चीफ जस्‍टिस पर यौन उत्‍पीड़न के आरोपों को लेकर क्‍या कहते हैं रिटायर्ड जज ?

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय एक गंभीर संकट से गुज़र रहा है. सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व कर्मचारी ने 19 अप्रैल को मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे.
आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक समिति गठित की गई थी. जांच रिपोर्ट में छह मई को जस्टिस गोगोई को क्लीन चिट दे दी गई.
कई रिटायर्ड जजों का कहना है कि इस मामले को जैसे संभालना चाहिए था वैसे नहीं संभाला गया.
जस्टिस रंजन गोगोई ने आरोपों को निराधार बताते हुए कहा था कि ये सुप्रीम कोर्ट के ख़िलाफ़ रची जा रही बड़ी साज़िश का यह हिस्सा है. आरोपों के बाद जस्टिस गोगोई ने कहा था शिकायतकर्ता के पीछे कुछ बड़ी ताक़तें हैं जो सुप्रीम कोर्ट को अस्थिर करना चाहती हैं.
बीबीसी ने जिन रिटायर्ड जजों से बात की उनमे से कुछ ने जांच प्रक्रिया में कमी बताई.
हालांकि सभी इस बात पर सहमत थे कि इन दिनों सुप्रीम कोर्ट एक गंभीर संकट का शिकार है.
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आरएस सोधी ने भावुक हो कर कहा, “सर्वोच्च न्यायालय की विश्वसनीयता पर चोट लगी है.”
देश की सबसे बड़ी अदालत की वर्तमान स्थिति पर उन्होंने कहा, “मैं बहुत आहत हूं.”
सुप्रीम कोर्ट की एक और रिटायर्ड जज ज्ञान सुधा मिश्रा कहती हैं, “आरोप सही हों या ग़लत लेकिन जो कुछ भी हो रहा है वो एक बहुत ही दुखद घटना है.”
शिकायतकर्ता महिला ने छह मई को आई रिपोर्ट के बाद एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इसे ‘अन्याय’ बताया था. उन्होंने कहा है कि, “मुझे जो डर था वही हुआ और देश के उच्चतम न्यायालय से इंसाफ़ की मेरी सभी उम्मीदें टूट गईं हैं.”
इस रिपोर्ट की एक कॉपी जस्टिस रंजन गोगोई को भी सौंपी गई है. शिकायतकर्ता महिला को रिपोर्ट की प्रति नहीं दी गई है.
महिला का कहना है कि रिपोर्ट देखे बिना वो ये नहीं जान सकतीं कि उनके आरोपों को किस बुनियाद पर ख़ारिज किया गया है.
सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज अशोक गांगुली ने कोलकाता से फ़ोन पर कहा कि वो कुछ प्रतिक्रिया नहीं देना चाहते क्योंकि वो इस रिपोर्ट के ख़िलाफ़ बहुत कुछ कह सकते हैं. उन्होंने कहा, “लेकिन मैं ये ज़रूर कहूंगा कि मुझे महिला की ओर से बहुत खेद है”.
जस्टिस आरएस सोधी कहते हैं कि जांच की प्रक्रिया “थोड़ी त्रुटिपूर्ण” थी. उनका कहना था कि आरोप लगाने वाली महिला ने पूछताछ के दौरान अगर वकील माँगा था तो उसकी मांग पूरी होनी चाहिए थी”.
जस्टिस सुधा मिश्रा के अनुसार महिला ने लड़ाई शुरू की लेकिन ठीक समय पर पीछे हट गई. उन्होंने कहा, “महिला का केवल बयान दर्ज किया जा रहा था. उस समय वकील की ज़रूरत नहीं होती है. क़ानूनी रूप से ये केस कमज़ोर है.”
जस्टिस सोधी के मुताबिक़ महिला की वकील की मांग पूरी करनी चाहिए थी.
जजों की चिंता इस बात की थी कि सुप्रीम कोर्ट की मर्यादा और प्रतिष्ठा को बहाल कैसे किया जाए. जस्टिस सोधी कहते हैं, ”शिकायतकर्ता महिला अगर ये मांग करे कि जांच दोबारा हो तो उसकी मांग स्वीकार कर लेनी चाहिए और उसे अपना वकील साथ में लाने की अनुमति होनी चाहिए. शायद इससे अदालत की विश्वसनीयता बहाल हो”
जस्टिस गांगुली कहते हैं इसमें लंबा समय लगेगा. रिटायर्ड जजों का कहना था कि मामले की तह तक जाना ज़रूरी है और इस उच्चतम संस्था की प्रतिष्ठा को बहाल करने के लिए हर क़दम को उठाना चाहिए.
-BBC

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