सिख नरसंहार पर सुप्रीम कोर्ट से नियुक्‍त धींगड़ा कमेटी की रिपोर्ट: राजीव गांधी सरकार ने मुकदमों पर पर्दा डाला

नई दिल्‍ली। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से नियुक्त जस्टिस एस एन धींगड़ा कमेटी ने 1984 में सिख विरोधी दंगाइयों की धर-पकड़ के प्रति उदासीनता दिखाने के लिए तत्कालीन केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को लताड़ लगाई है।
समिति ने दोनों पर दंगाइयों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमों पर पर्दा डालने के लिए भी नाराजगी जाहिर की।
जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग पर भी उठाई उंगली
समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘दंगे के तुरंत बाद और कुछ वर्षों बाद तक बड़ी तादाद में पीड़ित विभिन्न एजेंसियों (जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग समेत) से गुहार लगाते रहे, बावजूद इसके बड़ी संख्या में हत्या, दंगा, लूट, आगजनी के अपराधियों की पहचान नहीं की गई और न दंडित किया गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पुलिस ने अथॉरिटीज ने दोषियों को दंडित करने के इरादे से कानूनी कार्यवाही में दिलचस्पी नहीं दिखाई।’
साफ है कि कमेटी की रिपोर्ट में गंभीर अपराधों को नजरअंदाज करने का आरोप तत्कालीन राजीव गांधी सरकार पर लगाया गया।
रिपोर्ट कहती है, ‘पुलिस-प्रशासन का पूरा प्रयास दंगे से जुड़े आपराधिक मामलों पर पर्देदारी करने का जान पड़ता है।’
जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग ने अक्टूबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख समुदाय के लोगों के खिलाफ हत्या, दंगा, हिंसा और आगजनी के पीड़ितों द्वारा दर्ज शिकायतों पर जो रवैया अपनाया, कमेटी ने उस पर भी फटकार लगाई। रिपोर्ट में कहा गया, ‘तथ्यों से यह भी स्पष्ट है कि जस्टिस मिश्रा आयोग को सैकड़ों हलफनामे मिले जिनमें हत्या, आगजनी, लूट आदि के आरोपियों के नाम बताए गए थे। इन हलफनामों पर आधारित एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिए जाने की जगह एक बाद एक समितियां बनाई गईं जिससे मुकदमा दर्ज करने में कई वर्ष लग गए।’
निचली अदालतों के फैसलों पर आपत्ति
जस्टिस एस एन धींगड़ा समिति ने निचली अदालतों में आरोपियों को दोषमुक्त किए जाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया। इसने अपनी रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट से कहा, ‘निचली अदलातों के जजों ने एफआईआर में देरी, गवाहों के बयान दर्ज करने में विलंब और कुछ और ऐसा ही हवाला देकर गवाहों के बयान खारिज कर दिए।’
समिति ने 1995 में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एस एस बल द्वारा आरोपियों को दोषमुक्त करने के छह फैसलों के विरुद्ध अपील दायर करने की सिफारिश की। इनमें चार एफआईआर दिल्ली के नंद नगरी इलाके में जबकि एक दिल्ली कैंटोनेंट और एक नांगलोई इलाके में दर्ज करवाई गई थी।
समिति ने एक अन्य अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एसपीएस चौधरी के आदेश को लेकर भी यही सिफारिश की है जिन्होंने दिल्ली कैंटोनमेंट एरिया में हुए सिख विरोधी दंगों के केस में 1986 में आरोपियों को मुक्त कर दिया था। समिति ने यह भी पाया कि कल्याणपुरी थाने के एसएचओ सुरवीर सिंह त्यागी भी दंगाइयों को साथ साजिश में शामिल थे। समिति ने सुरवीर का केस दिल्ली पुलिस की दंगा निरोधी प्रकोष्ठ को भेजा जाए।
जस्टिस एस एन धींगड़ा समिति की रिपोर्ट से इस विचार को और बल मिलेगा कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी की सरकार ने हिंसा होने दी। संभव है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस के खिलाफ इसका इस्तेमाल हो। सॉलिसिटर जनर तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्य कांत की बेंच को बताया कि केंद्र सरकार जस्टिस धींगड़ा समिति की रिपोर्ट की सिफारिशें मान ली हैं और इनके मुताबिक कार्यवाही भी की जाएगी।
-एजेंसियां

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