ओंकार ही अनदह नाद है, जो सारी दुनिया में सब जगह गूंज रहा है

दीपक जलाते हैं तो उसकी लौ सदैव सूर्य की दिशा में रहती है, स्थूल पदार्थ सदा पृथ्वी की ओर भागता है। ठीक इसी प्रकार जीवन भी पूर्णता के लिए छटपटाता रहता है पर इसकी पूर्णता के लिए ज्ञान चाहिये, तत्व ज्ञान। सच्चा ज्ञान। सच्ची साधना चाहिये, जिससे आत्मा बलिष्ठ हो सके। चाहिये तप, जिससे अपने अंदर पड़े हुए जन्मों के पाप बीजों को जलाने की हिम्मत पैदा कर सकें। उपासना चाहिये, जिससे आत्मिक शक्ति बढ़ सके और ब्रह्मकवच प्राप्त हो।

इसी के लिए हमें भक्ति, कर्म व ज्ञान तीनों की फिलॉसॉफी समझनी होगी। वास्तव में जो भी कर्म हम कर रहे होते हैं, उसे कहते हैं क्रियमाण कर्म, जो कर्म करने के बाद खाते में जमा होता है उसे कहते हैं ‘‘संचित डिपॉजिट’’ और जो डिपॉजिट किया हुआ है, वह जब पक जाता है, तब बनता है किस्मत। किस्मत जिसे बदलने हेतु भगवान भी दखलन्दाजी नहीं करते। किस्मत का लिखा तो भोगना ही पड़ता है। लेकिन जो जमा पूंजी है, अभी पकी नहीं, उसको तपस्या से, साधना से जला सकते हैं। ओंकार की चेतना इसी स्थान पर काम करती है। कोई उसे ध्यान में स्थापित करता है, कोई नाद में, कोई संकल्प में ओंम शक्ति को धारण कर परमात्मा की ओर अर्थात् पूर्णता के नजदीक जाने का पुरुषार्थ करता है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं साधना के मार्ग पर चलते-चलते यदि किसी भक्त की मृत्यु हो जाती है, तो जहां उसकी साधना छूटती है, अगले जन्म में भगवान उसे वहीं से पकड़कर ले चलते हैं। शास्त्रगत है कि साधना करते शरीर छूट गया तो उसका अगला जन्म ऐसे धर्मात्मा परिवार में होगा, जहां माता-पिता, धन-सम्पदा से भरे पूरे होने के साथ ही उनके संस्कार भी भक्ति पूर्ण होंगे, जीव की भक्ति और साधना में कोई विघ्न-बाधा न डाले, इसका भी प्रबंध होगा। उसी स्तर के गुरु भी आसानी से मिल जाएंगे और यात्र आगे बढ़ जायेगी।

इसलिए जरूरी है हम भगवान की भक्ति की तरफ चलें, ब्रह्म यात्री बनें, कल्याणमार्ग के पथिक बनें। घर की जिम्मेदारियां निभाते, अर्ज व फर्ज निभाते हुए आगे बढ़ें। जीवन से जुड़े फर्ज निभाते हुए भगवान की उपासना की नियमितता बनाये रखें है। प्रार्थना की अनेक विधियां हैं, मंत्रजप, ध्यान, सिमरन आदि। पर महत्वपूर्ण है ओंकार ध्यान, जप व ओंकार उच्चारण।

15-20 मिनट का ओंकार ध्यान रोज करें, इसी उच्चारण से बहुत बड़ा परिवर्तन आयेगा

कण-कण में गूंज रही है। इसी ध्वनि को हम विविध तत्व रूपों में सुन सकते हैं। वह मंदिर के घंटे में हो या शंख बजाने के बाद उभरती गूंज में अथवा आसमान में बादलों के बीज से गरजती आवाज, समुद्र की लहरों से उठती आवाज हमारे मंद व दीर्घ उच्चारण, गीत-संगीत आदि की आत्मा मूल में समाई धुन हो। ओंम की ही गूंज सबमें निहित है। यही अनदह नाद है जो सारी दुनिया में सब जगह गूंज रहा है। कभी हम अपने अंदर की आवाज सुने तो सनननन———की यह ध्वनि आेंकार ही है। मंत्रें द्वारा हम इसी धुन को आत्मसात करते हैं। मंत्र में शक्ति भी सिर्फ ओंकार के कारण पड़ती है। प्रत्येक मंत्र में इसीलिए ‘‘ओ३म्’’ लगाकर मंत्र का उच्चारण किया जाता है।

भगवान ने ओंकार हमारे चेहरे व हर अंग पर लिख रखा है। नाक और आंखें ‘‘ओ३म्’’ आकार में ही हैं। इस तरह से बना हुआ नासिका, ओठ, अंदर का मुख भी ओम के आकार में है। पूरा शरीर ही ओंकार का स्वरूप है। ध्यान में ओंकार की ध्वनि को मंद-मंद सुनना ही अन्तर्नाद है। इसलिए सभी मतों, पंथों, सम्प्रदायों में किसी न किसी रूप में ओंकार प्रतिष्ठित है। सिख पंथ श्रद्धापूर्वक ओंकार सतनाम का उच्चारण करता है। जैन साधु सम्प्रदाय नमोकार उच्चारण बोलते हैं। ओम् नमो सिद्धणाम, नमो अरिहन्ताणाम् आदि सबमें ओंकार लगाकार उच्चारण किया जाता है।

बौद्ध ‘‘ओम् नमो पद मे ओम्’’ का उच्चारण करते हैं। मुसलमान या क्रिश्चियन में सीधा ओम् नहीं है, लेकिन वैसी ही एक मिलती जुलती ध्वनि है ‘‘आमीन’’ और क्रिश्चियन ‘‘आमेन’’ है। इसी ध्वनि से योगी ध्यान करते हैं। सच कहें तो ओंकार ही हमारे चारों ओर विद्यमान है। इसीलिए कहते हैं ‘‘ओम्कारं बिन्दु संयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः, कामदं मोक्षदं चैव ओंकाराय नमो नमः।।’’ अर्थात् ओंमकार बिन्दु पर ध्यान से, इस ध्वनि का उच्चारण करने से योगी परमेश्वर को प्राप्त करते हैं। यही ध्वनि है जो कामनाओं को पूर्ण करती है और मुक्ति प्रदान करती है, सम्पूर्ण दुखों को दूर करती है।

– Dharm Desk:Legend News

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