पुण्‍यतिथि पर विशेष: माहिर कूटनीतिज्ञ थीं रानी लक्ष्मीबाई

आज महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस है जिसे हम पुण्‍यतिथि के रूप में उन्‍हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। पिछली डेढ़ शताब्दी से वे भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम की नायिका और अद्भुत वीरता की मिसाल के तौर पर लोक मानस में अंकित हैं. उनकी बहादुरी के किस्से और ज्यादा मशहूर इसलिए हो जाते हैं, क्योंकि उनकी सबसे ज्यादा तारीफ तो उनसे लड़ने वाले अंग्रेजों ने खुद की थी.

उनकी वीरांगना छवि को जनमानस में छापने का सबसे बड़ा काम कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी” ने किया. आज भी अगर आप झांसी के किले में जाएं और वह स्थान देखें, जहां से रानी ने घोड़े सहित किले से छलांग लगा गई थीं, तो वह दृश्य सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. किले के निचले हिस्से में रखी गुलाम गौस खां की कड़क बिजली तोप बताती है कि कहने को वह लड़ाई एक रियासत को बचाने की थी, लेकिन असल में वह ऐसा इतिहास रच रही थी, जिससे आने वाले समय में राष्ट्रवाद, हिंदू-मुस्लिम एकता और महिला सशक्तीकरण जैसे बड़े मुद्दों पर चर्चा होने वाली थी.

लेकिन इस संवाद में रानी का वह रूप अक्सर लोक स्मृति में नहीं आ पाता कि वे कूटनीति की भी महारथी थीं. इसका सबसे पहला पहलू तो यह है कि जिन रानी को 1857 की क्रांति की नायिका माना जाता है, वे 1857 में युद्ध में ही नहीं उतरीं. रानी ने तलवार उठाई फरवरी 1858 में.. तो रानी 10 मई 1857 को क्रांति की शुरुआत से लेकर फरवरी 1858 के बीच आखिर क्या कर रहीं थीं.

क्या वे हाथ पर हाथ धरे देश में हो रही इस क्रांति को देख रहीं थीं. लक्ष्मीबाई के व्यक्तित्व को देखते हुए ऐसा मानना कठिन है. असल में इन छह-सात महीने में रानी बराबर इस बात की कोशिश कर रहीं थीं कि उनके राज्य को उसका जायज हक मिल जाए. उनके पति गंगाधर राव के निधन के बाद उनके दत्तक पुत्र को अंग्रेज झांसी का महाराज स्वीकार कर लें. इसके लिए रानी ने कूटनीति या राजनय के हरसंभव विकल्प पर काम किया. रानी के इन प्रयासों को झांसी के गजेटियर में विस्तार से दर्ज किया गया है.

रानी चाहती थीं कि अंग्रेजों से युद्ध न करना पड़े, ताकि झांसी की बेगुनाह जनता को इस लड़ाई की कीमत न चुकानी पड़े. यह कीमत कितनी भारी थी कि इसकी कल्पना हम आज शायद नहीं कर सकते, लेकिन रानी के वीरगति को प्राप्त होने के बाद झांसी को जिस तरह अंग्रेजों ने लूटा, वह अपने आप में अध्ययन का विषय है. इस लूट का वर्णन गदर के समय महाराष्ट्र से तीर्थयात्रा पर निकले वासुदेव गोडसे शास्त्री नाम के ब्राहृमण ने मराठी में लिखी किताब “माझा प्रवास” में किया. बाद में इसका हिंदी अनुवाद अमृत लाल नागर ने “आंखों देखा गदर” नाम से किया. शास्त्री जब किले के भीतर गिर रहे तोप के गोलों और उनसे उठने वाले शोलों का वर्णन करते हैं तो जेहन में वैसी ही तस्वीर उभरती है जैसी तस्वीरें इस्राइल के फलस्तीन पर होने वाले हमलों की हम टीवी पर देखते हैं. इस पुस्तक में शास्त्री ने लूट की आंखों देखी लिखी है. युद्ध के बाद झांसी को पांच चरण में लूटा गया. लूट का सबसे पहला हक गोरे सैनिकों को मिला और उन्होंने सोना-चांदी और दूसरे कीमती सामान लूटे. उसके बाद भारतीय मूल के सैनकों ने लूटा. इस तरह पांच दिन तक लूट हुई और आखिर में झांसी की एक-एक चीज लूट ली गई.

रानी इसी त्रासदी से बचना चाहती थीं. उन्होंने आखिर तक कूटनीति का सहारा लिया, लेकिन अंत में हुआ यह कि अंग्रेजी सेना से बागी हुए भारतीय सैनिकों और आसपास के सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी. इस लड़ाई में उन्होंने रानी को अपना नेता घोषित किया और महारानी के जयकारों के साथ युद्ध का यलगार कर दिया. तकरीबन यही स्थिति दिल्ली में मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर और लखनऊ में बेगम जीनत महल के साथ हुई थी. इससे अंग्रेजों को यह संकेत गया कि रानी कूटनीतिक बातचीत सिर्फ दिखावे के लिए कर रही हैं और असल में युद्ध ही इसका मकसद है. जब बागी सैनिक झांसी के किले पर लक्ष्मीबाई के जयकारे लगाने लगे तो रानी ने उनका नेतृत्व करना स्वीकार किया और उसके बाद का इतिहास तो सबको मालूम ही है.

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