क्‍या चौधरी चरण सिंह की विरासत के आखिरी मुग़ल साबित होंगे RLD मुखिया?

क्‍या चौधरी चरण सिंह की विरासत के आखिरी मुग़ल साबित होंगे RLD मुखिया चौधरी अजीत सिंह?
ये सवाल इसलिए कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह उन्‍होंने सपा-बसपा और यहां तक कि कांग्रेस के सामने बिना शर्त समर्पण किया है, उसे देखकर यही लगता है।
संभवत: इसीलिए सपा मुखिया अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती ने आगामी लोकसभा चुनावों के लिए यूपी में अपने गठबंधन की घोषणा के लिए जो प्रेस कांफ्रेंस आयोजित की, उसमें RLD मुखिया को बैठाना भी जरूरी नहीं समझा।
और तो और प्रेस कांफ्रेंस के दौरान भी इन दोनों नेताओं ने RLD का नाम तक नहीं लिया और मात्र इतना कहा कि प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में से 2 सीटें अन्‍य दलों के लिए छोड़ी जा रही हैं।
इसके बाद मुलाकात करने पहुंचे RLD के युवराज जयंत चौधरी को भी अखिलेश ने झुनझुना थमा दिया लिहाजा जयंत चौधरी पर मीडिया से यह कहने के अलावा कोई चारा ही नहीं था कि संबंध महत्‍वपूर्ण हैं, सीटें नहीं।
जबकि कौन नहीं जानता कि जयंत चौधरी सीटों के लिए ही अखिलेश के यहां हाजिरी बजाने गए थे।
दूसरी ओर जयंत से हुई मुलाकात के बाद अखिलेश यादव ने पिछले दिनों फिर अपनी इस बात को दोहराया कि राष्‍ट्रीय लोकदल RLD से गठबंधन में कोई समस्‍या नहीं है किंतु हम उन्‍हें दो ही सीट देंगे।
अखिलेश यादव के कहने का तात्‍पर्य सीधे-सीधे यही था कि सारी बातचीत अपनी जगह लेकिन खूंटा वहीं गड़ेगा, जहां हम चाहेंगे।
उधर बसपा सुप्रीमो मायावती तो अजीत सिंह की पार्टी को इतनी घास भी डालने के मूड में नहीं बताई जातीं।
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार लखनऊ की प्रेस कांफ्रेंस से पहले मायावती ने अखिलेश से दो टूक शब्‍दों में कह दिया था कि वह आरएलडी को शामिल ही नहीं करना चाहतीं।
बताया जाता है कि मायावती के तीखे तेवरों ने अखिलेश को भी RLD के बावत अपने कदम खींचने पर मजबूर कर दिया अन्‍यथा वह आरएलडी को चार नहीं तो तीन सीटें दिए जाने के पक्ष में थे।
जो भी हो, आज स्‍थिति यह है कि आरएलडी को कांग्रेस तक नहीं पूछ रही और चौधरी अजीत सिंह इस कोशिश में लगे हैं कि किसी तरह दिखावटी सम्‍मान बना रहे।
वैसे ईमानदारी से देखा जाए तो छोटे चौधरी कहे जाने वाले चौधरी अजीत सिंह कभी अपने पिता चौधरी चरण सिंह की विरासत को सम्‍मान दिला भी नहीं पाए।
चौधरी चरण सिंह को जानने और समझने वाले तो यहां तक कहते हैं कि छोटे चौधरी ने अपने पिता की विरासत के साथ-साथ उनके मान और सम्‍मान को भी मिट्टी में मिला दिया।
पहले एक नजर चौधरी चरण सिंह के राजनीतिक जीवन पर
जनपद गाजियाबाद की बाबूगढ़ छावनी के निकट तहसील हापुड़, गांव नूरपुर में फूस के छप्पर वाली मढ़ैया के अंदर 23 दिसम्बर 1902 को जन्‍मे चौधरी चरण सिंह ने ताजिंदगी अपने पिता चौधरी मीर सिंह से प्राप्‍त नैतिक मूल्यों की विरासत सहेजकर रखी।
चौधरी चरण सिंह के नैतिक मूल्‍यों का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्‍होंने आगरा विश्वविद्यालय से कानून की शिक्षा लेकर 1928 में जब गाजियाबाद से वकालत शुरू की तो सिर्फ उन्हीं मुकद्मों को स्वीकार करते थे जिनमें मुवक्किल का पक्ष न्यायपूर्ण होता था।
वकालत जैसे व्यावसायिक पेशे में भी ईमानदारी, साफगोई और कर्तव्यनिष्ठा का चौधरी चरण सिंह ने जो उदाहरण प्रस्‍तुत किया, उसे लोग भूले नहीं हैं।
स्‍वाधीनता के लिए छेड़े गए आंदोलन की बात करें तो लाहौर अधिवेशन (1929) में पूर्ण स्वराज्य उद्घोष से प्रभावित होकर युवा चरण सिंह ने गाजियाबाद कांग्रेस कमेटी का गठन किया।
1930 में जब महात्मा गाँधी द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन के तहत नमक कानून तोड़ने का आह्वान किया गया तो चरण सिंह ने गाजियाबाद की सीमा से सटी हिण्डन नदी पर नमक बनाया।
9 अगस्त 1942 को अगस्त क्रांति के माहौल में चरण सिंह ने भूमिगत होकर गाजियाबाद, हापुड़, मेरठ, मवाना, सरधना तथा बुलन्दशहर के गाँवों में गुप्त रूप से क्रांतिकारियों का संगठन तैयार किया।
मेरठ कमिश्नरी में चरण सिंह ने क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर फिरंगियों की हुकूमत को बार-बार चुनौती दी। मेरठ प्रशासन ने चरण सिंह को देखते ही गोली मारने का आदेश दे रखा था।
जेल में ही चौधरी चरण सिंह द्वारा “शिष्टाचार” शीर्षक से लिखी गई किताब भारतीय संस्कृति और समाजिक नियमों का एक बहुमूल्य दस्तावेज मानी जाती है।
मुख्‍यमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री और प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह
दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री, फिर केंद्रीय गृहमंत्री और उसके बाद देश के प्रधानमंत्री बने चौधरी चरण सिंह को जमींदारी उन्मूलन विधेयक लाने तथा उत्तर प्रदेश भूमि संरक्षण कानून बनवाने सहित राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना कराने के लिए जाना जाता है जबकि आज उनके पुत्र एवं आरएलडी मुखिया की पहचान सिर्फ एक ऐसे अवसरवादी राजनीतिज्ञ की बनकर रह गई है जो निजी स्‍वार्थों की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जाकर और किसी से भी समझौता कर सकता है।
चौधरी अजीत सिंह की यह पहचान यूं ही नहीं बनी, वक्‍त-वक्‍त पर उन्‍होंने अपने क्रिया-कलापों से खुद इसे साबित भी किया है।
आश्‍चर्य की बात यह है कि उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त चौधरी अजीत सिंह अपने इस रवैये में कोई बदलाव करते नजर नहीं आते जबकि उनके रवैये ने ही उन्‍हें राजनीतिक रूप से लगभग दयनीय स्‍थिति में ला खड़ा किया है।
राजनीतिक सूत्र बताते हैं कि आरएलडी को सपा और बसपा जो दो सीटें देना चाहते हैं, उनमें मथुरा भी शामिल नहीं है। अखिलेश चाहते हैं कि यदि अजीत सिंह मथुरा सीट पर ज्‍यादा जोर देते हैं तो वह आरएलडी के सिंबल पर अपने मित्र संजय लाठर को लड़ा दें।
यदि ऐसा होता है तो मथुरा से आरएलडी का रहा-सहा वजूद भी खत्‍म होने में कोई संदेह नहीं रह जाएगा।
क्‍या आत्‍मविश्‍वास खो चुके हैं चौधरी अजीत सिंह ?
अब तक के घटनाक्रम को देखने से यह प्रश्‍न पैदा होना स्‍वाभाविक है कि क्‍या आरएलडी मुखिया अजीत सिंह अपना आत्‍मविश्‍वास पूरी तरह खो चुके हैं ?
क्‍या वह मान चुके हैं कि गठबंधन के बिना वह अपनी और जयंत की जीत भी सुनिश्‍चित नहीं कर सकते ?
यदि ऐसा नहीं है तो फिर गठंधन के लिए इस कदर गणेश परिक्रमा और साष्‍टांग दंडवत की स्‍थिति किसलिए।
अगर चौधरी अजीत सिंह सम्‍मान पूर्वक अपनी और अपने बेटे की सीट निकाल पाने में सक्षम हैं तो गठबंधन में शामिल होने के लिए गिड़गिड़ाने की जरूरत ही क्‍या है।
इसके जवाब में सीधी सी बात यही लगती है कि वह अपना आत्‍मविश्‍वास पूरी तरह खो चुके हैं। हालांकि इसके लिए उनकी अपनी नीतियां ही जिम्‍मेदार हैं, कोई अन्‍य दल या व्‍यक्‍ति नहीं।
याद कीजिए 2009 का लोकसभा चुनाव जिसमें मथुरा से जयंत चौधरी चुनाव लड़े थे। तब जयंत को भाजपा का समर्थन प्राप्‍त था इसलिए चुनाव जीत गए किंतु 2014 में उसी भाजपा ने उन्‍हें भारी मतों से हरा दिया।
शायद इसीलिए आज भी चौधरी अजीत सिंह अपनी पार्टी के बूते जयंत को तो क्‍या खुद को भी चुनाव मैदान में उतारने से डर रहे हैं।
बगावत का खतरा
पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक सूत्रों की मानें तो चौधरी अजीत सिंह के इस समर्पण भाव से उनकी ही पार्टी के तमाम बड़े नेता नाखुश हैं और उनके हर कदम पर पैनी निगाह गढ़ाए बैठे हैं।
चूंकि गठबंधन में सम्‍मानजनक स्‍थान प्राप्‍त न होने पर उन्‍हें भी अपना राजनीतिक भविष्‍य अंधकारमय दिखाई दे रहा है इसलिए कोई आश्‍चर्य नहीं कि ऐन वक्‍त पर आएलडी में भगदड़ की स्‍थिति उत्‍पन्‍न हो जाए और पार्टी के नाम पर सिर्फ अजीत सिंह एवं जयंत चौधरी शेष रहें।
मथुरा, आगरा, अलीगढ़ और हाथरस के बहुत से आएलडी नेता तो दबी जुबान से यह कहने लगे हैं कि जब पिता-पुत्र के चुनाव लड़ने को ही स्‍थान नहीं है तो वह पार्टी में किसी और को क्‍या चुनाव लडवाएंगे।
मथुरा के एक वरिष्‍ठ आएलडी नेता का कहना है कि चौधरी अजीत सिंह ने वक्‍त रहते मौके की नजाकत को नहीं भांपा तो तय है कि वह चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत के आखिरी मुग़ल साबित होंगे और आरएलडी का नाम इतिहास बनकर मात्र कागजों में सिमट कर रह जाएगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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