ख़ुद के मामले में कानून के मूल सिद्धांत को ही ताक पर रख रहे हैं रंजन गोगोई

भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने एक तीन सदस्यीय बेंच के साथ शनिवार को ख़ुद पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की सुनवाई की और इन आरोपों को ग़लत बताया.
कई महिला वकीलों ने इस तरह की सुनवाई को यौन उत्पीड़न की शिकायत के लिए तय प्रक्रिया का उल्लंघन बताया है.
वहीं सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने उसी प्रक्रिया का हवाला देते हुए चिंता जताई कि उत्पीड़न के मामले में लोगों के नाम सार्वजनिक करना मना है, पर यहां उन्हें सार्वजनिक किया गया.
गोगोई के लिए काम कर चुकीं उनकी जूनियर असिस्टेंट ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं जिन्हें कुछ पत्रिकाओं ने प्रकाशित किया है.
महिला ने सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों को चिट्ठी लिखकर इन आरोपों की जांच के लिए विशेष कमेटी के गठन की मांग की है.
आरोपी के तौर पर मुख्य न्यायाधीश का नाम सार्वजनिक करना, मुख्य न्यायाधीश का अन्य दो जजों के साथ बैठकर आदेश पारित करना और सुप्रीम कोर्ट में यौन उत्पीड़न की शिकायतों की सुनवाई करने के लिए कमेटी होने के बावजूद पीड़िता की विशेष कमेटी की मांग करना कितना जायज़ है?
यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए बनाए गए क़ानून, ‘सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ़ वुमेन एट वर्कप्लेस (प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल)’ 2013 में यौन उत्पीड़न की परिभाषा और ऐसे मामलों की सुनवाई के बारे में स्पष्ट निर्देश हैं.
यौन उत्पीड़न की परिभाषा और अभियुक्त की पहचान
किसी के मना करने के बावजूद उसे छूना, छूने की कोशिश करना, यौन संबंध बनाने की मांग करना, सेक्सुअल भाषा वाली टिप्पणी करना, पोर्नोग्राफ़ी दिखाना या कहे-अनकहे तरीक़े से बिना सहमति के सेक्सुअल बर्ताव करना यौन उत्पीड़न है.
अगर ऐसा बर्ताव काम की जगह पर हो या काम करने के संदर्भ में हो तो उसकी शिकायत वहां बनी ‘इंटर्नल कम्प्लेंट्स कमेटी’ में की जानी चाहिए.
क़ानून के सेक्शन 16 के मुताबिक़ शिकायत की सुनवाई के व़क्त दोनों पार्टियों की पहचान गुप्त रखी जानी चाहिए. मौजूदा मामले में ऐसी किसी कमेटी ने सुनवाई फ़िलहाल शुरू नहीं की है.
वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर के मुताबिक़ “सेक्शन 16 के प्रावधान को इस क़ानून के उद्देश्य (महिलाओं के उत्पीड़न की रोकथाम) को ध्यान में रखते हुए पढ़ना चाहिए, क़ानून और पब्लिक पॉलिसी ये मानती है कि प्रताड़ना से बचाने के लिए औरत की पहचान छिपाना ज़रूरी है.”
इस प्रावधान का उल्लेख, अभियुक्त की पहचान छिपाने के संदर्भ में करने को वो ‘बेतुका’ बताती हैं.
क़ानून के मुताबिक दस से ज़्यादा कर्मचारियों वाले हर संस्थान के लिए एक ‘इंटरनल कम्प्लेंट्स कमेटी’ बनाना अनिवार्य है जिसकी अध्यक्षता एक सीनियर महिला करे, कुल सदस्यों में कम-से-कम आधी महिलाएं हों और एक सदस्य औरतों के हक़ में काम कर रही किसी ग़ैर-सरकारी संस्था से हो.
मौजूदा मामले में काम की जगह सुप्रीम कोर्ट है जहां ‘इंटरनल कम्प्लेंट्स कमेटी’ मौजूद है जिसके सभी सदस्य मुख्य न्यायाधीश से जूनियर हैं.
किसी भी प्रशासनिक जांच के निष्पक्ष होने के लिए ये ज़रूरी है कि जांच करने वाला व्यक्ति आरोपी से पद के मामले में नीचे न हो इसीलिए शिकायत करने वाली महिला ने रिटायर्ड जजों की विशेष जांच कमेटी के गठन की मांग की है.
ऐसी किसी कमेटी के गठन से पहले ही मुख्य न्यायधीश ने अपनी अध्यक्षता में आज इस मामले की सुनवाई की है. दिल्ली हाई कोर्ट में वरिष्ठ वकील रेबेका मेमन जॉन इसे ‘एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी क़दम’ बताते हुए कहती हैं कि मुख्य न्यायाधीश पर भी वही क़ायदे लागू होने चाहिए जो आम नागरिकों पर होते हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “ऐसी सुनवाई कर हम क़ानून के मूल सिद्धांत को भूल रहे हैं कि आप अपने मामले में ख़ुद जज नहीं हो सकते, हर शिकायत की निष्पक्ष तरीक़े से सुनवाई बेहद ज़रूरी है, फिर उसके बाद चाहे जो कार्यवाही तय हो.”
न्यायपालिका में विश्वास
वृंदा ग्रोवर के मुताबिक़ ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ के तहत अहम सार्वजनिक पदों पर नियुक्त लोगों के बर्ताव के बारे में की जाने वाली शिकायत सार्वजनिक होनी ही चाहिए. वो कहती हैं, “न्यायपालिका में लोगों के विश्वास को बनाए रखने के लिए, पारदर्शिता के लिए, पूरी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए.”
रेबेका मेमन जॉन मानती हैं कि मुख्य न्यायाधीश ‘बहुत सेंसेटिव’ पद है और इसकी स्वायत्तता सुरक्षित रखना बहुत ज़रूरी है पर साथ ही वो कहती हैं, “शिकायत को न्यायसंगत प्रक्रिया के तहत जांचना अनिवार्य है.”
क़ानून के मुताबिक़, ‘इंटरनल कम्प्लेंट्स कमेटी’ दोनों पक्ष की बात सुनकर और जांच करके यह तय करती है कि शिकायत सही है या नहीं. सिर्फ़ एक पक्ष की बात से जुर्म तय नहीं किया जा सकता. सही पाए जाने पर नौकरी से सस्पेंड करने, निकालने और शिकायतकर्ता को मुआवज़ा देने की सज़ा दी जा सकती है.
ये क़ानून औरतों को अपने काम की जगह पर बने रहते हुए दोषी को सज़ा दिलाने का उपाय देता है. यानी यह जेल और पुलिस के कड़े रास्ते से अलग न्याय के लिए एक बीच का रास्ता खोलता है जैसे संस्था के स्तर पर आरोपी के ख़िलाफ़ सख़्त कार्यवाही, चेतावनी, जुर्माना, सस्पेंशन, बर्ख़ास्त किया जाना वग़ैराह.
औरत चाहे और मामला इतना गंभीर लगे तो पुलिस में शिकायत किए जाने का फ़ैसला भी किया जा सकता है.
-दिव्‍या आर्य (BBC हिंदी)

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