ऋषि Kapoor ने आत्मकथा में किया डॉन दाऊद इब्राहिम से मुलाकात का ज़िक्र

Rishi Kapoor mentioned met Dawood Ibrahim in autobiography
ऋषि Kapoor ने आत्मकथा में किया डॉन दाऊद इब्राहिम से मुलाकात का जिक्र

मुंबई। ऋषि कपूर ने आत्मकथा ‘खुल्लम खुल्ला ऋषि Kapoor अन्सेन्सर्ड’ में अपनी जिंदगी के दिलचस्प पहलुओं पर खुलकर बात की है। मसलन, अंडरवर्ल्ड के डॉन दाऊद इब्राहिम से उनकी मुलाकात और डिप्रेशन के दौर के बारे में। उनकी आत्मकथा के कुछ रोचक अंश कुछ इस तरह हैं:
शोहरत ने मुझे अच्छे लोगों के साथ ही संदिग्ध लोगों से भी मिलवाया। इनमें से एक था दाऊद इब्राहिम। यह साल 1988 की बात है। मैं अपने करीबी दोस्त बिट्टू आनंद के साथ आशा भोंसले और आरडी बर्मन के प्रोग्राम में शामिल होने दुबई आया था। दाऊद का एक आदमी हमेशा एयरपोर्ट पर रहता था। जब मैं वहां से जा रहा था तभी एक अजनबी मेरे पास आया। उसने मुझे फोन दिया और कहा, दाऊद साब बात करेंगे। जाहिर है, यह 1993 के मुंबई ब्लास्ट से पहले की घटना थी और उस वक्त मैं दाऊद को भगोड़ा नहीं समझता था। तब तक वह महाराष्ट्र के लोगों का दुश्मन भी नहीं था। या कम से मुझे ऐसा लगता था। दाऊद ने मेरा स्वागत किया और कहा,’किसी भी चीज की जरूरत हो तो बस मुझे बता दें।’ उसने मुझे अपने घर भी बुलाया। मैं भौंचक्का था।
बाद में मुझे एक गोरे, मोटे लड़के से मिलवाया गया जो ब्रिटिश जैसा दिखता था। वह दाऊद का राइट हैंड बाबा था। उसने मुझसे कहा,’दाऊद साब आपके साथ चाय पीना चाहते हैं।’ मुझे इसमें कोई बुराई नजर नहीं आई और मैंने न्योता स्वीकार कर लिया। उस शाम मुझे और बिट्टू को हमारे होटल से एक चमकती हुई रोल्स रॉयस में ले जाया गया। रास्ते में हमें अहसास हुआ कि हमारी कार सर्कल में जा रही है, इसलिए मैं उसके घर की सही लोकेशन नहीं बता सकता।
दाऊद सफेद रंग की शानदार इटैलियन ड्रेस में आया और उसने गर्मजोशी के साथ हमारा स्वागत किया। उसने माफी मांगने के अंदाज में कहा,’मैंने आपको चाय के लिए इसलिए बुलाया क्योंकि मैं शराब नहीं पीता।’ फिर हमारा चाय-बिस्किट सेशन तकरीबन चार घंटे तक चला। उसने बहुत सी चीजों के बारे में बात की, अपनी कुछ आपराधिक गतिविधियों के बारे में भी, जिनके लिए उसे कोई पछतावा नहीं था।
उसने कहा, मैंने छोटी-मोटी चोरियां की हैं लेकिन कभी किसी को जान से नहीं मारा। हालांकि मैंने किसी को मरवाया जरूर है।’ दाऊद ने बताया कि उसने मुंबई में किसी को झूठ बोलने की वजह से गोली मरवाई। मुझे ठीक से याद नहीं है कि उसने क्या बताया लेकिन उसने शायद ऐसा इसलिए कराया क्योंकि वह शख्स अल्लाह के हुक्म के खिलाफ गया था। दाऊद ने बताया,’मैं अल्लाह का संदेशवाहक था इसलिए हमने पहले उसकी जीभ में गोली मारी और फिर खोपड़ी में।’ डायरेक्टर राहुल रवैल ने अपनी फिल्म ‘अर्जुन’ (1985) में कोर्टरूम मर्डर का सीन इसी के मुताबिक फिल्माया था।
दाऊद ने मुझे बताया कि मैं उसे फिल्म ‘तवायफ’ में बहुत पसंद आया क्योंकि उसमें मेरे किरदार का नाम दाऊद था। उसने कहा कि वह मेरे पिता जी और अंकल को बहुत पसंद करता है। उसने दिलिप कुमार, मुकरी और महमूद की भी तारीफ की। दाऊद घर जाते वक्त मैं काफी घबराया हुआ था लेकिन शाम बीतते-बीतते मेरी घबराहट कम हो गई है। इन चार घंटों में हमने कई कप चाय पी। उसने मुझसे फिर से पूछा कि मुझे किसी चीज की जरूरत तो नहीं है। उसके शब्द थे,’आपको कितने भी पैसों की जरूरत हो, किसी भी चीज जरूरत हो तो आप मुझसे कह सकते हैं।’ मैंने उसका शुक्रिया अदा किया और कहा कि हमारे पास सब कुछ है।
उसके बाद मैं दाऊद से सिर्फ एक बार मिला, दुबई में। मुझे जूते खरीदने का बहुत शौक है। उस दिन मैं और नीतू एक रेड शू कंपनी नाम के एक लेबनीज स्टोर में घूम रहे थे। दाऊद भी वहीं था। उसके हाथ में एक मोबाइल फोन था और वह 8-10 बॉडीगार्ड्स से घिरा हुआ था। इस बार उसने कहा,’आपको जो कुछ चाहिए, मैं खरीदता हूं।’ लेकिन मैंने कहा कि मैं अपनी शॉपिंग खुद करना चाहूंगा। उसने मुझे अपना मोबाइल नंबर दिया लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सका क्योंकि यह 1989 की बात है और तब भारत में मोबाइल फोन्स नहीं थे।
आखिर में दाऊद ने कहा,’मैं इसलिए भागा हुआ हूं क्योंकि भारत में मुझे इंसाफ नहीं मिलेगा। वहां बहुत से लोग मेरे खिलाफ हैं। बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें मैंने खरीद रखा है। मैं कई नेताओं को भी पैसे देता हूं और वे मेरी जेब में हैं।’ मैंने उससे कहा,’दाऊद, प्लीज मुझे इन सबसे दूर रखो यार। मैं एक ऐक्टर हूं और इन सब में नहीं पड़ना चाहता।’ उसके बाद में दाऊद से कभी नहीं मिला। हालांकि उसके परिवार के कुछ सदस्यों से कई बार मेरी मुलाकात हुई। मैंने एक फिल्म बनाई थी- श्रीमान आशिक। फिल्म के गानों के बोल दाऊद के भाई नूरा ने लिखे थे। उसे लिखने का शौक था।
-एजेंसी

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