UP में “गठबंधन” पर “भरोसा” नहीं कर पा रहे लोग, चुनाव बाद भी पाला बदल लेने का डर

लोकसभा चुनावों के पहले चरण में कल UP की 8 सीटों पर मतदान हो चुका है। इन 8 सीटों में मुजफ्फरनगर व बागपत की वो 2 सीटें भी शामिल हैं जहां से आरएलडी मुखिया अजीत सिंह तथा उनके पुत्र जयंत चौधरी ने चुनाव लड़ा है लेकिन अभी 72 सीटों पर मतदान होना बाकी है।
सब जानते हैं कि UP में इस बार सपा-बसपा और आरएलडी ने गठबंधन किया है। इस गठबंधन के तहत बसपा 38 सीटों पर, सपा 37 सीटों पर और आरएलडी 3 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। रायबरेली और अमेठी की सीटें सोनिया व राहुल गांधी के लिए छोड़ दी गई हैं ताकि उन्‍हें गठबंधन का खामियाजा न भुगतना पड़े।
सपा-बसपा और आरएलडी के गठबंधन को चुनाव विशेषज्ञ भले ही बहुत बड़ी उपलब्‍धि मानकर चल रहे हों परंतु आम मतदाता इस बेमेल गठबंधन पर भरोसा नहीं कर पा रहा।
इनमें से बसपा एवं आरएलडी का ‘ट्रैक रिकार्ड’ तो साफ-साफ बताता है कि सत्ता की खातिर वह कभी भी पाला बदल सकते हैं और किसी भी दल की गोद में जाकर बैठ सकते हैं।
ऐसे में यह कहना मुश्‍किल है कि जिस मोदी के खिलाफ आज ये मजबूरीवश एक हुए हैं कल ऐसी ही किसी मजबूरी का नाम लेकर वह भाजपा के साथ नहीं चले जाएंगे।
पहले बात बसपा की
यदि बात करें बसपा सुप्रीमो मायावती की तो वह समाजवादी पार्टी से गठबंधन तोड़कर पहली बार जून 1995 में भाजपा के सहयोग से UP की मुख्‍यमंत्री बनी थीं। उनका यह कार्यकाल मात्र 4 महीने का था। वह दूसरी बार 1997 में तथा तीसरी बार 2002 में मुख्यमंत्री बनीं और तब भी उनकी पार्टी का बीजेपी के साथ गठबंधन था। यानि कुल चार बार मुख्‍यमंत्री बनने वाली मायावती को तीन बार भाजपा के सहयोग से UP की कुर्सी हासिल हुई।
सिर्फ 2007 के विधानसभा चुनावों में उन्‍हें स्‍पष्‍ट बहुमत मिला लिहाजा वह पूरे पांच साल अपनी पार्टी के बूते सत्ता पर काबिज रहीं। 2012 के चुनाव में सपा ने उन्‍हें तगड़ी पटखनी देकर सत्ता से बेदखल कर दिया।
आरएलडी का इतिहास
जहां तक सवाल आरएलडी का है तो उसके मुखिया चौधरी अजीत सिंह अपनी विश्‍वसनीयता पूरी तरह खो चुके हैं। बीच में लोगों को एक उम्‍मीद उनके पुत्र जयंत चौधरी से जगी थी कि शायद वह अपने पिता की ”पाला बदलने की प्रवृत्ति” पर लगाम लगायेंगे किंतु वह अपने पिता से दो कदम आगे निकलते दिखाई दिख रहे हैं।
2009 का लोकसभा चुनाव मथुरा से जयंत चौधरी ने भाजपा का सहयोग लेकर लड़ा था और वह उसमें भारी मतों से जीते भी किंतु 2012 के UP विधानसभा चुनाव में वह मथुरा की ही मांट सीट से इसलिए चुनाव लड़ने खड़े हो गए क्‍योंकि उन्‍हें किसी को स्‍पष्‍ट बहुमत न मिल पाने की स्‍थिति में ”अपना भविष्‍य” स्‍वर्णिम बनता नजर आ रहा था।
बहरहाल, इस चुनाव के नतीजे उनकी सोच से उलट निकले और समाजवादी पार्टी को स्‍पष्‍ट बहुमत मिल गया।
चुनाव के दौरान जयंत चौधरी या कहें कि आरएलडी ने मांट की जनता से वायदा किया था कि यदि वह यह चुनाव जीत जाते हैं तो लोकसभा की सदस्‍यता त्‍याग देंगे और विधायक रहकर क्षेत्रीय जनता की सेवा करेंगे परंतु यह वादा भी उन्‍होंने नहीं निभाया। उन्‍होंने लोकसभा की जगह विधानसभा की सदस्‍यता त्‍याग दी क्‍योंकि तब उन्‍हें कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली यूपीए सरकार में अपने लिए मौका दिखाई देने लगा था।
बेशक जयंत चौधरी को तो यूपीए सरकार में कोई पद नहीं मिला लेकिन अजीत सिंह ने सौदेबाजी करके तब नागरिक उड्डयन मंत्रालय झपट लिया जब ममता बनर्जी के साथ छोड़ जाने से मनमोहन सरकार अल्‍पमत में आ गई थी।
वैसे चौधरी चरण सिंह भी इस मामले में कम नहीं रहे। पुराने लोग भलीभांति जानते हैं कि किस तरह उन्‍होंने देश का प्रधानमंत्री बनने की अपनी महत्‍वाकांक्षा पूरी की थी और वह कितने दिन प्रधानमंत्री रहे थे।
आरएलडी के बारे में यह कहा जा सकता है कि इस पार्टी का नाम और पहचान (चुनाव चिन्‍ह) चाहे कितनी ही बार बदला हो परंतु इसके चाल व चरित्र में कभी बदलाव नहीं आया। मौकापरस्‍ती इनके चरित्र का स्‍थाई हिस्‍सा हमेशा बनी रही।
समाजवादी पार्टी की बात
समाजवादी पार्टी के जनक मुलायम सिंह यादव ने भी हालांकि मौके का लाभ उठाने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी, बावजूद इसके उनकी राजनीतिक विश्‍वसनीयता बनी रही।
सपा की राजनीतिक विश्‍वसनीयता पर पहली बार तब प्रश्‍नचिन्‍ह लगा जब 2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने मुलायम सिंह की इच्‍छा के विरुद्ध कांग्रेस से गठबंधन किया और उसमें मुंह की खाई। 2017 में कांग्रेस के साथ-साथ अखिलेश का जहाज तो डूबा ही, उसमें छेद भी हो गए।
यही छेद बाद में एक ओर जहां समाजवादी पार्टी के बिखर जाने का कारण बने वहीं दूसरी ओर शिवपाल यादव के अलग से ताल ठोकने की वजह भी बन गए।
अब इस पार्टी पर विश्‍वसनीयता का सबसे बड़ा संकट इसलिए पैदा हुआ क्‍योंकि अखिलेश यादव ने कुर्सी की खातिर न सिर्फ अपने परिवार का विघटन कराया बल्‍कि मायावती से हाथ मिला लिया।
मायावती चाहे कितना ही दिखावा कर लें किंतु सब जानते हैं कि समाजवादी पार्टी उन्‍हें फूटी आंख नहीं सुहाती। इसी प्रकार सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव को मायावती कतई बर्दाश्‍त नहीं हैं। मुलायम सिंह ने सपा-बसपा गठबंधन के बाद भी अपने इन भावों को सार्वजनिक करने में कभी हिचक नहीं दिखाई।
इसी कड़ी में मुलायम सिंह यादव के अखिलेश से कहे गए ये शब्‍द बहुत अहमियत रखते हैं कि मायावती से गठबंधन करके तुम आधी सीटों पर तो बिना लड़े ही हार चुके हो।
इन लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी का मतदाता मुलायम और अखिलेश की एक-एक गतिविधि पर पैनी नजर रखे हुए है।
मुलायम सिंह का प्रतिबद्ध वोटर आज यह कहने में कोई गुरेज नहीं कर रहा कि जिस पार्टी में हमारे मुखिया जी का सम्‍मान नहीं, जिस पार्टी में उनकी भावनाओं का कोई महत्‍व नहीं, पार्टी के निष्‍ठावान कार्यकर्ताओं की पूछ नहीं, उस पार्टी के लिए मतदान क्‍यों करें।
इन लोगों ने अंबेडकरनगर में हुई एक चुनावी रंजिश का उदाहरण भी दिया। इस रंजिश के चलते 1996 में दलित बसपा नेता बाबूलाल की हत्‍या हुई थी। इस हत्‍या में सपा के दो नेताओं को नामजद कराया गया। कल ही इन दोनों नेताओं बजरंग बहादुर यादव और जगन्‍नाथ पांडे को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है।
सपा के ये वोटर कहते हैं कि बसपा से हाथ मिलाने वाले अखिलेश के पास क्‍या इस बात का कोई जवाब है कि बजरंग बहादुर एवं जगन्‍नाथ जैसे कितने लोग आजतक बसपा से चुनावी रंजिश का खामियाजा क्‍यों भुगत रहे हैं और क्‍या कभी उनकी भावनाओं वो अखिलेश अहमियत देंगे जिन्‍होंने निजी स्‍वार्थ के लिए भाई-भाई के बीच दुश्‍मनी के बीज बो दिए।
मायावती की ”माया” से बेखबर
मुलायम सिंह के कारण सपा से अब तक बंधा हुआ मतदाता तो स्‍पष्‍ट कहता है कि मायावती की ”माया” पर भरोसा करना अंतत: अखिलेश के लिए ”आत्मघाती” साबित होगा।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि सपा-बसपा और आरएलडी का गठबंधन उन लोगों को भी हजम नहीं हो रहा जो कल तक मुखर होकर भाजपा की खिलाफत करते सुने जाते थे।
इन लोगों की मानें तो भाजपा को स्‍पष्‍ट बहुमत न मिलने की स्‍थिति में सर्वप्रथम आरएलडी उसके साथ खड़ी होगी। इसके बाद भी जरूरत पड़ी तो मायावती भाजपा का साथ निभाने में पीछे नहीं रहेंगी क्‍योंकि भाजपा में उनके कई राखीबंद भाई आज भी मौजूद हैं।
मायावती अपनी महत्‍वाकांक्षा कई मर्तबा सार्वजनिक कर चुकी हैं। सपा से धुरविरोध के बाद भी उसके साथ गठबंधन करने के पीछे मायावती की महत्‍वाकांक्षा ही है, इसे शायद ही कोई नकार सके।
ऐसे में रह जाते हैं सिर्फ अखिलेश, वो अखिलेश जो अपने परिवार के नहीं हुए। उनके कारण उनके छोटे भाई प्रतीक व उनकी पत्‍नी अपर्णा अपने लिए ठिकाना तलाश रहे हैं।
कौन नहीं जानता कि सपा की यह गति अखिलेश के ही कुर्सी प्रेम का नतीजा है और कुर्सी प्रेम के लिए ही परिवार आज इस मुकाम पर खड़ा है।
सबसे आखिर में बात कांग्रेस से संबंधों की
सबसे आखिर में कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस यूपी के अंदर बेशक हाशिए पर खड़ी हो परंतु केंद्र में सरकार बनाने के लिए ही वह एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।
यह बात मायावती, अखिलेश तथा अजीत सिंह अच्‍छे से समझते हैं और इसलिए तीनों इन दिनों पुराना याराना भुलाकर कांग्रेस को पानी पी-पीकर कोस रहे हैं।
मायावती की नजर में भाजपा और कांग्रेस सांपनाथ व नागनाथ हैं तो बबुआ के लिए बुआ का दुश्‍मन उनका निजी दुश्‍मन है। आरएलडी के अजीत सिंह के पास फिलहाल बुआ-बबुआ के सुर में सुर मिलाने के अलावा कोई चारा नहीं है।
लोगों का कहना है कि कांग्रेस से तीनों की इस अस्‍थाई राजनीतिक दुश्‍मनी का अंत उसी दिन एक झटके में समाप्‍त हो जाएगा जिस दिन किसी भी प्रकार केंद्र की सत्ता को खिचड़ी सरकार की दरकार होगी।
यही सब कारण है कि गठबंधन के दलों का प्रतिबद्ध मतदाता भी यह सोचने पर मजबूर है कि जब उनके आदर्श नेताओं का ही कोई दीन-ईमान नजर नहीं आ रहा तो वह प्रतिबद्धता जताकर क्‍या कर लेंगे।
इस प्रतिबद्ध वोटर को डर है कि आज मोदी के विरोध को एकजुट हुए ये दल कल जब भाजपा या कांग्रेस के साथ खड़े हो जाएंगे तब हमारा क्‍या होगा, और क्‍या होगा उस प्रत्‍याशी का जिसे आज हम यदि इनके कहने पर जिताकर लोकसभा पहुंचाएंगे।
वो सोच रहा है कि फिर क्‍यों न आज ही अपने बुद्धि-विवेक से और प्रत्‍याशी को देखकर मतदान किया जाए न कि पार्टी को देखकर।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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