केवल संतों द्वारा लिखित Spiritual ग्रंथों से ही सात्विकता प्रगट होती है

इस्तांबुुल, तुर्की में संपन्न हुई अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक परिषद, महर्षि अध्यात्म विवि की द्वारा लेखक का Spiritual स्तर और उसकी Spiritual स्थिति का उसके लेखन पर प्रभाव पर शोधप्रबंध प्रस्‍तुत

नई दिल्‍ली। महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की ओर से इस्तांबूल, तुर्की में संपन्न अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक परिषद में‘लेखक का Spiritual स्तर और उसकी Spiritual स्थिति का उसके लेखन पर प्रभाव’, इस विषय पर शोधनिबंध प्रस्तुत किया गया।

महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के श्री. मिलुटिन पॅन्क्रॅट्स ने प्रतिपादित किया कि व्यवहारिक विषयों पर पुस्तकें लिखना जितना सरल है, उतना spiritual विषयों पर ग्रंथ लिखना सरल नहीं है क्योंकि अध्यात्म विषय सूक्ष्म (अर्थात पंचज्ञानेंद्रिय, मन और बुद्धि से परे) है। आध्यात्मिक ग्रंथों के लेखक को सूक्ष्म ज्ञान होना आवश्यक है । जिस लेखक को सूक्ष्म ज्ञान होता है, उसके साहित्य में समाजमन को अध्यात्म के संबंध में प्रभावित करने का सामर्थ्य होता है । इसलिए केवल संतों द्वारा लिखित आध्यात्मिक ग्रंथों से सात्त्विकता प्रक्षेपित होती है । वे तुर्की के इस्तांबूल में 26 अक्टूबर 2018 को संपन्न ‘साहित्य का अध्ययन’ विषय की 7 वीं अंतरराष्ट्रीय परिषद में बोल रहे थे । BILSAS (Science, Art, Sport Productions) द्वारा आयोजित परिषद में श्री. मिलुटिन पॅन्क्रॅट्स ने शोधनिबंध प्रस्तुत किया । इस शोधनिबंध के लेखक महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी हैं तथा सहलेखक विश्‍वविद्यालय के श्री. शॉन क्लार्क तथा श्री. मिलुटिन पैन्क्रैट्स हैं ।

श्री. पॅन्क्रॅट्स आगे बोले कि एक प्रयोग में 3 गुटों के लेखकों द्वारा लिखित पुस्तकों की आध्यात्मिक स्तरीय गुणवत्ता ऊर्जा और प्रभामंडल का मापक यंत्र तथा सूक्ष्म परीक्षण द्वारा निरीक्षण किया गया । दोनों प्रकार के निरीक्षणों में संतों द्वारा लिखित ग्रंथों से अत्यधिक मात्रा में सात्त्विक स्पंदन प्रक्षेपित होते दिखाई दिए। सामान्य व्यक्ति और पाखंडी गुरु इन अन्य दो गुटों के लेखकों द्वारा (जो नकारात्मक स्पंदनों के प्रभाव के अधीन थे) लिखित पुस्तकों से कष्टदायक स्पंदन प्रक्षेपित हो रहे थे ।

आध्यात्मिक ग्रंथों का लेखक यदि संतपद की अपेक्षा कम आध्यात्मिक स्तर का हो, तो उसके लेखन का उद्देश्य अधिकतर प्रसिद्धी अथवा अर्थाजन होता है । यदि लेखक का उद्देश्य व्यवहारिक अथवा आध्यात्मिक तत्त्वों के विरुद्ध हो, तो उसे ईश्‍वर की सहायता नहीं मिलती । नकारात्मक स्पंदन लेखकों की ऐसी व्यवहारिक महत्त्वाकांक्षाआें का लाभ उठाकर उसे अपने रज-तम विचारों से प्रभावित करते हैं तथा उसके ग्रंथ के माध्यम से समाज को भ्रमित करने का प्रयास करते हैं । श्री. पॅन्क्रॅट्स ने यह भी कहा कि संतों के मार्गदर्शन में प्रतिदिन आध्यात्मिक साधना करने से पुस्तकों से प्रक्षेपित होनेवाले स्पंदनों को हम सटीक पहचान पाते हैं तथा पाखंडी गुरु के पाखंड में फंसने से बच जाते हैं ।

-Legend News

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