संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, पर‍िस्‍थ‍ित‍ि कठ‍िन है लेक‍िन नकारात्‍मक नहीं होना

नई दिल्‍ली। ‘हम जीतेंगे: पाजिटिविटी अनलिमिटेड’ के तहत पांच दिवसीय व्याख्यानमाला के अंतिम दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि समाज की जो भी आवश्‍यकता है, संघ के स्‍वयंसेवक पूर्त‍ि में लगे हैं। अब जो पर‍िस्‍थि‍त‍ि है, उसमें खुद को सुरक्ष‍ित रखना है। सब कुछ ठीक है, हम ऐसा नहीं कह रहे हैं। पर‍िस्‍थ‍ित‍ि कठ‍िन है, नि‍राश करने वाली है लेक‍िन नकारात्‍मक नहीं होना है, मन को नकारात्‍मक नहीं रखना है।
सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि मन की दृढ़ता, सामूहि‍कता से काम करने और सत्‍य की पहचान करते हुए काम करने की बात पूर्व के वक्‍ताओं ने की है। मुख्‍य बात मन की है। मन अगर थक गया। जैसे सांप के सामने चूहा अपने बचाव के लि‍ए कुछ नहीं करता, ऐसी स्‍थ‍ित‍ि नहीं होने देनी है। वि‍कृत‍ि के बीच संस्‍कृत‍ि की बात सामने आ रही है। न‍िराशा की नहीं, लड़ने की पर‍िस्‍थ‍ित‍ि है।
दुख की चुनौती मानकर संकल्‍प कर लड़ना है।
यह समय रोजाना हमारे मन को उदास और कटु बनाएगा। ऐसा होने से वि‍नाश ही होगा। सारी समस्‍याओं को लांघकर सभयता आगे बढ़ी है। समाज की च‍िंता और प्‍लेग के रोगि‍यों की सेवा करते हुए हेडगेवार के माता-प‍िता चले गए, तो क्‍या उनका मन कटुता से भर गया, ऐसा नहीं है बल्‍कि उन्‍होंने आत्‍मीयता का संबंध बनाया।
जब वि‍पत्‍त‍ि आती है तो हमारी प्रकृति क्‍या है? भारत के लोग जानते हैं क‍ि पुराना शरीर नि‍रोपयोगी हो गया, दूसरा धारण करना है। यह हम जानते हैं, ऐसे में यह परिस्‍थिति हमें डरा नहीं सकती। हमें जीतना है। सामने जो संकट है, उसे चुनौती मानकर संकल्‍प के साथ लड़ना है। जब तक जीत न जाएं, तब तक लड़ना है। थोड़ा सी गफलत हुई। शासन-प्रशासन के सभी लोग गफलत में आ गए इसल‍िए दोबारा संकट आया ज‍बक‍ि वैज्ञान‍िक कहते रहे कि अभी आपदा टली नहीं है। अब तीसरी लहर की बात हो रही है, तो बैठना नहीं है… लड़ना है।
मोहन भागवत ने कहा कि देर से जागे, कोई बात नहीं है लेकिन अंतर भरकर आगे न‍िकलना चाहि‍ए। खुद को ठीक रखना, धैर्य सजगता और सक्र‍ियता रखना, व्‍यायाम करना, प्राणायाम, सूर्य नमस्‍कार, ओमकार, दीर्घ स्‍वसन करना है। ऑनलाइन सीखने की व्‍यवस्‍था हो गई है। बहुत कठ‍िन क्र‍ियाएं नहीं, बल्कि सात्‍व‍िक आहार, शरीर की ताकत को बढ़ाने वाला आहार हो पर वैज्ञानि‍कता के साथ हो।
जो भी आ रहा है उसको परखकर लेना चाह‍िए, स्‍वयं के अनुभव व वैज्ञानि‍क परीक्षण के आधार पर लें। बेस‍िर पैर की बातों पर न जाएं। आयुर्वेद के पीछे तर्क है, उसे लेने में कोई द‍िक्‍कत नहीं है पर सबको लाभ हो ऐसा भी नहीं इसलि‍ए सावधानी रखकर उपचार और आहार का सेवन करना चाह‍िए। खाली मत रहि‍ए, कुछ नया सीख‍िए। बच्‍चों से संवाद कायम कीजिए। पर्याप्‍त अंतर पर रहकर संपर्क बनाए रखें, स्‍वच्‍छता का पालन करें और मास्‍क लगाएं। सावधानी हटती है तो दुर्घटना घटती है। गड़बड़ हो गई तो उपचार लें।
बदनामी का डर और अस्‍पताल की स्‍थि‍त‍ि देखकर उपचार नहीं लें, लेकिन तुरंत च‍िक‍ित्‍सकीय सलाह लेकर प्राथमि‍क सावधान‍ियां बरतने से आदमी इससे बाहर आ सकता है। जन प्रबोधन और जन प्रश‍िक्षण का बड़ा महत्‍व है। प्रत्‍यक्ष सेवा करनी है तो उनके लि‍ए बेड-ऑक्‍सीजन की व्‍यवस्‍था करनी है। पहली लहर में की थी। अब उससे अध‍िक करने की आवश्‍यकता है। बच्‍चों की शि‍क्षा में प‍िछड़ने का दूसरा वर्ष है, वह ज्ञान में न पि‍छड़ें इसकी चि‍ता है।
रोज कमाने-खाने वाले का रोजगार बंद न हो। उनकी चि‍ता होनी चाहिए और वह भूखे न रहें।
कोविड रिस्पांस टीम (सीआरटी) की तरफ से 11 मई से ‘हम जीतेंगे: पाजिटिविटी अनलिमिटेड’ का आयोजन किया जा रहा है। समापन दिवस पर शनिवार को अंतिम दिन मोहन भागवत का उद्बोधन हुआ।
इससे पहले शुक्रवार को आध्यात्मिक गुरु दीदी मां साध्वी ऋतंभरा ने इस कार्यक्रम को संबोधित किया था। इस दौरान उन्होंने कहा था कि मनुष्य के साहस व संकल्प के सामने बड़े-बड़े पर्वत तक नहीं टिक पाते हैं। ऐसे में हम इस अदृश्य विषाणु के दौर से भी जरूर बाहर निकलेंगे। यह ध्यान में रखना होगा कि इस विकट परिस्थिति में असहाय होने से समाधान नहीं निकलेगा। हमें अपनी आंतरिक शक्ति को जागृत करना होगा।
साध्वी के अलावा श्री पंचायती अखाड़ा-निर्मल के पीठाधीश्वर संत ज्ञानदेव ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया था। उन्होंने कहा था केवल भारतवर्ष में नहीं, संपूर्ण विश्व में जो यह संक्रमण काल चल रहा है इससे घबराने की आवश्यकता नहीं है। मनोबल गिराने की आवश्यकता नहीं है। जो भी वस्तु संसार में आती है, वह सदा स्थिर नहीं रहती। दुःख आया है, वह चला जाएगा।
-एजेंसियां

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