ब्लडग्रुप मैच न होने पर भी होगा किडनी प्रत्यारोपण: Dr. Sachdeva

गुर्दे यानी kidney हमारे शरीर के मास्टर कैमिस्ट और होमियोस्टेटिक अंग होते हैं जो कि शरीर के मध्य भाग में स्थित होते हैं और पूरे शरीर को नियंत्रित व संचालित करते हैं. Dr. Sachdeva ने बतायाा क‍ि अगर कहा जाए कि मानव शरीर में हृदय, यकृत और मस्तिष्क ही मुख्य कार्य करते हैं, तो यह भी सत्य है कि इनके संचालन व नियंत्रण की जिम्मेदारी kidney पर ही होती है.
नारायणा सुपर स्पेशेलिटी हॉस्पिटल , गुरूग्राम के नेफ्रोलॉजिस्ट डा.सुदीप सिंह सचदेव
नारायणा सुपर स्पेशेलिटी हॉस्पिटल , गुरूग्राम के नेफ्रोलॉजिस्ट डा.सुदीप सिंह सचदेव

नारायणा सुपर स्पेशेलिटी हॉस्पिटल , गुरूग्राम के नेफ्रोलॉजिस्ट डा.सुदीप सिंह सचदेव के अनुसार किडनी आकृति में सेम के दाने के बरारबर होती है जो कि रीढ़़ की हड्डी के दोनों तरफ कमर के मध्य में पसलियों के ठीक नीचे स्थित होती है.

प्रत्येक किडनी हृदय से प्रारंभ होने वाली मुख्य रक्त वाहिनी आर्टा से आने वाली धमनियों के जरिए प्रचुर मात्रा में रक्त की सप्लाई करती है. एक दिन में लगभग 180 लीटर खून की सफाई करते हैं और उसमें से 1.5 से 2 लीटर विषैले पदार्थ जैसे यूरिया, क्रिएटिनाइट व हानिकारक अम्ल को मूत्र के द्वारा शरीर से बाहर निकालते हैं.
रोग के मुख्य  भाग- एक्यूट रीनल फेल्योर
इसके मुख्य कारण हैं हैजा (पानी की कमी), संक्रमण, सैप्टिक आदि. रक्तचाप का अचानक से बढ़ जाना और हैमरेज या दुर्घटना आदि. इसमें समय से इलाज हो जाने से मरीज पहले की तरह स्वस्थ हो जाता है. यह सब मरीज की सामान्य अवस्था पर निर्भर करता है.
क्रोनिक रीनल फेल्योर
बचपन या जन्म से गुर्दे में संक्रमण, रक्तचाप, मधुमेह, किडनी या यूरेटर में स्टोन, यूरेनरी ट्रैक इंफैक्शन, कार्यक्षमता का कम होना, लंबे समय से किसी घातक बीमारी के इलाज में कई दवाओं का लगातार लेते रहने से भी सी आर एफ के लक्षण मिलते हैं.  गुर्दे से प्रोटीन ज्यादा मात्रा में निकलना.
प्रोटोन्यूरिया
इसमें पेशाब में निरंतर प्रोटीन निकलता रहता है. इस वजह से कमजोरी, खून की कमी व हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और गुर्दे खराब होने लगते हैं. एक्यूट रीनल फेल्योर में मरीज की सामान्य स्थिति और सही इलाज से काफी हद तक सामान्य की जा सकती है.अत:मरीज का गुर्दा फेल होने से बचाया जा सकता है.
क्या है इम्यूनोऐडसोप्र्शन प्रक्रिया
दरअसल इस प्रक्रिया के तहत मरीज के भर्ती करने के बाद सबसे पहले उसके शरीर में मौजूद सभी एंटीबाडीज को निकालने के लिए दवाइयां दी जाती हैं और इसका भी ध्यान रखा जाता है कि मरीज के शरीर में नई एंटीबाडीज का जन्म न हो. जैसे ही एंटीबाडीज का स्तर कम हो जाता है और वह सर्जरी करने के स्तर तक आ जाता है तो तुरंत दानकर्ता की किडनी से उसे प्रत्यारोपण कर दिया जाता है. एंटीबाडीज वे प्रोटीन तत्व होते हैं जिन्हें इम्युनोग्लोबुलिन के नाम से भी जाना जाता है. आमतौर पर शरीर के प्रतिरोधक प्रणाली के द्वारा इनका निर्माण किया जाता है जो कि बाहरी तत्वों से शरीर का बचाव करने में सक्षम होते हैं. ऐसे में, वे बाहरी तत्वों के साथ रिएक्ट करते हैं. ऐसे में ये एंटीबाडीज प्रत्यारोपित की जाने वाली किडनी को रिएक्ट कर सकते हैं. तो प्रत्यारोपण करते समय सबसे पहले इन एंटीबाडीज के स्तर पर कड़ी निगरानी रखी जाती है. सर्जरी के बाद मरीज पर चार सप्ताह तक मरीज का पूरा ध्यान रखा जाता है कि कहीं किडनी रिजेक्ट न हो जाए. हालांकि ऐसा कम ही होता है. इस नए आविष्कार से उन मरीजों को नया जीवन मिल सकता है जिन्हें रक्तसमूह मैच न होने के कारण किडनी प्रत्यारोपण कराने में दिक्कत आती थी.
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