देवी की आरती करने की उचित पद्धति

देवता की आरती करना देवतापूजन का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। आरती का अर्थ है, देवता के प्रति शरणागत होना और उनका कृपाप्रसाद प्राप्त करने के लिए आर्तभाव से उनका स्तुतिगान करना। मनुष्य के लिए कलियुग में देवता के दर्शन हेतु आरती एक सरल माध्यम है। आरती के माध्यम से अंत:करण से देवता का आवाहन करनेपर देवता पूजक को अपने रूप अथवा प्रकाश के माध्यम से दर्शन देते हैं। इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों एवं संतोंने विभिन्न देवताओं की आरती की रचना की। देवी मां की कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी आरती करते समय कुछ सूत्रों का ध्यान रखना लाभदायक है।

देवी की आरती गाने की उचित पद्धति क्या है ?
‘देवी का तत्त्व, अर्थात शक्तितत्त्व तारकमारक शक्ति का संयोग है । इसलिए आरती के शब्दों को अल्प आघातजन्य, मध्यम वेगसे, आर्त्त धुन में तथा उत्कट भाव से गाना इष्ट होता है ।

कौन से वाद्य बजाने चाहिए ?
देवीतत्त्व, शक्तितत्त्व का प्रतीक है, इसलिए आरती करते समय शक्तियुक्त तरंगें निर्मिति करनेवाले चर्मवाद्य हलके हाथ से बजाने इष्ट हैं ।

देवी की आरती कैसे उतारें – एकारती अथवा पंचारती ?
यह देवी की आरती उतारने वाले के भाव एवं उसके आध्यात्मिक स्तरपर निर्भर करता है ।

पंचारती से आरती उतारना
‘पंचारती’ अनेकत्व का (चंचलरूपी मायाका) प्रतीक है । आरती उतारनेवाला प्राथमिक अवस्था का साधक (50 प्रतिशत स्तर से न्यून स्तरका) हो, तो वह देवी की पंचारती उतारे ।

एकारती उतारना
एकारती ‘एकत्व’ का प्रतीक है । भावप्रवण एवं 50 प्रतिशत स्तर से अधिक स्तर का साधक देवीकी एकारती उतारे ।

आत्मज्योति से आरती उतारना
70 प्रतिशत से अधिक स्तर का एवं अव्यक्त भाव में प्रविष्ट आत्मज्ञानी जीव, स्वस्थित आत्मज्योति से ही देवी को अपने अंतर् में निहारता है । आत्मज्योति से आरती उतारना, ‘एकत्व के स्थिरभाव’ का प्रतीक है ।

देवी की आरती उतारने की उचित पद्धति
देवी की आरती पूजक को अपनी बांईं ओर से दाईं ओर घडी के कांटों की दिशा में पूर्णवर्तुलाकार पद्धति से उतारें ।

आरती के उपरांत देवीमां की एक अथवा नौ की संख्या में परिक्रमा करनी चाहिए । इन सभी कृतियों को भावसहित करने से पूजक को देवीतत्त्व का अधिक लाभ मिलता है ।

संदर्भ – ‘देवीपूजन से संबंधित कृत्यों का शास्त्र‘ एवं अन्य ग्रंथ

कु. कृतिका खत्री,
सनातन संस्था, दिल्ली

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