SCO की बैठक में पीएम मोदी ने कट्टरपंथ पर किया करारा प्रहार, एकटक देखते रहे पाकिस्‍तानी पीएम इमरान खान

नई दिल्‍ली। ऐसे समय में जब अफगानिस्तान में तालिबान कट्टरपंथियों और पाकिस्तान सरकार के बीच दोस्ती देखने को मिल रही है, पीएम मोदी ने इशारों में ही दुनिया को बड़ा संदेश देने की कोशिश की है। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की अहम बैठक में ऑनलाइन संबोधन में PM ने स्पष्ट शब्दों में अफगानिस्तान का जिक्र किया और बढ़ते कट्टरपंथ से बने खतरे की ओर सबका ध्यान खींचा। पीएम मोदी जब हिंदी में कट्टरता पर आगाह कर रहे थे तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान टकटकी लगाए सुन रहे थे।
दरअसल, अफगानिस्तान में आतंकियों के सत्ता में आने के बाद क्षेत्र में अस्थिरता का खतरा पैदा हो गया है। वैसे भारत ने तालिबान के काबुल में सत्ता हथियाने के बाद एक बार बातचीत भी की है लेकिन उसे मान्यता देने पर अभी ‘वेट एंड वॉच’ की नीति अपना रहा है। आज जब पीएम को वैश्विक मंच और खासतौर से अफगानिस्तान के आस-पड़ोस के देशों के नेताओं के सामने बोलने का मौका मिला तो पीएम ने सीधे तौर पर कट्टरपंथ को क्षेत्र के लिए खतरा बताया और उसे आश्रय देने वाले पाकिस्तान को खूब सुनाया।
खतरा पाकिस्तान के लिए भी है
दरअसल, मौजूदा समय में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के क्षेत्र में इस्लामिक कट्टरपंथ तेजी से बढ़ा है। अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार के समय आतंकवाद काफी हद तक काबू में था और हक्कानी नेटवर्क, तालिबान, अलकायदा के बड़ी संख्या में आतंकी जेल में थे लेकिन अब सैकड़ों आतंकी जेल से रिहा किए जा चुके हैं और यह पूरा क्षेत्र कट्टरपंथी ताकतों का सुरक्षित ठिकाना बन चुका है।
इतिहास गवाह है कि जब 1996 में अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत आई थी दुनियाभर में कट्टर इस्लामिक गुट को पावर मिल गई थी। काबुल में तालिबान की सरकार बनने में पाकिस्तान और उसकी सेना की अहम भूमिका मानी जा रही है। जब तालिबान के लड़ाके शेरों के गढ़ पंजशीर को जीत नहीं पाए तो पाकिस्तान की एयरफोर्स की मदद से ही उन्होंने वहां अपना कब्जा जमाया।
अब समझने वाली बात यह है कि तालिबान राज पर इतरा रहे पाकिस्तान को समझना होगा कि तालिबानी कट्टरता बढ़ी तो उसे भी बड़ा नुकसान हो सकता है। पिछली बार भी तालिबान की जीत को पाकिस्तान के आतंकी गुटों के ‘चेलों’ की जीत माना गया था। अब दोबारा तालिबान सरकार बना चुका है, ऐसे में पाकिस्तान में इस्लामिक कट्टरता बढ़ सकती है। पीएम मोदी ने यूं ही कट्टरपंथ की बात नहीं की।
दरअसल, धर्म के नाम पर और खासतौर से ऐसा देखा गया है कि इस्लामिक देशों में शरिया कानून और दूसरे मुस्लिम देशों की तरह की राह पकड़ने की मांग जोर पकड़ती रहती है। ऐसे में काबुल में तालिबान राज देख पाकिस्तान में भी इमरान खान की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है। तालिबान के आने से पाकिस्तान में फिर से वहाबी इस्लाम बढ़ सकता है जो इस्लाम का कट्टरवादी स्वरूप है।
पाकिस्तान आतंकियों को लेकर डबल गेम करता है। एक तरफ वह आतंकवाद के खिलाफ जंग की बात करता है और खुद को उससे प्रभावित बताता है तो दूसरी तरफ अच्छा-बुरा आतंकवाद की बात करते हुए तालिबान, हक्कानी नेटवर्क, अलकायदा जैसे खूंखार आतंकियों को अपने यहां संरक्षण भी देता है। चिंता की बात यह है कि पहले से ही सीमापार आतंकवाद का सामना कर रहे भारत को कट्टरता बढ़ने पर बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि पाकिस्तान में बैठे आतंकी आका युवाओं को कट्टरता के नाम पर ही बरगलाते हैं।
कट्टरपंथ के चलते भरोसे में कमी
पीएम ने आज बैठक में ईरान, सऊदी अरब, मिस्र और कतर जैसे मुस्लिम बहुल देशों का जिक्र किया, पर किसी भी तरह से पाकिस्तान का नाम नहीं लिया। पीएम ने आगे कहा कि इस क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौतियां शांति, सुरक्षा और भरोसे में कमी से संबंधित है और इन समस्याओं का मूल कारण बढ़ता हुआ कट्टरपंथ है। अफगानिस्तान में हाल के घटनाक्रम ने इस चुनौती को और स्पष्ट कर दिया है। पीएम ने इस मुद्दे को एससीओ पहल के तौर पर काम करने की बात कही।
मोदी ने कहा कि इतिहास पर नजर डालें तो हम पाएंगे कि मध्य एशिया का क्षेत्र मॉडरेट और प्रोग्रेसिव कल्चर, वैल्यूज का गढ़ रहा है। सूफीवाद जैसी परंपराएं यहां सदियों से पनपीं और विश्व में फैलीं। इसकी झलक आज भी हम इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत में देख सकते हैं। ऐसे में एससीओ को कट्टरपंथ और आतंकवाद से लड़ने का एक साझा दृष्टिकोण विकसित करना चाहिए।
पीएम ने कहा कि भारत में और एससीओ के लगभग सभी देशों में इस्लाम से जुड़ी मॉडरेट, सहिष्णु और समावेशी संस्थाएं व परंपराएं हैं। एससीओ को इनके बीच एक मजबूत नेटवर्क विकसित करने के लिए काम करना चाहिए।
पीएम ने कहा कि कट्टरपंथ से लड़ाई क्षेत्रीय सुरक्षा और आपसी भरोसे के लिए आवश्यक है ही, यह हमारी युवा पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए भी जरूरी है। विकसित विश्व के साथ प्रतिस्पर्धा के लिए हमारे क्षेत्र को उभरती टेक्नोलॉजी में स्टेकहोल्डर बनना होगा। इसके लिए हमें विज्ञान और तर्कवादी सोच के लिए प्रोत्साहित करना होगा।
कट्टरपंथ के कारण अर्थव्यवस्था का कबाड़ा
पीएम ने कहा कि कट्टरपंथ और असुरक्षा के कारण इस क्षेत्र का विशाल आर्थिक पोटेंशियल भी अबतक निरर्थक ही साबित रहा है। इसका पूरा लाभ उठाने के लिए हमें आपसी कनेक्टिविटी पर जोर देना होगा। इतिहास में मध्य एशिया की भूमिका प्रमुख क्षेत्रीय बाजारों के बीच एक कनेक्टिविटी ब्रिज की रही है। यही इस क्षेत्र की समृद्धि का आधार है। भारत मध्य एशिया के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।
उन्होंने कहा कि हमारा मानना है कि चारों तरफ जमीन से घिरे देशों को भारत के विशाल बाजार से जुड़कर अपार लाभ हो सकता है। दुर्भाग्यवश आज कनेक्टिविटी के कई विकल्प उनके लिए खुले नहीं हैं। ईरान के चाबहार पोर्ट में हमारा निवेश और इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ कोरिडोर के प्रति हमारा प्रयास इसी वास्तविकता से प्रेरित है। पीएम ने कहा कि कनेक्टिविटी की कोई भी पहल वन वे नहीं हो सकती है, आपसी भरोसा सुनिश्चित करने के लिए कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट पारदर्शी और भागीदारी होनी चाहिए। इनमें सभी देशों की क्षेत्रीय संप्रभुता का सम्मान होना चाहिए।
यहां पीएम का इशारा पाकिस्तान और चीन की तरफ था जो भारत के अपने जम्मू-कश्मीर के इलाके पर नजरें गड़ाए हुए हैं। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर ग्वादर तक चीन का सीपीईसी प्रोजेक्ट चल रहा है। उधर, ईरान के चाबहार में भारत की ओर से किए जा रहे काम भी पाकिस्तान को पच नहीं रहा।
-एजेंसियां

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