आरबीआई ने YES बैंक के सीईओ को कार्यकाल पूरा करने से रोका, समूचे बैंकिग सैक्‍टर और सरकार को भी कड़े संदेश दिए

नई दिल्ली। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने YES बैंक के सीईओ राणा कपूर को तीन साल का कार्यकाल पूरा करने से रोक दिया। केंद्रीय बैंक ने इस कार्यवाही से बैंकिंग सेक्टर के मैनेजमेंट से लेकर केंद्र सरकार तक को कड़ा संदेश दिया है। पहली चेतावनी सीधे-सीधे सीईओज को दी गई है कि वे बैंक में अपने शेयरों के दाम बढ़ाने के लिए आजाद हैं, लेकिन हवा-हवाई तरीके से नहीं। YES के राणा कपूर को आरबीआई की नाराजगी इसलिए झेलनी पड़ी क्योंकि उन्होंने फंसे कर्ज को भी नॉन-परफॉर्मिंग ऐसेट्स (एनपीए) घोषित नहीं किया।
सिर्फ YES बैंक ही ऐसा करने वाला नहीं है। आरबीआई की ओर से की गई बैंकों की ऐसेट क्वॉलिटी की पड़ताल से ऐक्सिस बैंक में भी ऐसी ही समस्याएं सामने आईं और सीईओ शिखा शर्मा का कार्यकाल बढ़ाने पर भी पाबंदी लग गई। वह इस वर्ष के आखिर में ऐक्सिस बैंक से हट जाएंगी लेकिन शिखा शर्मा एक प्रोफेशनल मैनेजर हैं तो राणा कपूर यस बैंक के सह-संस्थापक हैं और उनका यस बैंक में शेयर है। आरबीआई चाहता है कि कपूर 31 जनवरी के बाद अपने पद से हट जाएं।
आरबीआई की दूसरी चेतावनी है- वह बैंक प्रबंधन में बैठे व्यक्ति के अच्छे व्यवहार के एवज में किसी तरह की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं करेगा। चूंकि बैंकों से कठिन परिस्थितियों में भी कमाई करने की उम्मीद की जाती है इसलिए अब से मैनेजमेंट संभालने वालों के लिए एक ही पैमाना होगा- सत्ता अपने साथ जिम्मेदारी लेकर आती है।
तीसरी चेतावनी यस बैंक के चेयरमैन अशोक चावला और आईसीआईसीआई बैंक के चेयरमैन गिरीश चंद्र चतुर्वेदी के लिए है। ये दोनों पूर्व में नौकरशाह रह चुके हैं। उनकी पुराने बॉस, यानी भारत सरकार ने भले ही गुड गवर्नेंस पर बहुत ध्यान नहीं दिया हो लेकिन आरबीआई को उनसे और उनके बोर्ड से बेहतरी की उम्मीद है। चतुर्वेदी के पूर्ववर्ती आईसीआईसीआई की सीईओ चंदा कोचर पर हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट) का आरोप लगने पर तुरंत उनकी साफ-सुथरी छवि का प्रमाण पत्र देने लगे। बोर्ड ने बाद में जाकर स्वतंत्र जांच का आदेश दिया। आरबीआई का स्पष्ट संदेश है कि इस तरह सीईओ की पूजा प्रथा खत्म होनी ही चाहिए।
आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल की चौथी चेतावनी सरकार को है। जब केंद्र सरकार 13 लाख करोड़ रुपये के पीएनबी फ्रॉड का दोष आरबीआई के मत्थे मढ़ने की कोशिश की थी तो पटेल ने स्पष्ट कहा था कि उनके पास पीएनीबी जैसे सरकारी बैंकों पर प्राइवेट बैंकों जितना अधिकार नहीं है। पहले ऐक्सिस और अब यस बैंक पर कड़े कदम उठाकर वह सरकार को याद दिलाना चाहते हैं कि जहां उनके पास अधिकार है, वहां कठोर कार्यवाही हो रही है। मसलन, उनका इशारा यह है कि मुश्किल में फंसे पावर प्लांट्स (ऊर्जा संयंत्रों) को दिए लोन फंस जाने पर बैंकों को अपने बट्टे खाते में डालने का आइडिया सही नहीं है। इस मामले में आरबीआई कुछ नहीं कर सकता, भले ही बैंकर खुद इस पर कड़े निर्णय की चाहत क्यों नहीं रखते हों।
अब इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशल सर्विसेज लि. और इसके 169 सब्सिडरीज, असोसिएट्स और जॉइंट वेंचर्स के साम्राज्य समेत देश की पूरी फाइनैंस इंडस्ट्री को आरबीआई की यह आंच महसूस करनी चाहिए। IL एंड FS ग्रुप का जिक्र यहां बहुत जरूरी है क्योंकि अब जब यह समय पर कर्ज नहीं चुका रहा है, तब यह स्पष्ट हो गया है कि आरबीआई ने इसकी गड़बड़ गतिविधियों पर ध्यान नहीं दिया था।
इसलिए पांचवीं चेतावनी खुद आरबीआई के लिए ही है। राणा कपूर पर कार्यवाही के बाद आरबीआई का स्टैंडर्ड अब से बहुत बढ़ गया है। अब इस नई छवि से किसी तरह का समझौता उसकी विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाएगा जिसे पाने के लिए उसने बहुत कठिन प्रयास किया है।
-एजेंसियां

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »