झूठ और झूठों के बल पर काबिज है ये दुनिया, कौन कहता है कि दुनिया में सच्‍चों का बोलबाला है

Occupies the world on force of lies
झूठ और झूठों के बल पर काबिज है ये दुनिया

झूठ ही लेना, झूठ ही देना, झूठ ही भोजन और झूठ चबैना। सोते-जागते झूठ, उठते-बैठते झूठ, चलते-फिरते झूठ…बस झूठ ही झूठ।
कौन कहता है कि दुनिया में सच्‍चों का बोलबाला है और झूठों का मुंह काला है। सच तो यह है कि ये दुनिया झूठों के बल पर चल रही है और झूठों का ही डंका बज रहा है।
कुछ समय पहले किसी अखबार के संपादकीय पृष्‍ठ पर मैंने एक कुटेशन लिखा देखा था। कुटेशन था- यदि दुनिया के सारे लोग सच बोलने लगें तो ये दुनिया एक पल नहीं चल सकती। कुटेशन में दम था।
बहुत थोड़ी देर के लिए ही सही, जरा इस कुटेशन पर ध्‍यान केंद्रित करके विचार कीजिए।
विचार कीजिए कि यदि विश्‍व के सर्वाधिक शक्‍तिशाली देश अमेरिका का राष्‍ट्रपति अपनी प्‍लानिंग का पूरा सच बता दे, दूसरे देशों को लेकर अपनाई जाने वाली अपनी दोमुंही नीति को उजागर कर दे तो क्‍या होगा। रूस यदि अमेरिका के बारे में अपनी घृणा का सच्‍चा इज़हार कर दे तो क्‍या होगा। पाकिस्‍तान अगर भारत के प्रति अपनी विषैली नीतियों का कुछ अंश भी सच्‍चाई के साथ सार्वजनिक कर दे तो क्‍या पाकिस्‍तान का अस्‍तित्‍व बचेगा।
नेता यदि यह बता दें कि वह सत्‍ता पाने के लिए और सत्‍ता पर काबिज रहने के लिए जनता को किन-किन हथकंडों से मूर्ख बनाते हैं, तो नेताओं का क्‍या होगा और नौकरशाह ये बता दें कि वह अपना पूरा वेतन हर माह तिजोरी में जमा करते हैं, खर्च करने को ऊपरी आमदनी का एक हिस्‍साभर काफी है तो नौकरशाह का क्‍या होगा।
पत्‍नी अगर पति के बारे में और पति अपनी पत्‍नी के बारे में मन के अंदर उठ रहे गुबारों का सच सामने ला दें तो क्‍या नहीं होगा और बॉयफ्रेंड अगर गर्लफ्रेंड के बारे में तथा गर्लफ्रेंड अपने बॉयफ्रेंड को लेकर सच का सामना करा दे तो क्‍या होगा।
कड़वा सच यही है कि देश हों या देशवासी, पति हो या पत्‍नी, नेता हो या अभिनेता और सत्‍ता पक्ष हो अथवा विपक्ष, सबका सहारा झूठ है। झूठ पर से पर्दा उठा नहीं कि भूचाल आ जाता है। जितना बड़ा सच, उतना बड़ा भूचाल। किसी सच से एक हिस्‍से की धरती डोल जाती है तो किसी सच से समूची पृथ्‍वी के ही हिल जाने का खतरा पैदा हो जाता है।
इन दिनों यूपी सहित देश के पांच राज्‍यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। पंजाब, गोवा और उत्तराखंड में मतदान हो चुका है जबकि उत्तर प्रदेश में दो चरणों का मतदान हुआ है। मणिपुर में मतदान होना अभी बाकी है। देश का सबसे बड़ा और राजनीतिक कारणों से सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण राज्‍य होने के कारण यूपी के चुनावों में सरगर्मी कुछ ज्‍यादा दिखाई दे रही है। एक ओर राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जुगलबंदी चल रही है तो दूसरी ओर मायावती एकला चलो की नीति अपना रही हैं। इनके अलावा भाजपा की मोदी एंड पार्टी आपनी ढपली, अपना राग की कहावत को चरितार्थ कर रही है। नेताओं के लिए झूठ बोलने को मंच सजे हैं और पब्‍लिक उसे सुनने के लिए दरी-चटाई लेकर बैठी है। न किसी को झूठ बोलने से ऐतराज है और न किसी को झूठ सुनने से। झूठ के इस शत-प्रतिशत सफल कारोबार में जनता के हाथ थमा दिया गया है लोकतंत्र का एक ऐसा झुनझुना जिसे बजाकर वह मन ही मन खुश हो लेती है कि चलो सरकार तो हम ही चुनते हैं।
पांच साल में एकबार जैसे ही वोट रूपी झुनझुना पब्‍लिक के हाथ आता है तो वह पगला सी जाती है। उसे लगता है जैसे सच में वही नेताओं की भाग्‍यविधाता है जबकि नेतागण जानते हैं कि वोट के अधिकार का झुनझुना पब्‍लिक को मूर्ख बनाए रखने का एक खूबसूरत उपकरण है। ऐसा उपकरण जिसका विकल्‍प कोई नहीं। चार उचक्‍के आपके सामने हैं और आपको इन्‍हीं में से किसी एक उचक्‍के को चुनना है। अब इसे नेताओं की मेहरबानी मान लें अथवा अपनी मजबूरी, वोट तो आपको देना है। न देकर भी क्‍या कर लोगे।
मानो या ना मानो किंतु यह सच है कि झूठ के कारोबार में सच दम तोड़ चुका है। तभी तो जनता के हाथ में न माया आती है और न राम। उसके हाथ में आता है मताधिकार जिस पर एकाधिकार है किसी न किसी राजनीतिक दल का। ऐसे दल का जिसका रोजी-रोजगार कदम-कदम पर झूठ बोलने का आदी है। मंच पर एक-दूसरे को गालियां देने वाले, उसके चाल-चरित्र पर कीचड़ उछालने वाले अंदरखाने ”चोर-चोर मौसेरे भाई”’ की कहावत को शत-प्रतिशत सार्थक करते प्रतीत होते हैं।
जनता का एक बड़ा वर्ग चोरों की इस जमात के पीछे अपनी जान तक देने को तैयार रहता है। हमारा नेता कैसा हो, …भैया जैसा हो। मदारी के हाथ में डुगडुगी है और जमूरे हैं उस डुगडुगी से बंधी गांठदार डोर। मदारी जब-जब डुगडुगी बजाएगा, तब-तब उसकी डोर इधर से उधर जाकर नाचेगी और जनता फिर उसकी थाप पर नाचेगी क्‍योंकि मदारी और जमूरे का रिश्‍ता ही कुछ ऐसा है।
नाम चुनाव है किंतु ”चुनाव” है कहां। चुनाव है भी तो सिर्फ नेताओं के लिए। वह अपने लिए हर चुनाव में जनता का चुनाव, चुनाव क्षेत्र बदलकर कर सकते हैं किंतु जनता उनके द्वारा खींची गई गोल रेखा से बाहर जाकर अपने नेता का चुनाव नहीं कर सकती। उसे चोर, मोर या ढोर में से ही किसी का चुनाव करना है। राजी-राजी, नहीं तो गैर राजी। कहते मताधिकार हैं लेकिन अधिकार कोई होता नहीं। मत तो पहले से ही नहीं होता। होता भी हो तो झूठ-मूठ का होता है। कहीं कमल के लिए तो कहीं हाथी के लिए, कहीं साइकिल के लिए तो कहीं हाथ के लिए। अगर इसके बाद भी कुछ बच गया तो हैंडपंप के लिए। मानसिक रूप से गुलाम है जनता जनार्दन। गुलामी उसकी रग-रग में शामिल है। गुलामी की इतनी गुलाम है इस देश की जनता कि उसके बिना उसकी पहचान मुश्‍किल है। संभवत: इसीलिए कहा जाता है कि अंग्रेज भले ही चले गए किंतु औलाद यहीं छोड़ गए। अंग्रेजों की वही जायज और नाजायज औलादें हमारे ऊपर शासन कर रही हैं। झूठ का चुनाव क्‍योंकि झूठों के बल पर ही काबिज है ये दुनिया। सच के सहारे एक पल चल पाना मुश्‍किल ही नहीं नामुमकिन है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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