान्त भाव ने वहाँ दर्शक के समान उपस्थित सैकड़ों रंगकर्मी, साहित्यकार, संगीतकार और संस्कृतिप्रेमियों को अश्रु विभोर कर दिया और इन अश्रुओं की धारा अविरल प्रवाहित होती रही।

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