अहंकार के सामने सत्य का नहीं, लेकिन भ्रम का भूत होता है प्रभावी

जीवन में भ्रम डाल रखे हैं, अर्थ जोड़ रखे हैं, अब तो लगता है कि सम्पूर्ण जीवन स्वप्न और भ्रम के सहारे ही है। बचपन में किसी ने समझा दिया कि शाम को घर से मत निकलना क्योंकि पेड़ पर भूत बैठा है, अलमारी में मिठाई रखी है और बच्चे को कहते हैं, अलमारी में भूत है मत खोलना।
अलमारी में मिठाई है, लेकिन भूत काम कर रहा है, बच्चा जिस कमरे में अलमारी है, उसमें जाने से भी डर रहा है। भूत होता नहीं, मिठाई होती है, लेकिन बच्चा भीतर नहीं जाता। भूत काम कर गया। यदि बच्चे को मिठाई से होने वाली हानि गिनाते भी तो कहाँ समझ में आती। सत्य था परंतु प्रभावी नहीं, भूत असत्य है पर कारगर है। जिसका अस्तित्व ही नहीं है वो मिठाई और बच्चे के बीच खड़ा है। यह भ्रम का जाल तो बचपन से ही लिपटा हुआ है। जब काम चल रहा है तो विस्तार में क्यों जाएँ- सत्य को पहचाने क्यों ? भ्रम काम कर रहा है, भूत कारगर हैं! अलमारी और पेड़ के भूत का हौवा तो कब का उतर गया, पर अब और बहुत से भूत दिमाग़ पर चढ़े बैठे हैं ! खुद ही हौवा बने घूम रहे हैं। कितना बड़ा भ्रम है, लोगों को डराने में ही आनन्द मिल रहा है। सोचते हैं कि जब नक़ली सौदे में फ़ायदा दिख रहा है तो खरा सौदा क्यों करें। देखा जाए तो नश्वर संसार और खोखले जीवन में पास पल्ले तो कुछ है नहीं, सौदा किसका होगा, यहाँ भी भ्रम ही सकून दे रहा है। सत्य यही है कि यदि भ्रम दिमाग़ से निकल गए तो जीवन कष्टदायी हो जाएगा।
यदि सत्य को पहचान कर स्वीकार कर लिया तो जिस अहंकार को अपनी सम्पदा मान आत्ममुग्ध फिर रहे हैं, उसका तो आधार ही खिसक जाएगा। यदि बैसाखी के अस्तित्व को समझ लिया तो कमजोर टाँगे हीनता का बोध कराती रहेंगी। अच्छा है कि भ्रम बना रहे जीवन में कि बैसाखियों को टांगों की ज़रूरत है। यह जो काम, क्रोध, लोभ, मोह हैं, बड़े मज़बूत खिलाड़ी हैं, जल्दी न हार मानते हैं और न मैदान छोड़ते है, यदि इनको हरा दिया तो भ्रम तो जड़ से ही मिट जाएगा। यह जो अहंकार है, वो इन्हीं रथों पर तो सवार रहता है। यदि सत्य को जान लिया तो जिनको आज ताक़त और पूँजी समझ कर सहेज रहे हैं, उन्हीं में दरिद्रता और हीनता दिखने लगेगी। अहंकार को मुकुट की तरह धारण किए इतराए घूम रहे हैं, वह तो ज़मीन पर आ गिरेगा।
अनेक मनोवैज्ञानिक शोधों में एक बात बार-बार स्पष्ट हुई है कि अहंकार के पीछे हीन भावना छुपी रहती है। अहंकार का टोकरा लिए घूम रहे व्यक्ति प्रायः हीन भावना से ग्रस्त होते हैं।
अहंकार के भाव की पूर्ति या तो किसी अन्य के अहंकार को चोट पहुँचा कर होगी अथवा किसी के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर। किसी महापुरुष ने कहा है कि अहंकार की पूर्ति की एक चालाकी पूर्ण युक्ति भी है!
अपनी प्रशंसा सुनना चाहते हो तो किसी स्त्री से कहो कि “तुमसे सुन्दर कोई नहीं है”! प्रतीक्षा करो वह कहेगी कि “तुमसे भी अच्छा कोई नहीं है। कभी किसी सभा में ध्यान से देखना एक नेता दूसरे को बड़ा और महान बताएगा, दूसरा पहले की प्रशंसा करेगा, फिर तीसरे की! अर्थात् मिलकर एक दूसरे की प्रशंसा करेंगे।
एक वक्ता मंच पर विराजमान किसी अन्य को महान और त्यागी बताएँगे, फिर वह पहले का गुणगान करेगा, यह सब लयबद्ध और क्रमबद्ध तरीक़े से चलेगा, देखोगे कि अहंकार अप्रत्यक्ष रूप से पुष्ट हो रहा है! अपना मार्ग बना रहा है।
अहंकार अपना मार्ग नहीं छोड़ता किंतु स्वरूप बदल लेगा। निर्बल के सामने अंगारे उगल रहे अहंकारी मुख से, सबल को देखते ही फ़ूल झरने लगेंगे क्योंकि यहाँ लोभ अथवा स्वार्थ काम कर रहा है। काम अथवा मोह के रथ पर सवार अहंकार ज़रूरी नहीं है कि किसी के सामने ही प्रकट हो, यह तो अकेले में भी पक्के राग सुना-सुना कर मुग्ध करता रहता है। ध्यान से देखोगे तो ऐसा मुग्ध व्यक्ति स्वयं से निरंतर बात करता रहता हैं, भ्रम हो सकता है कि वह किसी की सुन अथवा समझ रहा है। काम और मोह से, किसी की सीख से छूट जाओ, यह बहुत कठिन है।
जिसके साथ सत्य होता है अथवा कुछ सामर्थ्य प्राप्त होती है, वह तो निश्चिंत है कि मेरे पास है किंतु जो अनावश्यक अपने को सामर्थ्यवान दिखाने का प्रयास कर रहा है, अधिकार पत्र को गले में लटकाए घूम रहा है तो समझ लो वह कुंठा का मारा, हीनभावना से ग्रसित है। ऐसा क्रोध और लोभ के रथ पर सवार अहंकार जब भी बजेगा पाश्चात्य संगीत की तरह धूम धड़ाके से ही बजेगा। अहंकार खुद तो उछल कूद कर ही रहा होगा, आसपास में अस्थिर सबको कर देगा। जिस प्रकार एक नृत्यांगना की कला कद्रदान के समक्ष ही प्रकट होती है, यह छद्म अहंकार चार-छह लोगों के सामने ही प्रकट होता है, अकेले में में तो छद्म अहंकार शांत ही बना रहता हैं।
यदि किसी के पास शक्ति है तो उसे क्या ज़रूरत है अहंकार की? उसकी शक्ति प्रत्यक्ष में है, उसे कोई ज़रूरत नहीं अपनी शक्ति की घोषणा करने की, दण्ड बैठक कर प्रदर्शित करने की।
गोस्वामी तुलसी दास जी ही कह सकते हैं कि “मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर”।
सूरदास जी महाराज ही लिख सकते हैं कि “मो सम कौन कुटिल खल कामी”।
चीन ने भ्रम रूपी नक़ली सूरज बना लिया है। चूँकि झूठ है इसलिए बड़ा भारी प्रचार किया , ढोल बजा बजा कर बताया कि हमारे पास अपना सूरज है। अब चूँकि झूठ में अहंकार खोज रहे हो तो गाना बजाना तो करना ही पड़ेगा।
सूर्योदय तो रोज़ होता ही है। कोई प्रचार करना पड़ता है क्या? सूर्य नारायण बैंड बाजे बजा कर जगाते है कि मैं आ गया हूँ? सूर्य के उदय होते ही सभी चराचर स्वयं बता देते हैं कि सूर्योदय हो गया है। प्रकृति झूमने लगती है, फूल खिल उठते हैं, वृक्ष, सागर, नदियाँ, हवायें आदि चराचर जगत सभी अपने अपने तरीक़े से सूर्योदय की घोषणा करने लगते हैं। जो है उसको कोई आवश्यकता नहीं पड़ती बताने की, जताने की। उसकी सत्यता के तो अनेक साक्षी होते हैं।
नक़ली घी बेचना है तो दुकान पर बड़ा बड़ा लिखना होगा कि “असली घी की दुकान” हो सकता है कि नक़ली साबित करने वाले को इनाम देने की घोषणा भी लिख दो।
अहंकार के कारण सांसारिक वासनायें काम, क्रोध, लोभ, मोह ही हैं और अहंकार का निरन्तर प्रदर्शन इन्हीं विकारों का समेकित एवं प्रबल रूप है। जब सांसारिक वासनाएँ अधिक प्रभावी हो जाएँ तो व्यक्ति इन्हीं को अपनी शक्ति मान बैठता है। उसको पता ही नहीं चलता कि वह किस बात का अभिमान कर रहा है और क्यों कर रहा है? अभिमान का आधार तो वासनाएँ ही हैं और अपनी आंतरिक कमजोरियों को स्वीकारना अत्यंत कठिन है।
बच्चे रेत के घर बना रहे हैं, किसी का पैर यदि रेत के घरोंदे पर पड़ जाए तो आपस में मार पिटाई कर लेंगे। शाम हो रही है, माँ ने कहा वापस आ जाओ, अपने अपने रेत के घर पर लात मार कर रेत उड़ाते वापिस भाग जाएँगे। अब कोई पूछे व्यर्थ में ही क्यों लड़ लिए? जिसके लिए लड़े थे वो तो यहीं छूट गया।
एक राजा युद्ध करने जा रहा था। रास्ते में एक संत को देखा जो अपनी ही मस्ती में बैठे थे। उनके चेहरे पर अदभुत तेज देख कर राजा ने अपने रथ से उतर कर संत को प्रणाम किया। संत उसी निश्चिंतता से बैठे रहे! राजा है या गरीब कोई भाव में परिवर्तन नहीं हुआ। न कोई अपेक्षा न कोई लोभ। राजा अभिभूत था संत से मिलकर, लेकिन आगे जाना था क्योंकि उसे तो संसार जीतना था। संत से अनुमति माँगी तो संत ने पूछा कहाँ जा रहे हो। बोला आशीर्वाद दें मैं अमुक देश को जीतने जा रहा हूँ। संत ने पूछा उसके बाद? राजा बोला फिर अमुक देश को जीतना है। संत ने पूछा फिर उसके बाद ? राजा बोला अभी आगे सोचा नहीं, चूँकि आप पूछ रहे हैं तो अब सोचता हूँ कि उसके बाद आराम करूँगा।
संत बोले आराम के लिए इतने युद्ध क्यों? कौन तुम्हारे आराम में ख़लल डाल रहा है? मैं भी तो आराम ही कर रहा हूँ। चलो अभी से आराम करो। यदि तुमको महल में आराम नहीं मिल रहा, तो रहो मेरी कुटिया में और मेरी कुटिया इतनी बड़ी तो है कि हम दोनों आराम से रह सकते हैं।
कितनी विडम्बना है! महल में तो एक भी नहीं समा पाता है। यदि समा सकता तो एक के बाद एक महल की ज़रूरत नहीं पड़ती। गरीब की झोंपड़ी में कभी जगह कम नहीं पड़ती इसीलिए तो कभी दूसरी झोंपड़ी की लालसा भी नहीं करता अपितु जो है उसी को ठोकापीटी कर ठीक करने में लगा रहता है।
राजा बोला आपका वैभव शाश्वत है। आपका आग्रह स्वीकारने को दिल भी कर रहा है, परन्तु आधे रास्ते से वापिस कैसे लौटूँ। मैं जल्दी वापिस आऊँगा। संत ने कहा, तुम्हारी मर्जी लेकिन मैंने बहुत लोगों को यात्राओं पर जाते देखा, कोई वापस नहीं लौटता। और स्वार्थ की यात्राओं से क्या कभी कोई वापस लौटा है? सत्य ही है कि जीवन में, अपनी महत्वाकांक्षाओं और वासनाओं को जोड़ लेते हैं फिर इन्हीं में जीवन का उद्देश्य और शांति खोजने का मिथ्या प्रयास करते रहते हैं।
यही भ्रम है- अहंकार है, जो टिका हैं काम-क्रोध-लोभ और मोह के पायों पर। सारी ऊर्जा! काम-क्रोध और लोभ-मोह के इर्दगिर्द घूमती रहती है।
कोई पद की दौड़ में लगा है, जो मिल गया उससे बड़ा चाहिए। बड़ा पद मिल गया तो बड़ी जगह चाहिए ! फिर और कुछ चाहिए, परंतु सपने पूरे नहीं होंगे, कुछ न कुछ चाहिए ही ।
स्कूल में सिखाया गया जो आगे बैठे हैं, जो नम्बर वन के पायदान पर हैं, वही श्रेष्ठ हैं। बाक़ी सब भाग्य के भरोसे हैं। बस लग गए पहले नंबर की दौड़ में। यह अलग बात है कि जो लोग कथित आनंद के पायदान “पहले नम्बर” पर खड़े हैं, उनमें से आनंदित तो कोई दिख नहीं रहा है।
नीली बत्ती -लाल बत्ती लगी गाड़ी सेवा का अंग है अर्थात् जो मिली है कि कौशलपूर्वक बिना विलम्ब के कार्य कर सको। इसमें यदि सेवा भावना के अतिरिक्त अहंकार अथवा श्रेष्ठता का भाव उत्पन्न हो रहा है तो भ्रम है, जो सेवा के मूल उद्देश्य से ही प्रथक कर रहा है। यह भी सत्य है कि सेवा में हमेशा रहोगे नहीं और यदि भविष्य में सामान्य ट्रैफ़िक के साथ चलना ही है तो क्यों अनावश्यक अहंकारी गति को अपने जीवन में समाविष्ट करें। यह जीवन का यथार्थ नहीं अपितु क्षणिक काल के लिए प्राप्त पंख हैं। यदि अभी यथार्थ को विस्मृत कर दिया तो जब नीली बत्ती लाल बत्ती नहीं रहेगी, तब जीवन में दुःख और असंतोष आ जाएगा। हो सकता है कि हृदय में सम्पूर्ण भारतीय दर्शनशास्त्र की अनुभूति भी होना शुरू हो जाए।
यदि पराए धन से धर्म अथवा समाज सेवा के कार्य कर रहे हो अथवा किसी संस्था के माध्यम से अपनी सेवा दे रहे हो तो इसमें अपनी उपलब्धि नहीं सेवा देखो कि परमात्मा की कृपा से यह अवसर मिला है। यदि सेवा कार्यों में अपना बखान, अपनी प्रशंसा सुनने की आदत पड़ गयी है और यथार्थ से दूर होकर मिथ्या अहंकार में मग्न हो, तो यह जो भाव है, जीवन में सर्वदा दुःख,अवसाद और क्रोध ही उत्पन्न करेगा। उत्तम भाव केंद्र में परमात्मा की अनुभूति कराता है, निकृष्ट भाव स्वयं की। विचार करो क्या स्वयं समर्थ हो? अथवा सरकार/ संस्था के अंग हो? जब सब कुछ स्वयं नहीं हो, न ही स्वतंत्र हो अपितु सरकार/संस्था के उद्देश्यों के अनुरूप कार्य कर रहे हो तो मिथ्या अहंकार कैसा? अहंकार के प्रदर्शन के लिए भी पद अथवा माध्यम चाहिए। यह भी कह सकते हैं की अहंकार पद की अहमियत से फलता फ़ूलता है। अहंकार का प्रकटीकरण पद पर निर्भर करता है और इसके विपरीत विनम्रता पद को सुशोभित करती है।
यह जो प्रकृति का ताना बाना है अथवा यह जो संसार की व्यवस्थाएँ हैं, इनमें सबकी एक सीमित भूमिका है किंतु जब खुद को उसका एक स्तम्भ अथवा आधार मानकर व्यवहार करना शुरू कर दें तो अंतोगत्वा कष्ट ही अनुभव होगा।
जिस आभूषण को धारण कर इतरा रहे हो, भले ही इसके लिए अपनी सम्पन्नता को कारण मान प्रसन्न हो जाओ परंतु यदि गहराई में जाओगे तो देखोगे कि नंगे बदन खदानों से धातु अयस्क निकालते, विकट अग्नि में तपा कर धातु का स्वरूप देते, तपा कर- पीट कर सुन्दर आभूषण को बनाते श्रमिकों के कठिन परिश्रम को तो हृदय में प्रेम प्रकट हो उठेगा, न कि अहंकार।
अड़चन यहीं है और यहीं दृष्टि भेद भी है! दृष्टि मात्र आभूषण पर ही टिकी है क्योंकि इसकी सम्पूर्ण व्यवस्था को जानना ही नहीं चाहते। आग में धातु के साथ खुद को तपाते भूखे पेट मज़दूर की मजबूरी को यदि समझ लेंगे तो यह सम्पन्नता खोखली लगेगी और आभूषण बोझ लगने लगेंगे। ऐसा नहीं है कि जीवन के यथार्थ से पूर्णतः अनभिज्ञ हों, ऐसा भी नहीं कि जान कर भी अनजान बने हुए हैं। यह जो अहंकार है वह सत्य को सहज स्वीकार नहीं करने देता क्योंकि दुर्गुण शरीर में प्रवेश आसानी कर जाते हैं, निकलते आसानी से नहीं अपितु ऐसा भ्रम बनाते हैं कि इनको निकालना तो दूर स्वीकार करने से भी डरते हैं।
यह स्थिति ठीक वैसी होती है, जैसे एक कहानी में छिपकली राजमहल की दीवार पर छत से लटकी है और भयभीत है कि अगर वह छत से हट जाए तो कहीं छत ही गिर न जाए! वही तो संभाले हुए है।
परमात्मा को क्या अर्पित कर सकते हैं? इस सृष्टि में जो कुछ देख रहे हैं प्रकृति और परमात्मा की देन है। ऐसा कुछ है जो मनुष्य का अपना है ? संतजन कहते हैं कि अहंकार रूपी जो विकार है, यह मनुष्य ने खुद जीवन में प्रविष्ट किया है इसीलिए यदि कोई अपने अहंकार को ठाकुर जी को अर्पित करे तो ठाकुर जी इस भेंट को तुरंत स्वीकार करते हैं। अनेक ऐसे उदाहरण और दृष्टांत हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि अहंकार कभी किसी का रहा नहीं और नष्ट भी इसी जीवन में हुआ है।
ऐसे भी अनेक महापुरुष हुए हैं जिन्होंने कभी पद की सामर्थ्य से अपने को नहीं जोड़ा और पद पर रह कर भी अहंकार को पास भी नहीं फटकने दिया। ऐसे महापुरुष आज भी वंदनीय और अनुकरणीय हैं। ऐसे भी अनेकों उदाहरण हैं कि पदलोलुप अहंकारी जन, दुःख और अवसाद के कम्बल में लिपटे जीवन काट रहे हैं ।
अहंकार का मूलाच्छेदन बहुत कठिन है। स्वयं पूर्णावतार श्रीकृष्ण से गीता को आत्मसात् करने के उपरांत भी अर्जुन को अहंकार हुआ। प्रभु ने अर्जुन के अहंकार को दूर करने के लिए लीला की रचना की है।
भगवान कृष्ण ने ग्रहण स्नान के उपरांत अर्जुन से कहा कि गोपियों को व्रज तक सुरक्षित पहुँचा दो। महाभारत के युद्ध में विजय के उपरांत अपने बल के अहंकार में मग्न अर्जुन चल दिए गोपियों को व्रज तक पहुँचाने के लिए। प्रभु की लीला ! प्रसंग है रास्ते मैं वनवासियों ने गोपियों को अर्जुन से प्रथक कर दिया और अर्जुन का अहंकार चूर चूर हो गया।
मनुज बली नहीं होत है, समय होत बलवान !
भीलन लूटी गोपिका, वही अर्जुन वही बाण !!
अहंकार मात्र आध्यात्मिक और सांसारिक पतन, शोक संताप के मार्ग की ओर लेकर जाता है। जब अहंकार का भ्रम टूटता है तो जीवन अवसाद में ही बीतता है। जैसे शारीरिक रोगों का निदान और उपचार करते हैं, वैसे ही अंतः में छुपे रोगों का निदान और उपचार आवश्यक है और यही मार्ग कल्याणकारी भी है।
देहाभिमानगलिते ज्ञानेन परमात्मनः।
यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः॥
भाव यही है कि जब सत्य रूपी परमात्मा से जुड़ाव हो गया तो अभिमान निश्चित छूट जाएगा और सदैव समाधि की अवस्था के आनंद को प्राप्त करोगे, ऐसी समाधि अवस्था जहां सांसारिक वासनाएँ प्रभावी नहीं होंगी।
परमात्मा को क्या अर्पित कर सकते हैं? इस सृष्टि में जो कुछ देख रहे हैं प्रकृति और परमात्मा की देन है। ऐसा कुछ है जो मनुष्य का अपना है? संतजन कहते हैं कि अहंकार रूपी जो विकार है, यह मनुष्य ने खुद जीवन में प्रविष्ट किया है इसीलिए यदि कोई अपने अहंकार को ठाकुर जी को अर्पित करे तो ठाकुर जी इस भेंट को तुरंत स्वीकार करते हैं।
यदि “मैं “को यह पता चल जाए कि मेरी कोई सत्ता ही नहीं है, सब एक दूसरे के पूरक हैं, फिर न कुछ मेरा है, न कुछ पराया है! सब मेरे हैं और मैं सबका हूँ, यही भाव आएगा। सब कुछ प्रभु का है और उन्हीं को अर्पित है। ऐसे भाव से आसक्ति विलीन हो जाती है और साक्षी भाव का उदय होता है।

कप‍िल शर्मा , सच‍िव , श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा

 

– कप‍िल शर्मा,
सच‍िव, श्रीकृष्ण जन्मस्थान

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