Ram mandir: इंतिहा हो गई इंतजार की

तीन दशक से Ram mandir का मुद्दा राजनेताओं के लिये संजीवनी बना है मगर अब साधु-संतो का भी धैर्य जवाब दे गया है

जो हिन्दुस्तान धर्म के आधार पर भारत एवं पाक में बंट गया, और दोनों ने ही अपने-अपने संविधान भी बना लिये।
भारत का संविधान धर्म जाति लिंग समुदाय के आधार पर मतभेद की अनुमति नही देता है उसी देश मे इसी आधार पर राजनेता अपनी दुकान चला रहे है। कुछ तो समाज के ठेकेदार बन जनता को गुलाम भी बनाए हुए है। यू तो पूरब अर्थात भारत को ऋषि मुनियों, साधू संतो, अध्यात्म के नाम से जाना जाता है। पश्चिम से कई शांति की तलाश में भारत की और ही रुख करते है।

भारत में कई संत, महात्मा भगवान स्वरुप दर्जा पाये लेकिन राजा राम और श्री कृष्ण भगवान के अवतार माने गए! उन दोनो से जुडे मंदिर फिर चाहें अयोध्या की बात हो, काशी की बात हो, मथुरा की बात हो राजनीति के नेताओंं ने केवल राजनीतिक लाभ के लिए ही समय-समय पर अभियान चलाया। उनमें से ही भगवान श्री राम की जन्म भूमि अयोध्या का मंदिर जिस पर पिछले 500 वर्षो में लगभग 76 युद्ध हुए! जिसमें यह मुस्लिम आक्रान्ताओं का भी शिकार हुआ।

यूं तो पूरे भारत के मंदिर प्रभावित हुए फिर बात चाहे सोमनाथ मंदिर की हो या ऐसे ही अनेक मंदिर! मंदिर के नाम पर पली-बढ.ी भाजपा ने भी अब प्रभु श्री राम को छोड विकास को गले लगा लिया है। विगत तीन दशक से राम मंदिर का मुद्वा राजनेताओं के लिये संजीवनी का ही कार्य करता आया है। अब साधु-संतो का भी धैर्य जवाब दे गया है। हाल ही में शिवसेना प्रमुख उद्वव ठाकरे परिवार सहित साधु-संतो के समागम में पहुंचे उन्होंने ने भी केन्द्र सरकार पर अपना बाण चलाते हुए केन्द्र सरकार से पुछँ रहे है कि मंदिर कब बनेगा? मैं तो यहाँ कंुभकरण को जगाने आया हूँ। जो साढे चार सााल से सो रहे है कहते नही थकते कि सौगंध राम की खाते है मंदिर वही बनायेगे लेकिन तारीख नहीं बतायेंगे। बहुत हुआ अब पहले तारीख फिर सरकार जैसे नारो को दे लोकसभा चुनाव में फिर मंदिर को सुर्खियों में ला दिया है। सन् 1992 से भाजपा ने श्री राम के नाम पर कई बार सरकार बनी अब बहुमत में भी बनी लेकिन रामलला वहीं टेंट के टेंट में ही रहे ये अलग बात है कि पार्टी और नेता फुटपाथ से महलों में चले गए।

साधु-संतो का समाज अब उद्वेलित है और होना भी चाहिए क्योंकि, उन्होंने तो अपना पूरा जीवन अपने प्रभु श्री राम को समर्पित कर दिया है। अब बहुत हुई चिंता अब वक्त करने का है, अब देश के नेताओं से विश्वास उठ चुका है। राम के नाम पर बनी भाजपा जो अपने को
हिन्दुवादी छवि की ध्वजवाहक मानती है, तभी तो हरे रंग को छिपा भगवा की माया रच; सुर्पीम कोर्ट की ओट में छिपी है अब राम भक्त जनता, साधु संत समाज अपने को ठगा सा महसूस कर है। अब लोग दबी जुबां से कह रहे है यदि ऐसा ही करना था तो कांग्रेस क्या बुरी थी? निःसंदेह कांग्रेस के राजीव गाँधी की सरकार ने 1986 में ही भगवान रामलला के दरवाजे पर लगे ताले को उन्होंने ही खुलवाया था इस तथ्य को भी हमें नहीं भूलना चाहिए। अब वही कांग्रेस साफ्ट हिन्दुत्व की और लौट रही है वहीं भाजपा विकास का राग अलाप रही है। निःसन्देह भाजपा में अंदर से घबराहट तो है भाजपा का गाडफादर संघ मौके की नजाकता को समझते हुए शीघ्र मंदिर निर्माण पर शीघ्र विधेयक लाकर बनाने के पक्ष मंे खड़ा है इस लिहाज से भाजपा देर सबेर अलग-थलग ही खड़ी नजर आयेगी क्योंकि संघ से ही उसका अस्तित्व जो जुड़ा हुआ है।

अब राम मंदिर भाजपा के लिए सांप-छछंूदर की स्थिति में आ गया है अब न निगलते बन रहा है और न ही उगलते अर्थात् न तो बनाने की हिम्मत और न ही अध्यादेश लाने की ताकत अब तो जनता भी पूछं रही है तीन तलाक मामले में सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ जाकर संसद से अध्यादेश ले आए चूंकि वोट कबाड़ने की इच्छा शक्ति थी लेकिन, प्रभुराम के प्रति इच्छा शक्ति की कमी के चलते और टालने के ही मुड़ में है बल्कि, यू कहे हमेंशा लटकाए रहने के ही पक्ष में है ताकि, हिन्दू वोट मजबूरी में उनसे जुड़े रहे। भाजपा की सोच का यह दाँव अब उन्ही पर उल्टा पड़ता नजर आ रहा है। जनता एवं साधु – संतो समाज अब पूरे मूड में आ गया है। अब भाजपा मंदिर बनाये या न बनाये जनता साधु – संत समाज स्वंय बनायेंगा।

आखिर मंदिर क्यों? यह पक्ष प्रश्न सभी बद्विजीवियों एवं अन्य के दिमाग में आता ही रहता है। कुछ कुर्तकी बुद्विजीवियों तो वहाँ अस्पताल तो कुछ धर्मशाला बनवाने की भी बात कह चुके है। मेरा मानना हे इस देश में लाखों मंदिर है लेकिन ये खास और महत्वपूर्ण इसलिए और भी हो जाता है कि भगवान श्री राम का जन्म स्थान तो एक ही है। इसलिए प्रभु श्री राम का मंदिर का मंदिर निर्माण आवश्यक है। भाजपा को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि जनता उन्हें विकास के नाम पर वोट देती है।

थोड़ा राम मंदिर मुद्वे को समझे सन् 1528 में आक्रान्ता बाबर का सेनापति मीर बांकी जिसने मंदिर तोड़ बाबर के सम्मान में मस्जिद को बनाया यही नही बल्कि पूरे भारत में मूर्तियों को तोड़ा गया। सन् 1859 में अंग्रेजों ने एक तार की फंेसिग खीच हिन्दु-मुसलमानों के लिए अलग-अलग प्रार्थना करने की अनुमति दे दी।

सन् 1950 में गोपाल सिंह विशारद ने कोर्ट में एक अपील दायर कर रामलला की पूजा अर्चना की अनुमति माँगी यह पहला मामला न्यायालय में गया दूसरा अहम प्रकरण निर्मोही अखाड़ा के महन्त रामचन्द्र दास ने उस स्थल को प्रशासनिक व्यवस्था रखरखाव की मांग की, तीसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड ने 1961 में पब्लिक मस्जिद बताया लेकिन मूर्ति है तो नमाज हराम है,चौथा प्रकरण 1985-87 देवकीनंदन अग्रवाल ने रामलला का मंदिर बनाने का लगाया। सन् 1992

में 6 दिसम्बर को वह विवादित ढाँचा कार सेवकों द्वारा गिरा दिया गया। 2003 में इलाहाबाद

उच्च न्यायालय के निर्देश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की अगुवाई में सर्वेक्षण का कार्य सौंपा विवादित ढांचा के नीचे मंदिर के अवशेष मिले। 2010 में इलाहाबाद कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया कि विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बाँट दिया 1/3 राम मंदिर, 1/3 सुन्नी वक्फ बोर्ड़ 1/3 निर्मोही अखाड़ा को मिला।

2011 में सुपी्रम कोर्ट ने इलाहबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। 19 अप्रैल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराने के लिए उकसाने मे लालकृष्ण आड़वाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित सात अन्य नेताओं के खिलाफ आपराधिक केस चलाने का आदेश दिया

15 दिसम्बर 17 से सुप्रीम कोर्ट फिर सुनवाई शुरु हुई लेकिन 25 नवम्बर 2018 में जनवरी 2019 तक सुनवाई टाल दी गई।

यहाँ कुछ यस प्रश्न उठ खड़ा होना लाजमी है मसलन जब आर्कियोलाजिक सर्वे से एक तो बात पूर्णतः स्पष्ट हो गई कि राम मंदिर पर ही विवादित ढाँचा बना दूसरा कोर्ट में गई तीनों पार्टियों को उनके हिस्से की जमीन 1/3,1/3,1/3 मिल गई। तीसरा नरसिम्हा राव सरकार ने कोर्ट में हलफनामा दिया कि यदि सिद्ध हो जाए कि मंदिर था तो हिन्दुओं को दे देंगे। ब श्री राम मंदिर बनाने में देरी क्यों? राजनीति क्यों? जनता गुमराह क्यों? मेरी जमीन मेरी मर्जी नेताओं का क्या काम?

shashi-tiwari
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-डाॅ. शशि तिवारी

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