उसे खूब मालूम है ज़ुल्म ढाने का तरीका- सलिल सरोज

 उसे खूब मालूम है ज़ुल्म ढाने का तरीका,
ज़ख़्म देता है तो उसपर नमक भी रखता है.

क्या कर सकेंगे आप उसके जुर्रत का मुकाबला,
वो झूठ बोलता है तो धमक भी रखता है.

दिन को पाट दिया काली अँधेरी रातों से,बावजूद इसके,
अपने चेहरे पर वाइज़ चमक भी रखता है.

वो है उस्ताद और हैं उसके शागिर्द कई,
लेकिन सबको बनाकर वो अहमक भी रखता है.

सींचता है रोज़ नई फसलों की क्यारियाँ,
और फिर चुपके से उनमें दीमक भी रखता है.

 

ज़माने से हुई ख़बर कि मैं सुधर गया

ज़माने से हुई ख़बर कि मैं सुधर गया,
फिर वो कौन था जो मेरे अंदर मर गया.

दूसरों की निगाहों से जो देखा खुद को आज,
देख कर अपना ही चेहरा क्यों डर गया.

वो अल्हड़पन,वो लड़कपन कल तक जो था,
आज ढूँढा बहुत,ना जाने किधर गया.

मैं खोजता रहा खुद को स्टेशन की तरह,
संसार रेल की तरह मुझसे गुज़र गया.

मैं खोजता रहा जहाँ की तयशुदा मंज़िलें,
मीलों चलके भी खाली मेरा सफर गया.

कौन पहचानेगा मुझे बदले हालातों में,
अपने भी ठुकरा देंगे,मैं घर अगर गया.

जो दोस्त बनके नसीहतें देता रहा ताउम्र,
ज्योंहि जरूरत पड़ी तो वो मुकर गया.

मुझे बदलना था उसे,सो मुझे बदल गया,
आदमी को मशीन बनाने का काम कर गया.

salil saroj
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सलिल सरोज, सीनियर ऑडिटर,
कार्यालय महानिदेशक लेखापरीक्षा,
वैज्ञानिक विभाग, नई दिल्ली

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