हिमाचल प्रदेश में बंदरों को मारने के आदेश का विरोध

शिमला। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने हिमाचल प्रदेश में बंदरों को एक साल के लिए ‘विनाशक’ घोषित किया है। शिमला के स्थानीय अधिकारियों को इस हिंसक जानवर को गैर-वन वाले इलाकों में मारने के लिए एक साल का समय दिया गया है। हालांकि पर्यावरण मंत्रालय के इस फैसले खिलाफ पशुप्रेमी खड़े हो गए हैं और उन्होंने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है।
राज्य सरकार के अनुरोध के बाद केंद्र सरकार ने यह अधिसूचना पिछले हफ्ते जारी की है। राज्य सरकार ने केंद्र को रिपोर्ट भेजी थी कि किस तरह जंगलों के बाहर रीसस मकाक प्रजाति के बंदर बहुत बढ़ गए हैं और वे बड़े पैमाने पर कृषि के साथ ही लोगों के जीवन और संपत्ति के लिए संकट बन रहे हैं। हालांकि रीसस मकाक बंदर वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची II के तहत संरक्षित प्रजाति है लेकिन खतरा होने पर कानून इन्हें एक साल के लिए हिंसक घोषित करके इनका शिकार करने की अनुमति देता है।
पशु अधिकारों के लिए काम करने वाली गौरी मौलेखी ने कहा कि राज्य और केंद्र सरकार द्वारा मकाक को हिंसक घोषित करना ठीक नहीं है। सरकार को चाहिए कि इस तरह के आदेश की बजाए वनों और वन्यजीवों के कुप्रबंधन को लेकर उचित कदम उठाए। हिमाचल प्रदेश वन विभाग की वेबसाइट राज्य में बंदरों की संख्या में स्पष्ट रूप से गिरावट को दर्शाती है, फिर भी केंद्र ने इन्हें हिंसक घोषित किया है।
पिछले उदाहरणों का हवाला देते हुए गौरी ने कहा कि सरकार ने गलत तरीके से बंदरों की नसबंदी में पचास करोड़ रुपये खर्च किए। जंगली जानवरों की बड़े पैमाने पर सर्जिकल नसबंदी की गई और अब उन्हें मारने के लिए एक अधिसूचना जारी कर दी गई।
मंत्रालय ने 11 जुलाई को जारी एक अधिसूचना में कहा कि केंद्र सरकार ने वनों में वन्यजीवों के संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए इस प्रजाति की स्थानीय आबादी को मानव जीवन, फसलों और राज्य की अन्य संपत्तियों को नुकसान को कम करने के लिए आवश्यक माना है।
पर्यावरण मंत्रालय का इस तरह का फैसला पहली बार नहीं है। इससे पहले उत्तराखंड के जंगली सुअरों को भी हिंसक घोषित किया गया था। पिछले साल नवंबर में आई इस अधिसूचना में वहां के प्रशासन को जंगली सुअरों को 13 जिलों के कई तहसीलों में मारने की अनुमति दी गई थी।
-एजेंसियां

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