इन दिनों फैशन में है “मॉब लिंचिंग”: राजनीति में भी कर रही है हाईट्रेंड, मोदी की लिंचिंग सबसे आसान

Nowadays "Mob Lynching" in fashion: High trends in politics too, Modi's Mob Lichting is the easiest
इन दिनों फैशन में है “मॉब लिंचिंग”: राजनीति में भी कर रही है हाईट्रेंड, मोदी की मॉब लिंचिंग सबसे आसान

इन दिनों “मॉब लिंचिंग” शब्‍द “फैशन” में है। हर जगह ट्रेंड कर रहा है “मॉब लिंचिंग”। राजनीति में, मीडिया में, पब्‍लिक में, और तो और पैनलिस्‍ट के बीच भी। दो-तीन दिन पहले टीवी डिबेट के दौरान एक महिला पैनलिस्‍ट अपने साथ बैठे पुरुष पैनलिस्‍ट को यह कहकर चुप कराने की कोशिश कर रही थी कि आप यहां भी “मॉब लिंचिंग” मत कीजिए। मुझे बोलने दीजिए।
इससे पहले बड़ी तेजी के साथ कथित बुद्धिजीवियों के बीच “असहिष्‍णुता” शब्‍द फैशन में आया था। जहां देखो और जिधर देखो असहिष्‍णुता के चर्चे थे। फिल्‍म जगत से लेकर साहित्‍य जगत तक और राजनीति से लेकर कूटनीति तक पर “असहिष्‍णुता” हावी थी। इतनी हावी थी कि कोई अपने बीबी-बच्‍चों को देश से बाहर भेजने की बात कर रहा था तो किसी को खुद ही यह देश रहने लायक नहीं लग रहा था।
कुछ साहित्‍यकार तो इस कदर फैशनेबल हो गए कि उन्‍होंने “असहिष्‍णुता” में डूबकर अपने-अपने अवार्ड वापस करने शुरू कर दिए। अवार्ड वापसी की बाकायदा मुहिम चलाई गई। ऐसा लगने लगा कि कुछ दिनों के अंदर भारत अपनी असहिष्‍णुता के चलते समूचे साहित्‍य जगत से हाथ धो बैठेगा।
बहरहाल, Intolerance का यह ‘अंग्रेजी दां’ फैशन चंद दिनों में पलायन कर गया क्‍योंकि देश को इतनी Intolerance हजम नहीं हुई।
शब्‍दों की फैशनेबल दुनिया में एक शब्‍द और है जो बहुत टिकाऊ तथा मजबूत होने के साथ-साथ सदाबहार भी है। ये शब्‍द स्‍वतंत्रता के बाद से लेकर अब तक राजनीतिक फ़िज़ा में तैर रहा है और भरपूर इस्‍तेमाल होता है किंतु आउटडेटेड कभी नहीं हुआ। इसे लोग ‘धर्मनिरपेक्षता’ कहते हैं। धर्म सापेक्ष देश का यह सर्वाधिक फैशनेबल शब्‍द है लिहाजा इसका इस्‍तेमाल सब करते चले आए हैं।
खैर…फिलहाल बात ताजा-तरीन फैशनेबल शब्‍द “मॉब लिंचिंग” की। मॉब लिंचिंग को विद्वान लोगों ने हिंदी में ‘शालीन’ नाम दिया है ‘भीड़तंत्र’। अर्थात भीड़ द्वारा किया गया फैसला।
कुछ लोग गांधी बाबा के अहिंसक देश में इसे भीड़ द्वारा की गई हिंसा से भी जोड़ते हैं लेकिन सच पूछें तो यह “मॉब लिंचिंग” की संपूर्ण व्‍याख्‍या नहीं है। भीड़ द्वारा की गई हिंसा को “मॉब लिंचिंग” का एक अंग मान सकते हैं परंतु सर्वांग नहीं।
दरअसल, मॉब लिंचिंग अहिंसक भी होती है। जैसे टीवी डिबेट में बैठी महिला पैनलिस्‍ट को लगा कि पुरुष पैनलिस्‍ट उसे बोलने का ‘पर्याप्‍त’ अवसर न देकर उसकी मॉब लिंचिंग कर रहे हैं।
इसी प्रकार राजनीतिक मॉब लिंचिंग इन दिनों अपने चरम पर है लेकिन उसे लेकर कोई असहिष्‍णु नहीं होता।
राजनीतिक मॉब लिंचिंग का सबसे बड़ा शिकार यदि कोई है तो वो हैं नरेन्‍द्र दामोदर दास मोदी। मोदी तो तब से राजनीतिक मॉब लिंचिंग सह रहे हैं जब यह शब्‍द फैशन में भी नहीं आया था।
याद कीजिए 2002 के गुजरात दंगे। हालांकि वो दंगे गोधरा कांड की उपज थे और उन्‍हें लेकर कार्यपालिका से लेकर न्‍यायपालिका तक की दौड़ लगभग पूरी हो चुकी है। कुछ लोगों को सजा हुई है और कुछ लोग बरी भी किए गए हैं परंतु नरेन्‍द्र मोदी की मॉब लिंचिंग जारी है। 2014 तक गुजरात के मुख्‍यमंत्री की कुर्सी पर काबिज रहे मोदी अब भले ही प्रधानमंत्री की कुर्सी तक जा पहुंचे हैं लेकिन मॉब लिंचिंग ने उनका पीछा नहीं छोड़ा।
उनकी मॉब लिंचिंग का जो सिलसिला 2002 के गुजरात दंगों से शुरू हुआ था, वह लगातार चलता आ रहा है। प्रधानमंत्री रहते नरेन्‍द्र मोदी के लिए जिस-जिस तरह के अपशब्‍दों का इस्‍तेमाल ‘विपक्ष की भीड़’ ने किया है और जिस तरह उन्‍हें खुलेआम धमकियां दी गईं हैं वह मॉब लिंचिंग का निकृष्‍ट उदाहरण है, परंतु समस्‍या क्‍या है कि फैशनेबल विपक्ष अपने द्वारा की जा रही इस लिंचिंग को मॉब लिचिंग के खांचे से बाहर रखता है। उसकी नजर में यह न्‍यायसंगत, तर्कसंगत और सर्वसम्‍मत मोदी हटाओ आंदोलन का हिस्सा है और ऐसा करने का उसे पूरा अधिकार है।
कुछ गुंडे सड़क पर किसी को घेरकर मार डालते हैं तो मोदी दोषी, कोई असहिष्‍णु है तो मोदी दोषी, कोई धर्मसापेक्ष है तो मोदी दोषी। और तो और गली-मोहल्‍ले में दो लोगों के बीच झगड़ा हो जाए तो भी मोदी दोषी।
आकाश से पाताल तक जो कुछ गलत हो रहा है, सबके लिए मोदी दोषी। राफेल डील के लिए भी दोषी और कथित गौरक्षकों के कारनामों के लिए भी मोदी दोषी। नवाज शरीफ से मिल लें तो दोषी और राहुल गांधी से न मिलें तो भी दोषी।
मोदी की मॉब लिंचिंग सबसे आसान काम और सबसे प्रिय शगल बना हुआ है इस समय। मोदी के अलावा शायद ही ऐसा कोई प्रधानमंत्री दूसरा होगा जिसकी कोई भी ऐरा-गैरा अकेले मॉब लिंचिंग कर डालता है। कहने का मतलब यह है कि मोदी की मॉब लिंचिंग के लिए ‘मॉब’ की भी जरूरत नहीं है। फिर भी कहते हैं कि देश में डर का माहौल है, देश में Intolerance बढ़ रहा है।
राष्‍ट्रीय चैनल पर बैठकर करोड़ों लोगों के सामने प्रधानमंत्री के पद पर बैठे हुए नरेन्‍द्र मोदी को मुंह भर-भरकर गरियाने वाले कहते हैं कि देश में डर का माहौल है और इसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी जिम्‍मेदार हैं। ये कैसा डर है भाई जिसमें कोई भी और कभी भी प्रधानमंत्री की लिंचिंग कर डालता है और फिर भी कहता है कि देश में डर का माहौल है।
नव समाजवाद के पुरोधा आजम खान हों या कांग्रेस के अघोषित प्रवक्‍ता तहसीन पूनावाला, कांग्रेस के माथे की मणि…मणिशंकर अय्यर हों या संजय जैसे ‘निरुपम’ कांग्रेसी, जिसे देखो वह प्रधानमंत्री को गरिया रहा है। बात-बात में गरिया रहा है। निठल्‍ला चिंतन करने में व्‍यस्‍त देशभर के वक्‍ता और प्रवक्‍ता सीधे प्रधानमंत्री से जवाब मांगते हैं।
रुपए का भाव गिरने और पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ने पर वो ‘नत्‍थू खैरे’ प्रधानमंत्री से जवाब मांगने को स्‍वतंत्र हैं जिनके अपने घर का अर्थशास्‍त्र बिगड़ा हुआ है।
पुलिस अगर उन शहरी वामपंथियों को पकड़ती है जिन्‍हें स्‍वयं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बता चुके हों, तो विपक्षी भीड़ को लगता है कि मोदी ने अघोषित आपातकाल लगा रखा है। ‘आपातकाल’ से देश को परिचित कराने वाले अघोषित आपातकाल की परिभाषा गढ़ रहे हैं। संवैधानिक संस्‍थाओं का चीरहरण करके कहा जाता है कि संवैधानिक संस्‍थाएं मोदी सरकार की बंधक हैं।
चार साल से ऊपर के राजग के शासनकाल में शायद ही कोई एक दिन ऐसा निकला हो जब प्रधानमंत्री मोदी की मॉब लिंचिंग न हुई हो, और लिंचिंग करने वालों ने यह न कहा हो कि मोदी देश के लिए खतरा हैं।
अब 2019 के चुनाव से पहले भी वह ऐलान कर रहे हैं कि हम मोदी सरकार को घेरने के लिए इकठ्ठे हो रहे हैं। पीएम कौन बनेगा और कौन उसके योग्‍य है यह बाद में तय कर लेंगे, पहले मोदी को घेरकर ठिकाने लगा दें। मॉब लिंचिंग का इससे बड़ा कोई उदाहरण होगा। विचार अवश्‍य कीजिए।
कुछ समझ में न आए तो नए सिरे से मॉब लिंचिंग का अर्थ तलाशिए। हो सकता है कि गूगल कुछ मदद कर दे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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