अब दवाओं के भगवाकरण का मुद्दा गरमाया, ‘लोगो’ पर विवाद

लखनऊ। यूपी में स्कूल, शौचालय, सचिवालय के बाद अब दवाओं के भगवाकरण का मुद्दा विपक्ष के हाथ लगा है। दरअसल, केंद्र सरकार की पहल पर मिलने वाली जेनरिक दवाओं का ‘लोगो’ अब विवाद का विषय बन गया है। लोगो में योजना का नाम ‘प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना’ इस तरह लिखा है कि इसका संक्षिप्त नाम ‘भाजप’ साफ नजर आ रहा है।
ये तीनों अक्षर भगवा रंग में हैं और बाकी नीले रंग से लिखे गए हैं। इस पर ‘प्रधानमंत्री’ शब्द इतने छोटे अक्षरों में है कि बहुत गौर करने पर ही दिखाई देता है। केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद 2015 में जेनरिक दवाओं के लिए संबंध में आदेश जारी किए गए थे। इसमें कहा गया था कि सभी मेडिकल स्टोर जेनरिक दवाएं रखेंगे। डॉक्टर भी कंपनी का नाम लिखने की जगह दवा का मूल नाम लिखेंगे। इससे मरीज को यह आजादी होगी कि वह किस कंपनी की दवा खरीदे।
1,000 जेनरिक स्टोर खोलने का दावा
सरकार ने सस्ती दर पर अलग से जेनरिक स्टोर खोलने के भी आदेश दिए। यूपी में प्रदेश सरकार ने भी 1000 स्टोर खोलने का दावा किया था। हर सरकारी अस्पताल और मेडिकल कॉलेजों के अलावा शहर में प्रमुख स्थानों पर भी जेनरिक स्टोर खोलने के आदेश दिए गए, लेकिन प्रदेश में अभी तक लगभग 150 स्टोर ही खुले हैं।
सरकार की इस पहल को तो सभी ने सराहा लेकिन तय संख्या में स्टोर न खुलने और जेनरिक दवाएं उपलब्ध होने की शिकायतें आती रहती हैं। इसी बीच योजना के नाम और उसे प्रचारित करने से विवाद खड़ा हो गया है। योजना का नाम सबसे पहले ‘प्रधानमंत्री जन औषधि योजना’ रखा गया। बाद में इसे ‘प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना’ नाम दिया गया।
बीजेपी पर विपक्ष का हमला
विपक्ष का आरोप है कि सरकार सस्ती दवा तो नहीं उपलब्ध करवा पा रही, लेकिन इसे बीजेपी के प्रचार का जरिया बना दिया है। गिने-चुने जेनरिक स्टोर खुल पाए हैं, लेकिन उन पर बड़े-बड़े होर्डिंग लगा दिए गए हैं। इन होर्डिंग और पोस्टरों के बीच जेनरिक स्टोर नजर ही नहीं आते। दूर से ही भगवा रंग में लिखा हुआ ‘भाजप’ नजर आता है।
इससे मरीजों को कोई फायदा नहीं मिल पा रहा। इस बारे में पीएमएस एसोसिशन के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अशोक यादव कहते हैं कि जेनरिक दवाएं अच्छी पहल है, लेकिन सरकार को इसे हर मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध करवाना चाहिए। वहीं, स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. पद्माकर सिंह का कहना है कि 100 जेनरिक स्टोर सरकारी अस्पतालों में खोले जा चुके हैं। इसके लिए और भी प्रयास किए जा रहे हैं। जहां तक योजना का नाम और लोगो का सवाल है, तो यह केंद्र सरकार की संस्थाएं तय करती हैं। इस बारे में वह कुछ नहीं कह सकते।
किसने, क्या कहा:
बीजेपी लाचारी में भी अपना वोट खोजती है। मरीज से ज्यादा मजबूर कोई नहीं हो सकता। उन्हें जेनरिक दवाएं तो ठीक से उपलब्ध नहीं हो रहीं, लेकिन प्रचार पूरा किया जा रहा है। अब तो यही कहा जाएगा कि बीजेपी दवाएं बेच रही है। अब अपना स्टिकर लगाकर चूरन-चटनी भी बेचेगी।
-शतरुद्र प्रकाश (एसपी एमएलसी )
बीजेपी की कोई योजना सफलता से नहीं चला पा रही। स्कूल, शौचालय से लेकर सचिवालय तक भगवा करने के बाद अब दवा भी भगवा कर दी गई है। इससे पता चलता है कि काम की बजाय दूसरे मुद्दों में उलझाना ही सरकार और पार्टी का मकसद है।
-दीपक सिंह ( कांग्रेस एमएलसी )
बीजेपी रंगों की राजनीति नहीं करती। ये तो विपक्ष है, जो हर काम में रंग खोजकर उसे मुद्दा बनाता है। जनऔषधि परियोजना का मकसद लोगों को सस्ती दवाएं उपलब्ध करवाना है। लोगों को दवाएं मिल भी रही हैं। विपक्ष को यही रास नहीं आता और हर योजना में भगवाकरण दिखता है।
-विजय बहादुर पाठक (बीजेपी प्रदेश महामंत्री)
-एजेंसियां

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