राफेल डील: दसॉ एविएशन के सीईओ ने कहा, रिलायंस के साथ पहला समझौता यूपीए सरकार के समय हुआ

नई दिल्‍ली। राफेल फाइटर जेट को लेकर चल रहे विवाद के बीच दसॉ एविएशन के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने कहा है कि अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस के साथ समझौता करने का फैसला उनका था. एक खास बातचीत में ट्रैपियर ने कहा कि राफेल को लेकर रिलायंस के साथ पहला समझौता फरवरी 2012 में हुआ था. इसके बाद रिलायंस के साथ भारत में पार्टनरशिप करने का फैसला किया गया. बता दें कि दसॉ एविएशन ही राफेल जेट का निर्माण करती है.
दसॉ एविएशन के CEO एरिक ट्रैपियर ने कहा कि राफेल को लेकर रिलायंस के साथ पहला समझौता फरवरी 2012 में हुआ था. एरिक के मुताबिक दसॉ एविएशन ने 2012 में ही रिलायंस के साथ भारत में पार्टनशिप करने का फैसला कर लिया था और इसका पहला समझौता फरवरी 2012 में हुआ था.
ऑफ सेट डील पर एरिक ट्रैपियर ने कहा कि दसॉ एविएशन की रिलायंस के साथ साथ HAL यानी हिन्दुस्तान एरोनॉटिकल्स लिमिटेड के साथ भी बात चल रही थी और ये बात HAL को भी पता थी. दसॉ एविएशन के CEO ने कहा कि रिलायंस के साथ समझौता इसलिए किया गया क्योंकि उनके पास नागपुर में जमीन थी और साथ ही इस समझौते में हम तकनीक भी साझा करेंगे.
क्या है राफेल डील?
राफेल फाइटर जेट डील भारत और फ्रांस की सरकारों के बीच सितंबर 2016 में हुई. हमारी वायुसेना को 36 अत्याधुनिक लड़ाकू विमान मिलेंगे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह सौदा 7.8 करोड़ यूरो (करीब 58,000 करोड़ रुपये) का है. सितंबर 2019 में पहला राफेल भारत पहुंचेगा.
एनडीए और यूपीए सरकार के दौरान मूल्य में कितना फर्क?
कांग्रेस का दावा है कि यूपीए सरकार के दौरान एक राफेल फाइटर जेट की कीमत 600 करोड़ रुपये तय की गई थी. मोदी सरकार के दौरान एक राफेल करीब 1600 करोड़ रुपये का पड़ेगा.
क्या है विवाद?
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यूपीए सरकार के दौरान सिर्फ विमान खरीदना तय हुआ था. इसके स्पेयर पार्ट्स, हैंगर्स, ट्रेनिंग सिम्युलेटर्स, मिसाइल या हथियार खरीदने का कोई प्रावधान उस मसौदे में शामिल नहीं था. फाइटर जेट्स का मेंटेनेंस बेहद महंगा होता है. इसके स्पेयर पार्ट्स ना सिर्फ काफी महंगे बल्कि कई महीनों या सालों में मिल पाते हैं. इसकी प्रक्रिया भी काफी लंबी और पेचीदा होती है. मोदी सरकार ने जो डील की है, उसमें इन सभी बातों को शामिल किया गया है. कांग्रेस की आपत्ति है कि इस डील में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का प्रावधान नहीं है. पार्टी इसमें एक कंपनी विशेष को फायदा पहुंचाने का आरोप भी लगाती है.
-एजेंसियां

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