रबींद्रनाथ टैगोर के प्रशंसकों को मिलने जा रही है एक खास भेंट

कोलकाता। गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर के प्रशंसकों को इस बार उनकी 77वीं पुण्यतिथि पर खास भेंट मिलने जा रही है। दरअसल, इस साल 7 अगस्त को उनकी पुण्यतिथि पर रचना गीतांजलि की हस्तलिखित कॉपी का अनुलिपि संस्करण जारी किया जाएगा। बता दें कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व भारती विश्वविद्यालय में चांसलर के रूप में दौरे के दौरान ही जन प्रसार के लिए इस दुर्लभ प्रति के प्रकाशन का विचार रखा था।
इससे पहले पीएम मोदी ने इस साल की शुरुआत में स्वीडन दौरे पर नोबल म्यूजियम को इस प्रति की एक रेप्लिका भी भेंट की थी जिसे नोबल विजेताओं की स्मृति चिन्ह के बीच स्थान दिया गया है। पीएम मोदी की सलाह को स्वीकारते हुए यूनिवर्सिटी इस दुर्लभ प्रति को अपने लेखागार से निकालकर अनुलिपि संस्करण प्रकाशित करा रहा है ताकि पाठक 106 साल पुरानी गीतांजलि की पहली कॉपी को पढ़ सकें जो कि टैगोर की व्यक्तिगत प्रति भी थी।
1912 में लंदन में इंडिया सोसायटी को रबिंद्रनाथ टैगोर के प्रशंसक आर्टिस्ट विलियम रॉथनस्टेन की मदद से उनकी हस्तलिखित प्रति प्राप्त हुई थी।
दरअसल, विलियम ने अपने एक आइरिश कवि दोस्त डब्ल्यूबी यीट्स को टैगोर की प्रति भेजी थी, दोनों दोस्त गुरुदेव की कविताओं में समाहित गहरे तत्व ज्ञान से बेहद प्रभावित थे इसलिए उन्होंने इसे नोबल के ध्यानार्थ स्वीडिश आकादमी को भेजा था।
किताब पर कई सत्र और चर्चाएं आयोजित हुईं
बताते हैं कि टैगोर, यीट्स और विलियम तीनों ने अमेरिकी कवि एजरा पाउंड से मुलाकात की। इसके बाद बुक रीडिंग के कई सेशन और डिस्कशन हुए जिसे बाद किताब को आखिरकार नोबल कमेटी के लिए भेजा गया। रबींद्रनाथ टैगोर उस प्रिटेंड वर्जन में आखिरी पल तक पेंसिल से शब्दों में बदलाव और करेक्शन करते रहे जिसे बाद में उन्होंने अपनी व्यक्तिगत कॉपी के रूप में रख लिया था।
पेंसिल से करेक्शन के साथ किताब के पन्नों पर निशान भी मिलेंगे
इस 106 साल पुरानी प्रति के अनुलिपि संस्करण में पेंसिल से करेक्शन और किताब के कीड़े के निशान भी देखने को मिलेंगे। इस बारे में रबींद्र भवन के प्रवक्ता निलंजन बंदोपाध्याय ने कहा, ‘हम चाहते हैं कि जब पाठक इसे पढ़ें तो वह पूरी तरह प्रमाणिक लगे। बता दें कि रबींद्रनाथ टैगोर को 1913 में साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार मिला था और यह उनकी पहली कॉपी उनकी सबसे प्रिय संपत्ति की तरह उनके पास रही। उनकी 1941 में उनके निधन के बाद रबींद्र भवन लेखागार में इसे सुरक्षित रखा गया था।
-एजेंसी

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