कव‍यि‍त्री Anamika की कव‍िता- मीरा रानी, तुम तो ख़ुशकिस्मत थींं

17 अगस्त, 1963 को बिहार के मुजफ्फरपुर में जन्मी कवयित्री Anamika का आज जन्मद‍िन है ।

दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए, पीएचडी और डीलिट् करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के ही सत्यवती कॉलेज के अंग्रेजी अध्यापन और ह‍िंदी में कव‍िता लेखन एक अजीब सा कांबीनेशन वाली कव‍यि‍त्री हैं Anamika ।

अनामिका के सात कविता-संकलन, पाँच उपन्यास, चार शोध-प्रबन्ध, छह निबन्ध-संकलन और पाँच अनुवाद के अलावा रूसी, अंग्रेज़ी, स्पेनिश, जापानी, कोरियाई, बांग्ला, पंजाबी, मलयालम, असमिया, तेलुगु आदि में इनकी कृतियों के अनुवाद कई पाठ्यक्रमों का हिस्सा भी हैं।

आज पढ़‍िए Anamika की दो कव‍िताऐं — स्त्रियां और प्रेम के लिए फाँसी

1- स्त्रियां

पढ़ा गया हमको

जैसे पढ़ा जाता है कागज

बच्चों की फटी कॉपियों का

‘चनाजोरगरम’ के लिफाफे के बनने से पहले !

देखा गया हमको

जैसे कि कुफ्त हो उनींदे

देखी जाती है कलाई घड़ी

अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद !

सुना गया हमको

यों ही उड़ते मन से

जैसे सुने जाते हैं फिल्मी गाने

सस्ते कैसेटों पर

ठसाठस्स ठुँसी हुई बस में !

भोगा गया हमको

बहुत दूर के रिश्तेदारों के दुख की तरह

एक दिन हमने कहा –

हम भी इनसान हैं

हमें कायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर

जैसे पढ़ा होगा बी.ए. के बाद

नौकरी का पहला विज्ञापन।

देखो तो ऐसे

जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है

बहुत दूर जलती हुई आग।

सुनो, हमें अनहद की तरह

और समझो जैसे समझी जाती है

नई-नई सीखी हुई भाषा।

इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई

एक अदृश्य टहनी से

टिड्डियाँ उड़ीं और रंगीन अफवाहें

चींखती हुई चीं-चीं

‘दुश्चरित्र महिलाएँ, दुश्चरित्र महिलाएँ –

किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूली फैलीं

अगरधत्त जंगल लताएँ !

खाती-पीती, सुख से ऊबी

और बेकार बेचैन, अवारा महिलाओं का ही

शगल हैं ये कहानियाँ और कविताएँ।

फिर, ये उन्होंने थोड़े ही लिखीं हैं।’

(कनखियाँ इशारे, फिर कनखी)

बाकी कहानी बस कनखी है।

हे परमपिताओं,

परमपुरुषों –

बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!

2- प्रेम के लिए फाँसी

मीरा रानी, तुम तो फिर भी ख़ुशकिस्मत थी,
खाप पंचायत के फ़ैसले
तुम्हारे सगों ने तो नहीं किए!
‘‘राणाजी ने भेजा विष का प्याला’’-
कह पाना फिर भी आसान था,
‘भैया ने भेजा’- ये कहते हुए जीभ कटती।
बचपन की स्मृतियाँ कशमकश मचातीं,
और खड़े रहते ठगे हुए राह रोककर
सामा-चकवा और बजरी-गोधन के सब गीत
‘राजा भइया चललें अहेरिया,
रानी बहिनी देली असीस हो न’!
हँसकर तुम यही सोचती-
‘भैया को इस बार मेरा ही
आखेट करने की सूझी!
स्मृतियों का कोष
चुक ही गया उस बेचारे का!
कौन डाकू ले गया उसकी बचपन की यादें?
बाबा ने भी हद ही की!
जो डाकू लूट नहीं सकते,
वह सब सम्पदा : त्याग, धीरज, सहिष्णुता।
मेरे ही हिस्से कर दीं,
क्यों उसके नाम नहीं लिखीं?’

-Legend News

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