गोपालदास नीरज के 93वेें जन्मदिन पर आज पढ़िए उनकी ये कविता

अलीगढ़। गोपालदास नीरज का आज जन्मदिन है, वे 4 जनवरी 1925 को जन्‍मे हिन्दी साहित्यकार, शिक्षक एवं कवि सम्मेलनों के मंचों पर काव्य वाचक एवं फ़िल्मों के गीत लेखक हैं। वे पहले व्यक्ति हैं जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया, पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से। यही नहीं, फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला।

आज पढ़िए उनकी ये कविता

यदि वाणी भी मिल जाए दर्पण को / गोपालदास “नीरज”

सुन्दरता ख़ुद से ही शरमा जाए
यदि वाणी भी मिल जाए दर्पण को !

खुबसूरत है हर फूल मगर उसका
कब मोल चुका पाया है सब मधुबन ?
जब प्रेम समर्पण देता है अपना
सौन्दर्य तभी करता है निज दर्शन,
अर्पण है सृजन और रुपान्तर भी,
पर अन्तर-योग बिना है नश्वर भी,
सच कहता हूँ हर मूरत बोल उठे
दो अश्रु हृदय दे दे यदि पाहन को !

सुन्दरता ख़ुद से ही शरमा जाए
यदि वाणी भी मिल जाए दर्पण को।
सौ बार भरी गगरी आ बादल ने
प्यासी पुतली यह किन्तु रही प्यासी,
साँसों ने जाने कैसा शाप दिया
बन गई देह हर मरघट की दासी

दुख ही दुख है जग में सब ओर कहीं,
लेकिन सुख का यह कहना झूठ नहीं,
‘सब की सब सृष्टि खिलौना बन जाए
यदि नज़र उमर की लगे न बचपन को !’

सुन्दरता ख़ुद से ही शरमा जाए
यदि वाणी मिल जाए दर्पण को !

रुक पाई अपनी हँसी न कलियों से
दुनिया ने लूट इसी से ली बगिया
इस कारण कालिख मुख पर मली गई
बदशक्ल रात पर मरने लगा दिया,

तुम उसे गालियाँ दो, कुछ बात नहीं
लेकिन शायद तुमको यह ज्ञात नहीं,
आदमी देवता ही होता जग में
भावुकता अगर न मिलती यौवन को !

सुन्दरता ख़ुद से ही शरमा जाए !
यदि वाणी भी मिल जाए दर्पण को !

है धूल बहुत नाचीज़ मगर मिटकर
दे गई रूप अनगिन प्रतिमाओं को,
पहरेदारी में किसी घोंसले की
तिनके ने रक्खा क़ैद हवाओं को,

निर्धन दुर्बल है, सबका नौकर है
और धन हर मठ-मन्दिर का ईश्वर है
लेकिन मुश्किलें बहुत कम हो जाएँ
यदि कंचन कहे ग़रीब न रजकण को !

सुन्दरता ख़ुद से ही शरमा जाए
यदि वाणी भी मिल जाए दर्पण को !

चन्दन की छाँव रहे विषधर लेकिन
मर पाया ज़हर न उनके बोलों का,
पर पिया पिया का राग पपीहे को
आ सिखला गया वियोग बादलों को,

चाहे सागर को कंगन पहनाओ-
चाहे नदियों की चूनर सिलवाओ,
उतरेगा स्वर्ग तभी इस धरती पर
जब प्रेम लिखेगा ख़त परिवर्तन को !

सुन्दरता ख़ुद से ही शरमा जाए
यदि वाणी भी मिल जाए दर्पण को !

गोपालदास नीरज की जितनी उम्र है, उसमें तीन चौथाई हिस्सा तो उनके अनुभवों का है। उन्होंने 17 साल की उम्र में लिखना शुरू किया था और आज तक लिख रहे हैं। 76 बरस बीत गए लिखते-लिखते…। इतने लम्बे अरसे को युग कह दिया जाए तो गलत नहीं होगा। इस दौरान नीरज काव्य मंचों से लेकर फिल्मी गीतों की दुनिया तक का सबसे बड़ा नाम बने। फिल्म ‘जोकर’ के गीत ‘ए भाई जरा देख के चलो…’ से पहचान मिली और उसके बाद 60-70 के दशक में रोमांटिक गीतों का दूसरा नाम ‘नीरज’ हो गए। लगभग एक साल पहले तक कवि सम्मेलनों में मंचों पर नीरज अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं, हालांकि अब स्वास्थ्य कारणों से मंचों पर जाना बेहद कम हो गया, हालांकि काव्य सृजन आज भी जारी है।

नीरज का व्यक्तिगत जीवन भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं। मगर जब यह कहानी लिखने की बात आती है तो वह सिरे से खारिज कर देते हैं। आत्मकथा लिखने के सवाल पर वह कहते हैं मैं खुली किताब हूं, लोग मेरे बारे में सब जानते हैं तो आत्मकथा लिखने की जरूरत क्या है।

नीरज आजकल ज्यादा वक्त अलीगढ़ में बिताते हैं

नीरज आजकल ज्यादा वक्त अलीगढ़ में बिताते हैं। वहां रहकर वह हाइकू और दोहे लिख रहे हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने फोन पर ही कुछ हाइकू सुना दिए…
‘वो हैं अकेले
दूर होके खड़े
देखे जो मेले।’

‘वो है निराला
जिसने पिया सदा
विष का प्याला।’

दो दिन पहले जाने-माने शायर अनवर जलालपुरी का इंतकाल हुआ, जिससे पूरा काव्यजगत सदमे में हैं। नीरज भी इस गम से अछूते नहीं हैं, वजह भी वाजिब है क्योंकि नीरज और अनवर का साथ तकरीबन 40 साल पुराना था।

अनवर जलालपुरी के जिक्र पर नीरज के दिल से आह कुछ यूं निकलती है…
‘महाठगन ये सांस है, पल-पल आए जाए,
रुक जाएगी कब कहां, कोई जान न पाए…
-एजेंसी