अपनी सख्त मिज़ाजी या कहें कि बदमिज़ाजी के लिए मशहूर पुणेकर

Our strict tempered Or to say that bad temper Famous for Punekar
अपनी सख्तमिज़ाजी या कहें कि बदमिज़ाजी के लिए मशहूर पुणेकर

पुणे के सदाशिव पेठ इलाक़े की गलियों में एक बोर्ड पर नज़र पड़ी. इस पर मराठी में लिखा था, ‘ये रहालकर की निजी पार्किंग है. मंदिर आने वाला कोई और शख़्स यहां गाड़ी नहीं पार्क कर सकता है. अगर किसी ने अपनी गाड़ी यहां खड़ी की तो गाड़ी के टायरों की हवा निकाल दी जाएगी और उस पर ताला लगा दिया जाएगा. ताला तभी खुलेगा, जब वो इंसान 500 रुपये जुर्माना भरेगा.’ पार्किंग न करने की चेतावनी देने वाला ये मज़ेदार बोर्ड देख कर किसी को भी हंसी आ सकती है. इसी प्रकार पुणे के मशहूर रेस्टोरेंट एसपी बिरयानी हाउस पर लगा एक बोर्ड देखा था. उस पर लिखा था, ‘हमारी बिरयानी कभी भी ख़त्म हो सकती है. कृपया नाराज़ होकर मैनेजमेंट से बहस न करें.’
पुणे शहर के पुराने हिस्से में आप को ऐसे ही तमाम साइन बोर्ड मिल जाएंगे. ऐसे बोर्ड ‘पुनेरी पात्या’ के नाम से जाने जाते हैं. इन्हें आप कार पार्किंग, रेस्टोरेंट, दुकानों और मकानों पर लगे देख सकते हैं.
साइन बोर्ड
कई साइन बोर्ड तो ऐसे हैं, जो कई दशकों से लगे हैं. इसके अलावा अक्सर नए बोर्ड भी लगा दिए जाते हैं. पुणे के ये बोर्ड इतने मशहूर हैं कि सोशल मीडिया पर अक्सर सुर्ख़ियां बटोरते हैं.
पुणेकर सख्तमिज़ाजी के लिए मशहूर
मुंबई की तर्ज पर पुणे के बाशिदों को पुणेकर कहा जाता है. वो अपनी सख्त मिज़ाजी के लिए पूरे इलाक़े में मशहूर हैं, या यूं कहें कि बदनाम हैं. कई दफ़े तो उनका बर्ताव बहुत रूख़ा होता है.
पुणे के लोग बहुत कम शब्दों में बात करते हैं. जो भी वो बोलते हैं वो अक्सर सपाट और सख्त लहजे वाली बातें होती हैं.
पुणे के लोगों का ये टशन कई फ़िल्मों जैसे मुंबई-पुणे-मुंबई और टीवी कार्यक्रम जैसे पुनेरी पुनेकर में भी दिखाया गया है.
मूल रूप से नासिक के रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर चेतन चंद्ररात्रे कहते हैं कि ‘पुणे के लोगों से दोस्ताना होने के लिए बहुत वक़्त देना पड़ता है और कोशिश करनी पड़ती है.
जब रश्मि जोशी अपने भावी जीवनसाथी से मिलने नासिक से पुणे आईं तो रेस्टोरेंट में मुलाक़ात के बाद वो उस वक़्त हैरान रह गईं, जब उसने उन्हें आधा बिल देने को कहा.
रश्मि कहती हैं कि, ‘मुझे इसकी बिल्कुल उम्मीद नहीं थी. मुझे ये लगा था कि पहली मुलाक़ात में वो मुझे रिझाने की कोशिश करेगा.’
किसी भी बाहरी के लिए पुणे के लोगों से घुलना-मिलना एक बड़ी चुनौती होती है.
रूखे स्वभाव का बनता है मज़ाक
पुणे से क़रीब 150 किलोमीटर दूर स्थित मुंबई के लोगों का पुणे के बाशिंदों से कभी प्यार कभी इंकार का नाता रहा है.
मुंबई के लोग अक्सर पुणे के रहने वालों के रूखे स्वभाव का मज़ाक उड़ाते हैं.
इस बारे में एक मशहूर चुटकुला भी है कि, ‘अगर आप पुणे में किसी के घर जाएंगे, तो वो आप से पूछेगा कि क्या आप पानी पिएंगे (आम तौर पर हिंदुस्तान में घर आने वाले मेहमान को बिना पूछे ही पानी दिया जाता है. ऐसे में पुणे के लोगों का ये पूछना अशिष्टता माना जाता है.)’
रूखे बर्ताव के क्या हैं कारण?
डॉक्टर दीक्षित इस सपाट और रूखे बर्ताव की वजह पुणे के इतिहास को बताते हैं. वो कहते हैं कि, ‘पुणे के लोगों में ये टशन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वजहों से आया है. इसके लिए माहौल ज़िम्मेदार है.’
पुणे शहर एक ज़माने में यानी अठारहवीं-उन्नीसवी सदी में पेशवाओं की गद्दी था. यहीं से अंग्रेज़ों से लोहा लेने वाला मराठा साम्राज्य चलता था.
ये जब अपने उरूज पर था, तो मराठा साम्राज्य पाकिस्तान के पेशावर शहर से ओडिशा और तंजावुर तक फैला हुआ था. सत्ता के केंद्र के रूप में पुणे का दायरा भी उस वक़्त ख़ूब बढ़ा. इलाक़े में इसकी शान बढ़ी.
पहले पेशवा बालाजी विश्वनाथ भट्ट चितपावन ब्राह्मण थे. भारत के समाज में ब्राह्मण सबसे ऊंची पायदान पर माने जाते हैं.
ब्राह्मणवादी संस्कृति का चलन
बालाजी के पुणे में ठिकाना बनाने से कोंकण से बहुत से चितपावन ब्राह्मण बेहतर ज़िंदगी की तलाश में पुणे आकर बसे थे. पेशवा की गद्दी वंशवादी हो गई. इससे महाराष्ट्र में ब्राह्मणवादी संस्कृति का चलन बढ़ गया.
डॉक्टर दीक्षित कहते हैं कि, ‘जब किसी एक समुदाय के नेता के पास ताक़त आ जाती है, तो उसके इर्द-गिर्द उसी के समुदाय के लोगों का झुंड जमा हो जाता है. पेशवाओं के दौर में बहुत से ब्राह्मण ऊंचे पदों पर पहुंचे. इससे पुणे शहर में ब्राह्मणों का बोलबाला हो गया.’
नतीजा ये हुआ कि समाज पर ब्राह्मणवादी संस्कृति हावी हो गई. निचली जातियां आर्थिक-सामाजिक रूप से हाशिए पर चली गईं. ब्राह्मणों का मुख्य पेशा पूजा-पाठ और अध्ययन-अध्यापन रहा है. वो पेशवाओं के सलाहकार बन गए.
पेशवाओं के निज़ाम में वो अधिकारी, बैंकर और प्रशासक बन गए. असरदार परिवारों के बीच रिश्तेदारियां होने से सत्ता पर ब्राह्मणों की पकड़ और मज़बूत हो गई.
इस सत्ताधारी तबक़े ने ही जातियों के रहन-सहन और पाबंदियों के नियम तय किए. समाज में ऊंच-नीच का बहुत ज़्यादा ध्यान रखा जाने लगा.
आम तौर पर क़ानून का पालन कराने की ज़िम्मेदारी इसी तबक़े के पास थी. लेकिन आज ये ताक़त केवल पत्या यानी बोर्ड लगाकर अपनी हस्ती की नुमाइश करने तक सीमित रह गई है.
आज जिस रूखे अंदाज़ में ये बोर्ड लिखे जा रहे हैं, ये गुज़रे ज़माने की ऐंठ की ही निशानियां हैं.
पेशवाओं के ज़माने में मज़बूत स्थिति होने के बावजूद, पुणे के ब्राह्मण आम तौर पर सामान्य ज़िंदगी ही जीते थे. आज भी उनका रहन-सहन वैसा ही है.
टशन पर अभिमान, बदलना नहीं चाहते
पुणे की रहने वाली चितपावन ब्राह्मण माया लेले कहती हैं कि, ‘कोंकण में हमारे पुरखों की ज़िंदगी में बहुत सारी मुश्किलात थीं. इलाक़ा पहाड़ी था, भारी बारिश की वजह से खेती करना और जीवन बसर करना दुश्वार था. इसीलिए हमें वक़्त, पैसे और कोशिशों की अहमियत अच्छे से पता है. हम किसी भी चीज़ को हल्के में नहीं लेते.’
जोशी इसी बात को दूसरे तरीक़े से कहते हैं, ‘पुणेकर हमेशा हर चीज़ का अधिकतम इस्तेमाल करना जानते हैं. यहां के लोग आधा पेट खाकर सोना पसंद करते हैं. पेट में खाना ठूंस कर उसे बर्बाद करने में यक़ीन नहीं रखते.’
अब आप चाहे जिस नज़रिए से देखें, पुणे के लोगों का ये बर्ताव सदियों की संस्कृति और माहौल की वजह से है. कोंकण में उनकी उत्पत्ति से लेकर पेशवाओं के राज में पुणे आकर बसने और सत्ता के गलियारों में पैठ बनाने तक उन्होंने लंबा सफ़र तय किया है.
आज उन ब्राह्मणों के ज़्यादातर वारिस पुणे के पुराने इलाक़ों में आबाद हैं. वो उसी सीधे-सपाट रवैये वाला बर्ताव दिखाते हैं. कम से कम में काम चलाना जानते हैं. वो ये सुनिश्चित करते हैं कि बाहर से आने वाले लोग उनके बताए नियम-क़ायदों पर चलें. इसीलिए वो ऐसे साइनबोर्ड भी लगाते हैं.
पुनेरी को अपने टशन पर है अभिमान
पुनेरी टशन से बाहरी लोग परेशान होते हैं, हैरान होते हैं और कई बार चिढ़ भी जाते हैं. लेखक और व्यंगकार पी एल देशपांडे ने पुनेकरों के बर्ताव को अपने मराठी लेख ‘तुम्हाला कोन व्हेचाय?’ में बहुत अच्छे से बयां किया है.
पुणे के लोगों को अपने टशन पर अभिमान है. वो इसे बदलना नहीं चाहते.
पिछले कुछ दशकों में बाहर से आकर लोगों के बसने की वजह से पुणे का रंग-रूप काफ़ी बदल गया है. दूसरे देशों से आकर भी लोग यहां के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों मे पढ़ते हैं. आज इसे पूरब का ऑक्सफोर्ड कहा जाने लगा है.
पुणे को महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी भी कहा जाता है. दूसरे राज्यों से लोग यहां रोज़गार की तलाश में आते हैं. ये सॉफ्टवेयर का बड़ा गढ़ भी है.
रूखे बर्ताव की टशन में भी झलक
इसके बावजूद यहां के सांस्कृतिक नियम बहुत सख़्त हैं. पुणे के लोगों का रूखा बर्ताव केवल साइन बोर्ड में ही नहीं दिखता, उनके बर्ताव में टशन से भी झलकता है.
पुणे के रहने वाले विनय कुलकर्णी कहते हैं कि जब वो पुराने शहर के एक मंदिर में दर्शन के लिए गए तो उन्हें बताया गया कि ‘ये भगवान के सोने का वक़्त है. शाम को आना.’
अगर आप पुणे के पुराने इलाक़े की किसी दुकान में दोपहर एक बजे पहुंचेंगे तो आप को रुखाई से बताया जाएगा कि ‘अभी जाओ, शाम चार बजे आना. अभी आराम का वक़्त है.’ आप कितनी भी मिन्नतें कर लें, दुकान नहीं खुलेगी, तो नहीं खुलेगी.
ईज़ ऑफ़ लिविंग इंडेक्स में पुणे टॉप पर
डॉक्टर मधुकर दीक्षित कहते हैं कि, ‘इस टशन की वजह से कई बार कारोबार को नुक़सान होता है लेकिन पुणे के लोग मानते हैं कि वो अच्छी क्वालिटी देते हैं तो ग्राहक उनके पास ज़रूर लौटेगा.’
बाहरी लोग अक्सर इन नियमों का मज़ाक़ उड़ाते हैं लेकिन यूं लगता है कि इसमें कोई तो ख़ास बात है.
अगस्त में जारी हुई जीवन जीने के पैमाने वाली रिपोर्ट यानी ईज़ ऑफ़ लिविंग इंडेक्स रिपोर्ट के मुताबिक़ पुणे भारत में रहने के लिए सब से अच्छा शहर है. यहां के शहरी विकास, सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक कारकों की वजह से ये भारत का सबसे अच्छा शहर माना गया है.
बाहरी लोगों को चंद्रात्रे की बात पर ग़ौर करना चाहिए. वो कहते हैं कि, ‘आपको माहौल से तालमेल बिठाने में वक़्त लगेगा. मगर एक बार आप यहां के माहौल का हिस्सा बन गए तो आप को यहां रहने में मज़ा आने लगेगा.’
कुछ मज़ेदार होते हैं तो कुछ में लंबा-चौड़ा ज्ञान और तंज़ देखने को मिल जाता है. कई बार तो इन पर बहुत कड़वी बातें भी लिखी दिख जाती हैं.
पुणे की पुरानी गलियों में घूमते हुए ऐसे जिन बोर्ड पर मेरी निगाह पड़ी है, उनमे से कुछ तो मुझे बहुत पसंद आए.
जैसे, ‘अगर एक बार घंटी बजाने के बाद भी जवाब नहीं मिलता, तो समझिए कि हम आप से नहीं मिलना चाहते तो निकल लीजिए.’
‘घंटी बजाने के बाद इंतज़ार कीजिए. यहां रहने वाले इंसान हैं, स्पाइडरमैन नहीं.’
‘अगर कोई यहां गाड़ी पार्क करता है, तो गाड़ी के टायर पंक्चर कर दिए जाएंगे.’
‘हमारे बेटे की शादी की तारीख़ तय हो गई है, तो अब शादी का कोई नया प्रस्ताव न ले कर आएं.’
सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी में पढ़ा चुके डॉक्टर श्रीधर मधुकर दीक्षित कहते हैं कि, ‘ये बात शायद 1960 या 1970 के दशक की होगी, जब पत्या लिखे जाने लगे. पुणे के लोग सीधे-सपाट होते हैं. वो पत्या के ज़रिए ये बताने से नहीं हिचकते कि कैसा बर्ताव करना चाहिए.’
-बीबीसी ट्रैवल

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