कविता है संस्कारों की सन्देशवाहिका: डा. विष्‍णु सक्सेना

Poetry is the message of sacraments: Dr. Vishnu Saxena
कविता है संस्कारों की सन्देशवाहिका: डा. विष्‍णु सक्सेना

मथुरा।  हिन्दी के अन्तर्राष्‍ट्रीय ख्याति प्राप्त गीतकार एवं ‘यश भारती‘ से सम्मानित डा. विष्‍णु सकसेना ने कहा कि कविता में वह शक्ति है जिसने आदि काल से लेकर स्वतंत्रता आन्दोलन में हुंकार भरते हुए क्रान्ति की अलख जगा कर समाज तथा राश्ट्र को ऊर्जा प्रदान की है।

उन्होंने कहा कि चन्दवरदाई, भूषण आदि कवियों ने तत्कालीन नरेशों को कविताओं के माध्यम से साहस एवं शक्ति प्रदान की थी। उनकी कविताओं में मूलतः ईष्वर के प्रति श्रद्धा, सत्य के प्रति निष्‍ठा और नैतिकता के प्रति समर्पण के संस्कार थे।
डा. विष्‍णु सक्सेना गोवर्धन रो स्थित ज्ञानदीप शिक्षा भारती सभागार में ‘संस्कार समन्वित षिक्षा की आवष्यकता‘ विशयक विचार गोष्‍ठी को सम्बोधित कर रहे थे।

उन्होंने इसी क्रम में कहा कि पाठ्यक्रम की शिक्षा के साथ छात्र-छात्राओं में प्रेरक कविताओं के माध्यम से संस्कार जागृत किए जायें और इस सन्दर्भ में कविता की ये पंक्तियाँ प्रस्तुत की जिसमें कहा गया है कि संसार माता-पिता से बढ़कर कोई नहीं है-

एक दिन फूल से तितलियों ने कहा,
कैसे रहते हो खुष तुम हर एक हाल में।
फूल बोला कि खुशबू लुटाता हूँ मैं,
जब कि रहता हूँ काँटों के जंजाल में।
एक दिन मैंने मन्दिर में पूछा प्रभो,
आप से भी बड़ा कौन कलि काल में,
बोले माँ-बाप से है न कोई बड़ा
सब चढ़ा दो वहाँ जो रखा थाल में।
गोष्‍ठी के प्रारम्भ में ज्ञानदीप के संस्थापक सचिव मोहन स्वरूप भाटिया ने कहा कि विकृत होती जा रही संस्कृति और वर्तमान अषान्त स्थितियों में संस्कारित शिक्षा की महती आवष्यकता है। प्रधानाचार्या श्रीमती निधि भाटिया, संदीप कुलश्रेष्‍ठ, गुंजन रोहरा, भावना शर्मा, माला सुभाष, अंजु शर्मा, चन्द्रकला चौधरी आदि ने एक स्वर से कहा कि काव्य, संगीत और नाटक के प्रभावी माध्यम से आदर्शों की स्थापना की जा सकती है।
गोष्‍ठी के प्रारंभ में शैक्षिक निदेशक के. जी. माहेष्वरी ने डा. विष्‍णु सक्सेना का शॉल उढ़ाकर स्वागत किया और अन्त में प्रशासनिक अधिकारी आशीष भाटिया एडवोकेट ने स्मृति चिह्न प्रदान करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया।

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