कवि और गीतकार क़मर जलालाबादी की पुण्‍यतिथि आज

9 मार्च 1917 को एक पंजाबी परिवार में जन्‍मे कवि और गीतकार क़मर जलालाबादी का असली नाम ओम प्रकाश भंडारी था। अमृतसर के पास जलालाबाद उनका गृह नगर था इसलिए अमर चंद अमर नामक एक घुमकड़ कवि ने ओम प्रकाश भंडारी को ‘क़मर’ नाम दिया, जिसका अर्थ होता है चंद्रमा। इस तरह ओम प्रकाश भंडारी को क़मर जलालाबादी के तौर पर नई पहचान मिली।
‘क़मर’ ने सात साल की उम्र से उर्दू में कविता लिखना शुरू कर दिया था।
क़मर जलालाबादी की मृत्‍यु 09 जनवरी 2003 को मुंबई में हुआ था।
हिंदी फिल्मों के इतिहास में कई ऐसे गीतकार हुए जिनके गीतों से कितने ही आशिकों की मोहब्बत मुकम्मल हुई, कुछ ऐसे ही गीतकारों में शुमार थे क़मर जलालाबादी।
कमर साहब ने 4 दशकों तक 156 फ़िल्मों में काम किया और लगभग 700 गीत लिखे। आगे चलकर वो ‘फ़िल्म राइटर एसोसिएशन’ के संस्थापक सदस्यों में से भी एक रहे। क़मर जलालाबादी इस दुनिया से रूखसत भले ही हो गए हों लेकिन उनके गीत जहां भी बजते हैं उनका नाम हर कोई पूरी शिद्दत के साथ याद करता है।
गीतकार और शायर क़मर जलालाबादी ने अपने सिनेमाई कैरियर में फ़िल्म ‘महुआ’ का गीत ‘दोनों ने किया था प्यार मगर’, फ़िल्म ‘हावड़ा ब्रिज’ का गाना ‘आइए मेहरबान’ जैसे हिट गीत लिखे।

प्रस्तुत है क़मर जलालाबादी की ग़ज़लों से चुनिंदा अशआर-

आख़री हिचकी से पहले चारा-गर से पूछ लूँ
जो नज़र आता नहीं रिश्ता कहाँ ले जाएगा

कुछ तो है बात जो आती है क़ज़ा रुक रुक के
ज़िंदगी क़र्ज़ है क़िस्तों में अदा होती है
तेरे ख़्वाबों में मोहब्बत की दुहाई दूँगा
जब कोई और न होगा तो दिखाई दूँगा

जाती हुई मय्यत देख के भी वल्लाह तुम उठ कर आ न सके
दो चार क़दम तो दुश्मन भी तकलीफ़ गवारा करते हैं

जब तक न नज़र आओगे ऐसा करेंगे हम
हर रोज़ इक ख़ुदा को तराशा करेंगे हम
रफ़्ता रफ़्ता वो हमारे दिल के अरमाँ हो गए
पहले जाँ फिर जान-ए-जाँ फिर जान-ए-जानाँ हो गए

राह में उन से मुलाक़ात हो गई
जिस से डरते थे वही बात हो गई

चाहा तुझे तो ख़ुद से मोहब्बत सी हो गई
खोने के बाद मिल गई अपनी ख़बर मुझे
मिरे ख़ुदा मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे
उदास मेरे जनाज़े से जा रहा है कोई

यारब तिरे करम से ये सौदा करेंगे हम
दुनिया में पी के ख़ुल्द में तौबा करेंगे हम

इश्क़ में उस ने जलाना ही नहीं सीखा कभी
आग दे जाएगा मुझ को ख़ुद धुआँ ले जाएगा
इक हसीन ला-जवाब देखा है
रात को आफ़्ताब देखा है

गोरा मुखड़ा ये सुर्ख़ गाल तिरे
चाँदनी में गुलाब देखा है
मैं ने कहा कि देते हैं दिल तुम भी लाओ दिल
कहने लगे कि ये तो तिजारत की बात है

मैं ने कहा कभी है सितम और कभी करम
कहने लगे कि ये तो तबीअ’त की बात है
-Legend News

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