नाव खेने की विरासत को संजोए हुए हैं इस द्वीप के निवासी…

नॉर्वे के पश्चिमी क्षेत्र में सोलंद क़रीब 1700 से ज़्यादा छोटे-छोटे द्वीपों का समूह है लेकिन इनमें से 20 द्वीप ही आबाद हैं. इन्हें सुलिनजेन कहते हैं. नावें खेना और समंदर में जीव पकड़ना इनका पुश्तैनी पेशा है.
नॉर्वे के द्वीप समूह सोलंद की मेयर गनम एमडेल मोंग्साद कहती हैं कि नाव चलाना यहां के लोगों विरासत हैं. हम उसे संजोने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.
यहां के बहुत से स्थानीय लोग तो ख़ुद को वाइकिंग के दौर का बताते हैं. 1960 में सड़क बनने से पहले तक ये इलाक़ा नॉर्वे के मुख्य शहरों औऱ इलाक़ों से कटा हुआ था. हार्डबेक इस द्वीपसमूद का प्रशासनिक और आर्थिक केंद्र है. सदियों से समुद्र ही यहां के लोगों की रोज़ी-रोटी का ज़रिया है और समुद्र ही यहां का राजमार्ग है.
नई तकनीक और अर्थव्यवस्था ने हमारी ज़िंदगी पर गहरा असर डाला है. बेशक इन दोनों की वजह से हमारा रहन-सहन बेहतर हुआ है. लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि इनकी वजह से हमारी संस्कृति को ठेस पहुंची है.
उसे अपना वास्तविक रूप खोना पड़ा है. लेकिन जिन्हें अपनी कला और संस्कृति से प्यार होता है, वो उसे संजोने का हर संभव प्रयास करते हैं. इसकी एक जीती जागती मिसाल हैं नॉर्वे के रोर मोए, जो वर्षों से इस इलाक़े की परंपराओं को ना सिर्फ़ नई पीढ़ी को सिखा रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे संजो रहे हैं.
सोग्नफ़्योर्ड यहां का सबसे लंबा और गहरा समुद्री मार्ग है जो पहाड़ों के बीच से गुज़रता है. ये एक तंग रास्ता है और यहां तक पहुंचने के लिए पोस्टल बोट ही इकलौता ज़रिया हैं.
ये बोट प्रशासनिक केंद्र हार्डबेक से निकलती हैं. इस बोट सर्विस का काम यहां सदियों से चला आ रहा है. इन्हीं बोट के ज़रिए द्वीप पर रहने वालों तक ज़रूरत का सामान और ख़बरें पहुंचाई जाती है.
यूं तो इस सेवा का लाभ सबसे ज़्यादा यहां के स्थानीय लोग ही उठाते हैं. लेकिन, गर्मी के मौसम में यहां सैलानी और रिसर्चर भी पहुंचते हैं. इनकी आमद से स्थानीय लोगों की चार पैसे ज़्यादा की कमाई हो जाती है.
जीवन रेखा
रोर मोए पिछले 20 साल से लिटिल फ़रोए द्वीप पर टिन के घर में रह रहे हैं. ये घर उन्होंने ख़ुद बनाया है. उन्हें इस इलाक़े की परंपराओं से प्यार है. वो इन्हें संजोना चाहते हैं लिहाज़ा अपने इसी प्रोजेक्ट पर काम के लिए उन्होंने इस जगह को चुना है.
वो कहते हैं कि नाव इस इलाक़े की जीवन रेखा है और इन बोट के बनाने का तरीक़ा अपने आप में नायाब है. वो इस परंपरा के नमूने को आने वाली पीढ़ियों के लिए लिखित और फोटोग्राफ़ी के रूप में संजोना चाहते हैं. हालांकि नई तकनीक ने बहुत कुछ बदल दिया है. जैसे लकड़ी की जगह फायबर ग्लास ने ले ली है.
फिर भी आने वाली पीढ़ियों को पता होने चाहिए कि उनके पूर्वज इस इलाके में कैसे काम करते थे. लिटिल फ़रोए द्वीप पर रोर मोए ने ना सिर्फ बोट यार्ड बनाया है. बल्कि, नई पीढ़ी को बोट बनाने का हुनर सिखाने के लिए समर कैंप भी वो लगाते हैं.
साथ ही वो पारंपरिक तरीक़ों और सामान का इस्तेमाल करके वाइकिंग दौर की नाव को ठीक करके उन्हें पढ़ाने के मक़सद के तौर पर इस्तेमाल करने की योजना बना रहे हैं.
रोर कहते हैं यहां के पुराने लोगों ने अपने तजुर्बों से बोट बनाना और समुद्र में उनका सही इस्तेमाल करना सीखा था. यही तजुर्बा उन्होंने अपनी आने वाली पीढ़ियों को दिया था. ख़ुद रोर ने भी पारंपरिक बोट बनाने की कला अपने दादा से सीखी थी.
हालांकि अब बोट बनाने में नए तरह के सामान और मशीनों का इस्तेमाल होने लगा है. लेकिन रोर कहते हैं वो लोगों को ऐसे नायाब तरीक़े सिखाना चाहते हैं, जिससे किसी भी मुश्किल में उन्हें परेशान ना होना पड़े.
मिसाल के लिए अगर बीच समुद्र में नाव टूट जाए या उसमें कोई ख़राबी आ जाए तो कैसे निपटा जाए. अपने समर कैंप में वो लोगों को यही विरासत बांटते हैं.
संस्कृति संजोने की मुहिम
1960 में नॉर्वे में तेल की खोज होने के बाद यहां की अर्थव्यवस्था में तेज़ी से उछाल आया. एयरलाइंस, रेलवे, स्टील के कारखाने, पावर प्लांट, सड़कों आदि पर मोटी रक़म ख़र्च की गई.
लेकिन ये तरक़्क़ी सिर्फ़ शहरों तक ही सीमित रही. नतीजतन इन द्वीप समूहों से लोगों ने शहरों को पलायन शुरू कर दिया. उन्नीसवीं सदी में सोलंद द्वीप की आबादी क़रीब दो हज़ार थी. 2018 में यहां की जनसंख्या सिर्फ़ 814 तक रह गई.
नई तकनीक आने के बाद भी द्वीप पर बाक़ी बचे लोगों का पेशा ज़हाज़रानी और मछली पकड़ना ही था. कुछ समय बाद जब यहां भी तरक़्क़ी की रफ़्तार पहुंची तो उसने पुरानी नावों को म्यूज़ियम में समेट दिया. नाव का सफ़र महज़ क़िस्से कहानियों और यादों में सिमट गया. लोगों ने रिवायती नावों की जगह मॉडर्न बोट ख़रीद लीं.
रोर कहते हैं ये सब देख कर उन्हें तकलीफ़ हुई कि सदियों पुरानी परंपरा तेज़ी से ख़त्म हो रही थी. आज भी लोगों के पास पुराने औज़ार और बोट बनाने का साज़ो सामान तो है. लेकिन, उसे बनाने या पुरानी नाव की मरम्मत करना किसी को नहीं आता इसीलिए उन्होंने ये कला नई पीढ़ी को सिखाने की ठानी. आज वो इस द्वीप पर बिल्कुल तन्हा रहते हैं लेकिन उन्हें कोई शिकायत नहीं है. बल्कि उन्हें खुशी है कि वो अपनी परंपरा को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं.
रोर के प्रयासों के बाद अब अन्य लोगों ने भी अपनी कला और संस्कृति संजोने में सहयोग देना शुरू कर दिया है. ये लोगों की कोशिशों का ही नतीजा था कि 2009 में नॉर्वे की 15 धरोहरों में से एक सोलंद को चुना गया.
और 2017 में प्राकृतिक सौंदर्य को बचाए रखने के लिए इसे सोगनफ़ियोर्ड कोस्टल पार्क का नाम दिया गया. यही नहीं इस पार्क ने इसी साल मार्च महीने में यूनेस्को ग्लोबल जियोपार्क का दर्ज़ा भी हासिल करने की कोशिश शुरू की है.
ये द्वीप अब लोगों के लिए एक बड़ा टूरिस्ट प्लेस बन चुका है. अप्रैल से अक्टूबर तक लोग यहां गर्मियां गुज़ारने आते हैं. आज लोग इसे वेनिस ऑफ़ नॉर्वे कहते हैं. सर्दियां भी यहां कि कम ख़ूबसूरत नहीं हैं. दिन भर सूरज की रोशनी दूर रहती है और रातें तूफ़ानी होती हैं लेकिन गुनगुनी गर्मी वाले कमरे अलग ही अनुभव कराते हैं.
सैलानियों की बढ़ती तादाद स्थानीय लोगों के लिए ख़ुशी का सबब है. लेकिन यहां स्थाई निवासियों की भी सख़्त ज़रूरत है. ख़ास तौर से नौजवानों की जो यहां रह कर अपने परिवार बसाएं और इस इलाक़ी आबादी बढ़ाएं. सोलंद की मेयर गनम एमडेल मोंग्साद कहती हैं कि अब लोग अपने पुराने मुक़ाम की ओर लौट रहे हैं.
सोलंद में आज क़रीब 20 मुल्कों के लोग रहते हैं. लौट कर आने वाले लोग नए हुनर, तकनीक और भरपूर पैसे के साथ आ रहे हैं. मिसाल के लिए स्थानीय चर्च में रूस की निवासी पियानो बजाती हैं और सामुदायिक कार्यक्रमों में संगीत से लोगों का दिल जीतती हैं.
बहुत से स्कैंडिनेवियाई नौजवान अपने पूरे परिवार के साथ यहां बस गए हैं. और ये सभी बाहर की ज़िंदगी से स्थानीय लोगों को रूबरू कराते हैं.
-एजेंसियां

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