Nirvani Akhara को मोल्‍डिंग ऑफ रीलिफ पर लिखित नोट दायर करने की अनुमति

नई द‍िल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू पक्षकारों में से एक Nirvani Akhara को साइट पर भक्‍त के रूप में ‘देवता की पूजा के अधिकार का प्रबंधन’ करने के लिए एक लिखित नोट दायर करने की अनुमति दी। Nirvani Akhara के एक वकील ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख किया और कहा कि उनके मुवक्किल ने अदालत को मोल्डिंग ऑफ रीलिफ के लिए लिखित नोट दाखिल करने के लिए तीन दिन का समय दिया।

सुनवाई के दौरान उनके उठाए गए मुद्दों को कम किया गया और अब इसे शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री में इसे दाखिल करने के लिए मंजूरी की मांग की गई है। जस्टिस एस ए बोबडे और एस ए नजीर की पीठ ने निर्वाणी अखाड़ा का प्रतिनिधित्व करने वाले जयदीप गुप्ता को बताया कि आप इसे दर्ज कर सकते हैं। निर्मोही अखाड़ा और उसके प्रतिद्वंद्वी निर्वाणी अखाड़ा दोनों ही राम लल्ला विराजमान के जन्मस्थान पर पूजा का प्रबंधन करने का प्रस्ताव करने का अधिकार मांग रहे हैं।

इससे पहले निर्मोही अखाड़ा ने 1959 में मुकदमा दायर कर पूजा के अधिकार की मांग की थी, जबकि उनके दोस्त देवकी नंदन अग्रवाल द्ववारा क्रमशः 1961 और 1989 में निर्वाणी अखाड़ा द्ववारा दायर किए गए दो अलग-अलग मुकदमों में उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और देवता रामलला को पक्ष (प्रतिवादी) बनाया गया था।

लिखि‍त नोट में कहा गया है कि यह विनम्रतापूर्वक प्रस्तुत किया गया है कि उपरोक्त वादों में से किसी भी पक्ष (बीच में) के हिंदुओं ने पूजा के अधिकार के लिए दावा नहीं किया गया है, बल्कि इसके बजाय या तो मालिक के रूप में दावा कर रहे हैं या अगले दोस्त (देवता) के रूप में दावा किया गया है। और इस तरह विवादित ढांचे पर मंदिर निर्माण की मांग की गई है। इसलिए ‘पुजारी’ और/ या वर्तमान महंत के रूप में वर्तमान प्रतिवादी निर्वाणी अखाड़ा के अधिकार को लेकर को कोई विवाद नहीं है।

जानिए, क्‍या है मोल्डिंग ऑफ रिलीफ

सिविल सूट वाले मामलों के लिए मोल्डिंग ऑफ रिलीफ का प्रावधान होता है। इसका मतलब यह हुआ कि याचिकाकर्ता ने जो मांग कोर्ट से की है, यदि वह नहीं मिलती तो एवज में कौन से विकल्‍प उसे दिए जा सकते हैं। यानी यदि हमारे पहले दावे को नहीं माना जा सकता है तो किन नए दावों पर अदालत विचार कर सकती है। जहां तक अयोध्‍या मामले का सवाल है तो यदि विवादित जमीन का मालिकाना हक किसी एक पक्ष जाता है तो अन्‍य पक्षकारों को इसके बदले क्या मिले… हलफनामे के जरिए वे मांगों को रख सकते हैं।

17 नवंबर से फैसला आने की उम्‍मीद

17 अक्‍टूबर को फैसला सुरक्षित होने के बाद लोगों की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि वह क्‍या फैसला देती है। सुनवाई करने वाली संव‍िधान पीठ के अध्यक्ष मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई 17 नवंबर को सेवानिवृत हो रहे है। ऐसे में उसके पहले फैसला आने की उम्मीद है।

– एजेंसी

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