Prasoon Joshi ने कहा, हम बर्दाश्त नहीं करते

जयपुर। जेएलएफ (जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल) के पहले दिन लेखक Prasoon Joshi ने वाणी त्रिपाठी के साथ कई मुद्दों पर चर्चा की। उन्होंने कहा- मुझे टॉलरेन्स शब्द से बड़ी प्रोब्लम है। इसका मतलब बर्दाशत करना कहते है। ये इस देश का शब्द नहीं है। हममे तो एक्सेपटेंस है। हम बर्दाश्त नहीं करते। एक्सेपट करते हैं। स्वीकार करते हैं। दिल से लगाते हैं। वो इस देश की भाषा है। टॉलरेन्स इस शब्द का इस्तेमाल मत करिएगा।

ढोल के साथ बांसुरी नहीं बजा सकते

Prasoon Joshi ने देश का हालात पर बात करते हुए कहा- डाइवर्सिटी का मतलब भी गलत समझने लगे हैं। बांसुरी को अगर आप ढोल के साथ बजवाएंगे तो बांसुरी सुनाई ही नहीं देगी। अगर आपको सही में वो बांसुरी सुननी है तो उसे लेकर थोड़ी दूर जाकर चट्टान पर बैठना होगा। बांसुरी की आवाज ढोल के शोर में खो न जाए, यह ध्यान हमें ही रखना होगा। उन्होंने कहा- डाइवर्सिटी का मतलब क्या है। अपनी सुविधा के अनुसार दूसरों को परोसना डाइवर्सिटी नहीं है। डाइवर्सिटी का मतलब है आपको आपकी तरह ही रहने दूं और फिर उसे स्वीकार करूं। अगर आपको मैंने अपने मसाले के रूप में पेश किया है तो ये दादागिरी है।

पर्सनल अटैक गलत, असहमति की गरिमा जरूरी

प्रसून ने कहा कि मैं बहुत कम ऐसे लोगों से मिला हूं जो इस बात को नहीं मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के लिए सोचते हैं। वह अपने लिए नहीं सोचते हैं। यही कारण कि उनके लिए फकीर शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। इस कारण वो अपनी पर्सनल इच्छाओं से दूर हैं और देश के लिए समर्पित हैं। आप उनकी कुछ चीजों से सहमत या असहमत हो सकते हैं। आज हर जगह लोग पर्सनल अटैक करने लगे हैं। असहमति में गरिमा होनी चाहिए। हम असहमति की गरीमा छोड़ रहे हैं। ये सोचने वाली बात है।

तारे जमीन पर फिल्म के गाना गाया

देखो इन्हें ये हैं ओस की बूंदें
पत्तों की गोद में आसमां से कूदे
अंगड़ाई लें फिर करवट बदलकर
नाज़ुक से मोती हंस दें फिसलकर
खो ना जाएं ये, तारे ज़मीं पर

– एजेंसी

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