सनातन जीवनशैली ही महामार‍ियों से बचाव करने में सक्षम: सच‍िव, श्रीकृष्ण जन्मभूम‍ि

पुरानी कहावत है क‍ि दुष्टों की संगत और इनके साथ व्यवहार, दोनों ही महा कष्टकारी होते हैं, चीन से फैले कोरोना वायरस के संबंध में ये कहावत पूरी तरह खरी उतरती है, आज इसी का परिणाम सम्पूर्ण विश्व भुगत रहा है।

-कपिल शर्मा, सचिव, श्री कृष्ण जन्मभूमि न्यास, मथुरा
कपिल शर्मा, सचिव,
श्री कृष्ण जन्मभूमि न्यास, मथुरा

सच‍िव श्रीकृष्ण जन्मभूम‍ि ने सनातन जीवनशैली के माध्यम से कोरोना जैसी महामार‍ियों से कैसे बचा जाए इस पर प्रकाश डालते हुए बताया क‍ि हम सभी जानते हैं क‍ि चीन पर भारत सहित सम्पूर्ण विश्व की व्यापारि‍क न‍िर्भरता क‍ितनी अध‍िक है। किसान के जाल में उसके बीज को खाने वाली चिड़ियाँ तो फँसती ही हैं , फसल को हानि पहुँचाने वाले कीटों का खाने वाले पक्षी भी क्योंकि उनकी संगत उस समय विपरीत जीवियों से थी ।

महामारियाँ देश काल परिस्थिति पर आधारित होती हैं, वे कर्म जनित होती है ना क‍ि ग्रह जनित
ज्ञातव्य है क‍ि संतों की तपस्थली एवं तप के प्रभाव से ठाकुर जी के अनेकों रूपों की प्राकट्य पवित्र भूमि हमारे भारतवर्ष ने आज तक किसी महामारी को जन्म नहीं दिया। हां, ये अवश्य है क‍ि दुष्टों से व्यवहार – व्यापार – निकटता से इसके दंश को झेला अवश्य है। संत हो या सामान्यजन अंधड़ में आँख बंद कर के ही धूल से रक्षा सम्भव है। अतः सावधानी रखा जाना ही कष्ट से बचाव हो सकता है, इसके अत‍िर‍िक्त अन्य कोई उपाय नहीं है।

आज आवश्यकता इस बात की है क‍ि अनेक महान ऋषि-मुनियों की तपस्थली रहे हमारे भारत देश की प्राचीन परम्पराओं में दीप-आरती से पूर्व गुग्गुल एवं वनस्पतियों से जो धूना आरती क‍िया जाना व मंदिर में प्रवेश करते हुए व आरती के समय घंटा वादन करने के पीछे वैज्ञान‍िक कारण ही रहे थे ज‍िन्हें तथाकथ‍ित आधुन‍िकता के चलते भुला द‍िया गया था।

आज जब वैज्ञान‍िक ध्वन‍ि व‍िज्ञान का शारीर‍िक व मानस‍िक प्रभाव देख रहे हैं तो मंद‍िरों से न‍िकलने वाली इस ध्वन‍ि पर भी वृहद् अनुसंधान किए जाने चाह‍िए ।

विशाल भारतवर्ष के भिन्न भिन्न क्षेत्रों के वातावरण के अनुकूल भोजन के प्रकार , विशेष रूप से प्राचीन मंदिरों के परम्परागत नित्य प्रसाद एवं प्रसाद में ऋतु अनुकूल मसालों-वनस्पतियों के प्रयोग के महत्व को अब समझना ही होगा।
अखाड़ों-छावनियों की तप-योग-व्यायाम की जीवनशैली के दर्शन सिर्फ़ कुम्भ आदि में कर प्रसन्न होने अथवा दर्शन से आत्ममुग्ध होने से कोई लाभ नहीं होगा अपितु यथा सम्भव आत्मसात् करना ही होगा।
इसी तरह जहां नारायण गोपाल रूप में विराज रहे हैं वहाँ गौ के महत्व को समझना ही होगा। आज यदि मानवता को बचाना है तो गौ और प्रकृति का संरक्षण-संवर्धन सम्पूर्ण सामर्थ से करना ही होगा।
भोजन-व्यायाम-जीवन कैसा हो, इसका वर्णन सनातन धर्म के समृद्ध शास्त्रों व प्राचीन धर्म ग्रंथों में विस्तार से द‍िया गया है तथा अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष मनुष्य जीवन का उद्देश्य एवं मार्ग विस्तार से वर्णित है।

सनातनकालीन आयुर्वेद के ज्ञान को हम स्वयं उपेक्षित कर पाश्चात्य चिकित्सा पर निर्भर हो गए हैं जबक‍ि कोरोना का कोई उपचार पाश्चात्य च‍िक‍ित्सा जगत में अभी तक नहीं म‍िला है , इसके आगे बढ़कर हमारे अयुर्वेदाचार्यों ने गिलोय-तुलसी-नीम आदि का प्रयोग रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए अच्छा बताया है। यही कारण है क‍ि कोरोना के प्रकोप के बाद आयुर्वेदिक दवा की दुकानों पर इनकी ज़बरदस्त बिक्री हो रही हैक्योंकि आयुर्वेद के बारे में जितनी आमजन की समझ है , वह इसे अपना रहे हैं ।
अब आवश्यकता है आयुर्वेद के संवर्द्धन की एवं जन जन तक इसको पहुँचाने की। यह तभी सम्भव है जब आयुर्वेद के नाम पर चल रहे करोड़ों के फ़र्ज़ी व्यापार के साथ साथ आयुर्वेद के विरुद्ध चल रहे दुष्प्रचार को भी कड़ाई से रोका जाये। आज विश्व के सभी विकसित देशों में प्रायः सभी सामान्य रोगों के लिए आयुर्वेद पर आधारित दवाएँ उपलब्ध हैं और रोगी पूर्ण विश्वास के साथ उनको लेते हैं।

समय आ गया है कि सनातन धर्म की परम्पराओं से जुड़े, शास्त्रों एवं धर्म ग्रंथों में त्रुटि खोजने से अच्छा है क‍ि हमारे मंगल और कल्याण के लिए जो अच्छा है, उसको समझें, समझायें और अपनायें। अपने ज्ञान -सामर्थ्य का सदुपयोग समाज, राष्ट्र और विश्व के कल्याण के लिए करते हुए सनातन धर्म के सूत्रों और दर्शन को जन जन तक पहुंचायें। समय आ गया है क‍ि सभी सनातन धर्म की समृद्ध परम्पराओं एवं ज्ञान को समझें और पुनः अपनी जड़ों से जुड़ें। यही मार्ग है जिससे भारतवर्ष पुनः विश्वगुरु की उपाधि को प्राप्त करेगा और कोरोना जैसी महामार‍ियों का न‍िवारक भी बनेगा।

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