युवा कवि सलिल सरोज की पांच प्रमुख कविताएं

आधा प्रेम

मेरे खेत की मुँडेर पर
वो उदास शाम आज भी
उसी तरह बेसुध बैठी है
जिसकी साँसें सर्दी की
लिहाफ लपेटे ऐंठी है

मुझे अच्छी तरह याद है
वो शाम
जब तुम
दुल्हन की पूरी पोशाक में
कोई परी बनकर
आई थी

जब सूरज
क्षितिज पर कहीं
ज़मीन की आगोश में
गुम हो रहा था
चाँद अपने बिस्तर से
निकल कर
सितारों के साथ
अपनी छटाएँ
बिखेर रहा था
ठण्ड की बोझिल हवाएँ
मेरे बदन के रोएँ
खड़ी कर जाती थी
और
इन हालातों में
सिर्फ और सिर्फ
तुम याद आती थी

तुम्हारे होंठों पर
कहने के लिए
कई उम्र की बातें थी
आँखों में बहने के लिए
पूरा एक समंदर था
और
चेहरे की शिकन में
मजबूरियों का कोई पिटारा
जो बस खुलता
और खत्म कर जाता
हमारे इश्क के सारे
वो अफसाने
जो दुनिया की निगाहों में
खटक रहा था
मैं तुम्हारे काबिल नहीं
और
तुम मेरे काबिल नहीं
हर कोई
बस यही
कह रहा था

तुमने भींगे लफ़्ज़ों से
इतना ही कहा
ये हमारी आखिरी मुलाक़ात है
और
फिर उसके आगे
मैं कुछ न सुन सका

हर गुजरता लम्हा
मेरे साँस की आखिरी
तारीख़ लग रही थी

आँखें बर्फ सी जम गई थी
तुम्हारी आँखों में
और जिस्म सारा
इस संसार से ऊब चुका था

मैं बस इतना ही पूछ सका
“आखिर क्यों”
और
वो बस इतना ही बोल सकी
“लड़कियों को मोहब्बत भी
ज़माने से
पूछ कर करनी पड़ती है
और
उसकी कीमत ज़िन्दगी भर चुकानी पड़ती है

मैं कल किसी और की हो जाऊँगी
शरीर से जीवित रहूँगी
पर
आत्मा से मर जाऊँगी”
……………..

आग की जद में बेजान लाशें भी चींखेंगी कहीं न कहीं

जब दीप जलाई है तो रोशनी बिखरेगी कहीं न कहीं
ये फ़िज़ा दुल्हन सी जरूर निखरेगी कहीं न कहीं

बेटियाँ नेमतें है जो सबको खुदा अता नहीं करता
बेटियों की हँसी से खुशियाँ दिखेंगी कहीं न कहीं

बस एक मौके की दरकिनार है इनके जज़्बों को
ये आज की नारी हैं,ये इतिहास लिखेंगी कहीं न कहीं

इस बेजान जम्हूरियत में बदलाव बहुत जरूरी है
आवाम की ज़बानें हैं ये ,सच कहेंगी कहीं न कहीं

कब तक ज़ुल्म दबा सकता है शराफत की तदबीरें
आग की जद में बेजान लाशें भी चींखेंगी कहीं न कहीं

…………….
सहूलियत के परदों में

हम सब
अपनी सहूलियत के परदों में
इस कदर छिपे हुए हैं
कि
हर नई चुनौती
हमें मज़बूरी लगती है

हम अभ्यस्त हो गए हैं
बासी ज़िन्दगी जीने के लिए
जिसमें ताज़ा कुछ भी नहीं
ना ही साँस और ना ही उबाँस

हमें तकलीफ होती है
जब रोज़मर्रा की लीक से
कुछ अलग हो जाता है
और
हमें अपनी ही कूबत पर
शर्म आने लगती है
और
कई बार हैरानी भी होती है
कि
क्या हम सचमुच
इंसान कहलाने के लायक भी हैं
जिसका धर्म है परोपकार
जब कि
आज इंसान खुद की सहायता नहीं कर पा रहा है

…………………………..

एक कविता का मर्म

मैं रोज़ कुछ लिखता हूँ
और भूल जाता हूँ कि
कल क्या लिखा था
क्या विषय था मेरे लिखने का
और किस कारण मैंने ऐसा लिखा था

मेरी उस कविता से कितना कुछ बदल गया
और कितनी बेहतर स्‍थिति में पहुँच गया ये समाज
जिस में मैं रहता हूँ
और जिसे रोज़ कोसता हूँ
इसकी नपुंशकता के लिए
इसके मरे होने के लिए
जहाँ कुछ भी बदलता नहीं
और बदलता है तो
सिर्फ चन्द लोगों के लिए
जो शक्ति के स्वामी हैं
जिन्हें छूट है अपनी मनमानी की
जो रोज़ संविधान में संशोधन का माद्दा रखते हैं
जिन्हें समझ है धन के इस्तेमाल का
और जाति,धर्म,अशिक्षा,गरीबी,बेरोज़गारी की राजनीति का

क्या इन सब में फँस कर
मेरी कविता उसी रूप में पढ़ी,देखी और समझी जाएगी
जैसा कि मैं लिखता हूँ
या किसी दिन रोड पर पड़े
बेनाम लाश की तरह
मुर्दाघर में फेंक दी जाएगी
या किसी बच्ची की तरह
इसकी भी इज़्ज़त लूट ली जाएगी
और खुले बदन छोड़ दिया जाएगा तमाशा बनने के लिए
बीच बाज़ार में
या किसी दिन सदन में ये बहस होगा
की ऐसी कविताएँ क्यों रची जाती हैं
कौन है इसका लेखक
और क्या उसका संबंध
वर्ग-विभाजन और राष्ट्रद्रोह से

और
मेरी कविता लिखने की
क्षमता पर प्रश्न उठाकर
मेरी प्रतिभा पंगु कर दी जाएगी
फिर
किसी गुमशुदा जगह पर फटेहाल मैं मिलूँगा
और बदनाम हो जाएगी
मेरी वो कविता
जो कई रात जाग कर
बीवी से झगड़ कर
और बच्चों के हाथों से
फटने से बचाके लिखी थी
आँखों के नीचे काले गढ्ढ़े
और बालों की सफेदी
इस बात की साक्षी हैं कि
मैने अपना खून जलाया है,
स्वेद बहाया है
और
खुद को खोया है
इस कविता के निर्माण में

पर अब मैं सत्य समझ चुका हूँ
कि
सत्य वो नहीं
जो मैं अपनी कविताओं में लिखता हूँ
बल्कि हर एक का सत्य अलग है
जो हर कोई अपनी सहूलियत से मेरी कविता से निकालता है
और छोड़ जाता है
मेरी कविताओं में
एक सड़ी हुई लाश
और उस लाश से घिरा
मुझ जैसा उसका लाचार लेखक

……………………
मासूमों के चेहरे सियासी खून से क्यों धो रहे हो

अपने खेतों,अपने बगीचों में जहर क्यों बो रहे हो
मासूमों के चेहरे सियासी खून से क्यों धो रहे हो

तुमने ही खुद जलाई हैं सारी की सारी बस्तियाँ
अब अपना घर जला तो इस तरह क्यों रो रहे हो

बच्चियाँ लुट गईं, खत्म हो गईं सब तहज़ीबें
एक दिन सब अच्छा होगा,भ्रम में क्यों सो रहे हो

कल जो होना होगा वो तो होकर ही रहेगा
उसके इंतज़ार में मुट्ठी में बंद आज क्यों खो रहे हो

जब था इंक़लाब में आवाज़ उठाना तुम्हें, तुम चुप रहे
फिर आज इस तानाशाही पे बेचैन क्यों हो रहे हो।

salil saroj
salil saroj

– सलिल सरोज

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