कोर्ट से फरियाद, निजता और समानता के अधिकार का उल्‍लंघन है शराबबंदी!

अहमदाबाद। गुजरात में शराबबंदी को निजता का उल्लंघन और समानता के अधिकार के खिलाफ बताते हुए हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल हुई है। हालांकि कोर्ट का कहना है कि इस याचिका पर वह पहले राज्य सरकार की शराब बैन पॉलिसी के पक्ष को सुनेगी। याचिकाकर्ता ने बैन का विरोध करते हुए कहा कि यह न केवल प्राइवेसी का उल्लंघन करता है बल्कि बराबरी और जीने के अधिकार के संवैधानिक अधिकारों का भी हनन है।
याचिकाकर्ता राजीव पटेल ने गुजरात निषेध अधिनियम और बॉम्बे निषेध नियमों के कई धाराओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी जिसके अनुसार किसी शख्स को व्यक्तिगत स्थान में भी शराब पीने और ले जाने पर रोक है। उन्होंने जॉन स्टुअर्ट मिल का हवाला देते हुए कहा कि व्यक्तिगत स्थान पर शराब पीना खुद से जुड़ा हुआ कार्य है जिससे न ही किसी और को कोई हानि पहुंच सकती है और न ही यह सामाजिक सुरक्षा को खतरे में डालने जैसा है।
व्यक्ति को गरिमामय जीवन जीने से रोकते हैं नियम
याचिकाकर्ता के वकील ने निषेध अधिनियम से धारा 12, 13, 14-1बी, 65 और 66 को हटाने की मांग की। उनका कहना है कि ये धाराएं साफ तौर पर मनमानी, तर्करहित, असंगत, अनुचित और भेदभावपूर्ण हैं। ये समानता के अधिकार का उल्लंघन करती हैं। वकील ने समानता के अधिकार पर जोर दिया। वकील ने यह भी कहा कि इस तरह का कानून इंसान को सम्मानित गरिमामय और क्वॉलिटी लाइफ जीने से रोकता है।
उन्होंने कहा कि शख्स के बगैर ऐसी किसी स्थिति उत्पन्न किए जिससे सामाजिक सुरक्षा को खतरा हो, उसके व्यक्तिगत मामले में हस्तक्षेप करना सरकार का काम नहीं है। याचिका में यह भी कहा गया कि दलील देने वाले शख्स को व्यक्तिगत रूप से शराब खरीदने, लाने और उसके सेवन जैसी पर्सनल चॉइस से रोका नहीं जा सकता है।
सरकार का पक्ष सुनेगा हाई कोर्ट
याचिकाकर्ता ने गुजरात सरकार के निषेध कानूनों के उल्टे परिणामों का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि पिछले साल तक इससे जुड़े तकरीबन 3,99,221 मामले लंबित पड़े हैं जिनमें से 55 हजार से भी अधिक बॉम्बे निषेध अधिनियम के तहत हैं। इसके अलावा एक के बाद नकली शराब से जुड़ी घटनाएं भी सामने आती रहती हैं। मामले की सुनवाई के बाद चीफ जस्टिस आरएस रेड्डी और जस्टिस वीएम पांचोली की पीठ ने कहा कि वह पहले सरकार का पक्ष सुनेगी इसके बाद अगले हफ्ते इसकी आगे की सुनवाई करेगी।
-एजेंसियां

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