चीन के ड्रीम प्रोजेक्‍ट बेल्‍ट एंड रोड को कड़ी टक्‍कर देने की तैयारी, जो बाइडेन ने फंडिंग करने का सुझाव दिया

वॉशिंगटन। चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग के अरबों डॉलर के ड्रीम प्रोजेक्‍ट बेल्‍ट एंड रोड को कड़ी टक्‍कर मिलने जा रही है। अमेरिकी राष्‍ट्रपति जो बाइडेन ने लोकंतात्रिक देशों के प्रयास को फंडिंग करने का सुझाव दिया है। बाइडेन ने यह सुझाव ऐसे समय पर द‍िया है जब चीन और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। बाइडेन ने यह प्रस्‍ताव ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के साथ फोन पर बातचीत के दौरान दिया।
अमेरिका और चीन के बीच शिंजियांग में उइगुर मुस्लिमों पर हो रहे अत्‍याचार को लेकर तनाव चल रहा है। बाइडेन ने ब्रिटिश पीएम से बातचीत के बाद मीडिया से कहा, ‘मैंने सुझाव दिया है कि हमारी भी लोकतांत्रिक देशों की ओर से एक आवश्‍यक पहल होनी चाहिए ताकि दुनिया के उन समुदायों की मदद की जा सके जिन्‍हें वास्‍तविक मदद की जरूरत है।’ बाइडेन का इशारा चीन के बेल्‍ट एंड रोड प्रॉजेक्‍ट के विकल्‍प की ओर था।
हंबनटोटा बंदरगाह चीन को 99 साल के लीज पर देना पड़ा
चीन ने बेल्‍ट एंड रोड परियोजना के जरिए दुनियाभर में लोन बांटा है। इससे क्षेत्रीय ताकतों ओर पश्चिमी देशों की जहां चिंता बढ़ गई है, वहीं ड्रैगन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। चीन ने दुनिया के कई देशों को सड़क, रेलवे, बांध और बंदरगाह बनाने में मदद की है। चीन की इस परियोजना के कर्ज के जाल में श्रीलंका जैसे छोटे देश फंसते जा रहे हैं। श्रीलंका को अपना हंबनटोटा बंदरगाह चीन को 99 साल के लीज पर देना पड़ा है।
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने 2013 में सत्ता में आने के बाद अरबों डॉलर की इस परियोजना की शरुआत की थी। यह परियोजना दक्षिणपूर्व एशिया , मध्य एशिया , खाड़ी क्षेत्र , अफ्रीका और यूरोप को सड़क एवं समुद्र मार्ग से जोड़ेगी। भारत ने बीआरआई की सीपीईसी परियोजना को लेकर इसका बहिष्कार किया है। दरअसल , 60 अरब डॉलर से तैयार होने वाला चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजरेगा। भारत इसका विरोध कर रहा है। यह बीआरआई की प्रमुख परियोजना है।
चीन ने ग्वादर में किया 80 करोड़ डॉलर का निवेश
चीन ने BRI के तहत पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को 80 करोड़ डॉलर की आनुमानित लागत से विकास कर रहा है। चीन के अधिकारी भले ही बार-बार यह कहते रहे हैं कि ग्वादर बंदरगाह और CPEC का उद्देश्य पूरी तरह से आर्थिक और व्यावसायिक हैं, लेकिन इसके पीछे चीन की असल मंशा सैन्य प्रभुत्व बढ़ाना है। सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि चीन ग्वादर का इस्तेमाल अपने नौसेना बेस के तौर पर कर सकता है।
-एजेंसियां

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