कुंभ महापर्व में आए लद्दाखी भाषा बोलने वाले ”शुद्ध आर्य” – Brokpa and dopa

प्रयागराज। कुंभ महापर्व में प्रतिदिन अजीबोगरीब नजारे देखने को मिल रहे हैं, इसमें आए लद्दाखी भाषा बोलने वाले ”शुद्ध आर्य” – Brokpa and dopa कौतूहल का विषय बने हुए हैं। संगमनगरी प्रयागराज के भव्य कुंभ में यूं तो भारतीय संस्कृति की तमाम विविधताएं और सभ्यताएं देखने को मिल रही हैं लेकिन मेले में जम्मू-कश्मीर के लद्दाख से आए आर्यन लोग सभी के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। सिर पर रंग-बिरंगे फूलों से सजी टोपी, गले में मोतियों व धातुओं से बनी हार और लद्दाखी पारंपरिक वेशभूषा में आप इन्हें मेले में कहीं भी देख सकते हैं। ये यहां करीब 30 की संख्या में आये हुए हैं।

brokpa and dopa in kumbha 2019
brokpa and dopa in kumbha 2019

वे कुंभ मेले में अपनी पारम्परिक नृत्य और लोकगीत से लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। पूछने पर बताते हैं कि वे इस नृत्य के जरिये कुंभ महापर्व की खुशी मना रहे हैं और लोगों को भी प्रसन्न रहने का संदेश दे रहे हैं।

वे दावा करते हैं कि वे ही शुद्ध आर्य हैं और आज भी उनमें सिंधु घाटी सभ्यता की झलक देखी जा सकती है। फिलहाल इनकी कुल जनसंख्या 4 हजार से भी कम है ये विलुप्त होने के कगार पर हैं। ये आर्यन लोग दर्दशिना भाषा बोलते हैं, साथ में ही आए लुंदुप दुरजु कहते हैं कि यह भाषा कई भारतीय भाषाओं की जननी है, देव भाषा संस्कृत का जन्म भी इसी भाषा से हुआ हुआ है।

ये बौद्ध धर्म का भी पालन करते हैं और इसके बावजूद ये लोग देवी-देवताओं की पूजा करते हैं और कुदरती ताकतों पर विश्वास करते हैं। सूर्य, अग्नि और पेड़-पौधों की पूजा भी ये करते हैं। ये आर्यन घाटी के लोग प्रकृति से अत्यंत प्रेम करते हैं। इनके अनुसार बाकी लद्दाखी भाषाओं से इतर इनकी जुबान में संस्कृत के 70 से 80 प्रतिशत शब्द मिलते हैं। इन्हें लद्दाख के स्थानीय लोग Brokpaऔर ‘डोपा’ नाम से पुकारते हैं वहां की भाषा में इसका मतलब घुमन्तु या खानाबदोश होता है।

शिक्षा की उचित व्यवस्था न होने से अधिकांश लोग अशिक्षित ही रह जाते हैं। लुंदुप दुरुजु के लफ्ज़ों में ‘रोज़ी-रोटी के साथ ही अपनी संस्कृति को बचाए रखना आज हमारे लिए सबसे बड़ा मसला है। इनकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया या तो खुबानी की बागवानी, फलों की खेती-बाड़ी या फिर सेना और बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन से मिलने वाली मजदूरी है।

-एजेंसी

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