अखिलेश के ”यश भारतीयों” की पेंशन तो हाथ से गई, पुरस्‍कारों पर समीक्षा बैठक अगले सप्‍ताह

लखनऊ। यश भारती सहित संस्कृति विभाग की ओर से दिए जाने वाले पुरस्कारों की समीक्षा को लेकर बैठक अगले सप्ताह सोमवार या मंगलवार को हो सकती है। इनमें इन पुरस्कारों की आगे की दिशा तय की जाएगी। फिलहाल जिन्हें पुरस्कार मिला है, उस पर कोई संकट नहीं है लेकिन पेंशन जारी रखने के मूड में शासन नहीं दिख रहा है।
पिछली सरकार में यश भारती को संस्कृति विभाग के सबसे अहम पुरस्कार के रूप में रखा गया था। हालांकि इसमें चयन की अर्हता शुरू से विवादों के घेरे में रही है। बहुत से काबिल लोगों को यह पुरस्कार मिला है, वहीं कई नाम ऐसे भी इस सूची में शुमार है जिनकी इकलौती योग्यता सत्ता के खास लोगों की सिफारिश ही रही। पुरस्कारों की संख्या बिना मानक के इस तरह बढ़ाई गई की विभाग के बजट तक पर संकट खड़ा हो गया। दो लोगों को पुरस्कार देने के लिए 11-11 लाख रुपये भारतेंदु नाट्य अकादमी और संगीत नाटक अकादमी से कर्ज तक लेने पड़े थे।
विभागीय मंत्री का कहना है कि पुरस्कार खत्म करने पर अभी फैसला नहीं हुआ है लेकिन इसकी समीक्षा जरूर होगी। फिलहाल हर महीने दी जाने वाली 50 हजार रुपये की पेंशन रोकी जा चुकी है। सूत्रों की मानें तो पहले किसानों की कर्ज माफी और सातवें वेतन आयोग के खर्चे के दबाव में दिख रही सरकार पेंशन जारी रखने की पक्षधर नहीं है। अगले सप्ताह इस दिशा में कोई नीति बनने के आसार है।
साहित्यकार राजकृष्ण मिश्र के उपन्यास ‘दारुलशफा’ का प्रकाशन करने वाली संस्था की अरुणा मिश्रा का कहना है कि राजकृष्ण को यह सम्मान पूर्व सीएम अखिलेश और एसपी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी के कारण मिला। यह लोग राजकृष्ण से व्यक्तिगत रूप से परिचित नहीं थे, लेकिन वह उनकी लेखन एवं रचना प्रक्रिया से परिचित थे। विशेष तौर पर राजकृष्ण के लिखे उपन्यास ‘दारूलशफा’ की इसमें अहम भूमिका रही।
-एजेंसी