अब चकल्‍लस इस बात पर कि मथुरा से BJP को कितनी सीटें, किसकी बनेगी सरकार और कौन बनेगा मुख्‍यमंत्री, क्‍या बोल रहा है सट्टा बाजार ?

Now Chakallas how many seats from BJP from Mathura
अब चकल्‍लस इस बात पर कि मथुरा से BJP को कितनी सीटें, किसकी बनेगी सरकार और कौन बनेगा मुख्‍यमंत्री, क्‍या बोल रहा है सट्टा बाजार ?

अब जबकि उत्तर प्रदेश के चुनाव में मतदान के 6 चरण पूरे हो चुके हैं और सातवें तथा अंतिम चरण का ही मतदान बाकी है, तो चकल्‍लस के साथ कयासों का दौर भी शुरू हो गया है। ठेल-ढकेल से लेकर दुकानों तक और शॉपिंग मॉल से लेकर डिपार्टमेंटल स्‍टोर तक पर हर व्‍यक्‍ति एक ही सवाल उछालता दिखाई देता है कि किसकी सरकार बन रही है?
दलगत राजनीति की बात करें तो तमाम लोगों के पास निजी गणित हैं और वो उस गणित के आधार पर अपने नेता की ही सरकार बनने का दावा कर रहे हैं, लेकिन इस सबसे सरोकार न रखने वाले आम मतदाता के लिए इन चुनावों में ऐसे किसी सवाल का उत्तर देना यक्ष प्रश्‍न से कम नहीं।
ज्‍यादातर लोगों का मानना है कि इस बार का चुनाव बहुत जटिल रहा है लिहाजा एक दल के लिए स्‍पष्‍ट बहुमत मिलना किसी चमत्‍कार से कम नहीं होगा, परंतु वह यह भी मानते हैं कि कोई एक दल बहुमत के काफी करीब होगा और सरकार उसी की बनेगी।
सामान्‍यत: पूर्ण बहुमत की सरकार बनना, किसी भी प्रदेश अथवा देश के लिए शुभ माना जाता है क्‍योंकि उससे विकास के रास्‍ते में बाधाएं उत्‍पन्‍न नहीं होतीं किंतु उत्तर प्रदेश की जनता का मिजाज बताता है कि अब उसे इस रटी-रटाई धारणा पर भी यकीन नहीं रहा।
उसके इस यकीन को ठेस लगने की भी ठोस वजहें हैं। ये वजहें, बेवजह नहीं हैं।
उत्तर प्रदेश की जनता ने लंबे समय बाद 2007 के विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी को स्‍पष्‍ट बहुमत दिया। बसपा सुप्रीमो मायावती ने पहली बार पूरे ठसक के साथ सरकार बनाई।
बहुजन की बजाय सर्वजन का आह्वान करके बनाई गई इस पूर्ण बहुमत की सरकार ने जनहित के कार्यों से कहीं अधिक ध्‍यान निजी हित पूरे करने पर लगाया। मुख्‍यमंत्री के रूप में मायावती ने अपने इर्द-गिर्द एक ऐसी मायावी दुनिया रच डाली जिसे भेदकर जाना, आम तो क्‍या खास लोगों तक के लिए संभव नहीं था। कहते हैं कि मायावती के शासनकाल में उनके मंत्रीगण तक उनसे एक अदद मुलाकात के लिए तरसते रहते थे, फिर विधायक व सांसदों की तो औकात ही क्‍या थी। कुछ विशिष्‍ट मंत्री ही थे जिन्‍हें मायावती की मायावी दुनिया में प्रवेश करने का अधिकार प्राप्‍त था और वही उनके आदेश-निर्देशों का प्रसार करते थे।
मायावती की रुचि संभवत: रूबरू होने से कहीं अधिक हर जगह मौजूदगी का अहसास कराने में थी, ताकि एक अदृश्‍य भय पूरे अमले पर व्‍याप्‍त रहे।
अपने शासनकाल में मायावती द्वारा जगह-जगह अपने बुतों तथा अपनी पार्टी के प्रतीक चिन्‍हों सहित गॉड फादर स्‍व. कांशीराम की आदमकद मूर्तियां स्‍थापित करने पर पानी की तरह बहाया गया पैसा इस बात की पुष्‍टि करता है।
आज भले ही मायावती अपनी जनसभाओं में यह कहती सुनाई दीं कि अब वह पत्‍थरों पर पैसा खर्च नहीं करेंगी लेकिन यह कोई अपराध बोध नहीं था। यह उनकी घाघ राजनीति का एक नमूना था जिससे जनता को भ्रमित किया जा सके।
मायावती जानती हैं कि उनका पत्‍थरों पर खर्च किया गया बेहिसाब पैसा जाया नहीं गया। वह आज भी काम कर रहा है, और कल भी करेगा। उनके जीते जी वह विरोधियों को राजनीतिक दृष्‍टि से भयभीत करने का काम करता रहेगा और मरने के बाद समर्थकों के लिए पूजा करने के काम आएगा।
दरअसल, मायवती चाहती हैं कि आने वाली पीढ़ी उन्‍हें दलितों के एक ऐसे मसीहा के रूप में स्‍थान दे जिसकी पूजा की जा सके। जो बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर से ऊपर भले ही न हो किंतु उनके समकक्ष जरूर हो। वह मान्‍यवर स्‍वर्गीय कांशीराम की तरह का राजनीतिक जीवन तो कतई नहीं चाहतीं।
बहरहाल, मायावती अपनी मंशा पूरी करने के लिए कम से कम एकबार और उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होना चाहती हैं और इसलिए इस बार उन्‍होंने दलित व मुस्‍लिम कार्ड खेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ठीक उसी तरह, जिस तरह कभी ब्राह्मण-दलित कार्ड खेलकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी।
यह बात अलग है कि इस बार हवा का रुख कुछ और ही इशारा कर रहा है, और उस इशारे को मायावती बखूबी समझ भी रही हैं।
वह अच्‍छी तरह समझ रही हैं कि एक दशक में राजनीति ने जो करवट ली है, उसमें उनके खेले गए कार्ड का चल पाना आसान नहीं रहा। मुस्‍लिम तो क्‍या, दलित भी अब उन पर आंखें मूंदकर भरोसा करने को तैयार दिखाई नहीं दिए।
भरोसा करे तो कोई करे भी कैसे, पूर्ण बहुमत की सरकार ने भी नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत चरितार्थ करने से अधिक कुछ नहीं किया।
मायावती को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का मौका देने के बाद उत्तर प्रदेश के प्रबुद्ध मतदाताओं ने अखिलेश पर भरोसा किया। समाजवादियों की पिछली सारी खामियों को नजरंदाज करते हुए जनता ने उसके सुकुमार अखिलेश के लिए 2012 के चुनावों में स्‍पष्‍ट बहुमत की सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्‍त कर दिया।
अखिलेश की पूर्ण बहुमत वाली सरकार भी जन अपेक्षाओं को पूरा करने की बजाय भाई-भतीजावाद में उलझ कर रह गई। न तो वह समाजवादी सरकार में गुण्‍डों के बोलबाले की धारणा को तोड़ सकी और न ही कानून का राज स्‍थापित कराने में सफल रही।
अखिलेश सरकार का कार्यकाल पूरा होते-होते जिस तरह समाजवादियों के जूतों में दाल बंटती नजर आई, उसने समाजवाद की परिभाषा ही बदल कर रख दी। समाजवाद अब भाई-भतीजावाद के रास्‍ते परिवारवाद बनकर रह गया और इस वाद के वादी तथा प्रतिवादी सड़क पर उतर कर आरोप-प्रत्‍यारोप खेलने लगे।
समाजवादियों के इस खेल ने उनका अपना खेल कितना बिगाड़ा और कितना बनाया, यह तो इन चुनावों के नतीजों से पता चलेगा लेकिन इतना जरूर हुआ कि अखिलेश को कांग्रेस की डूबती नाव पर साइकिल लेकर सवार होना पड़ा।
स्‍वतंत्र भारत के बाद की राजनीति से लेकर अब 21 वीं सदी की राजनीति तक में यह पहला अवसर है जब किसी पुत्र ने पिता की विरासत को हथियाकर उसे दूध में से मक्‍खी की तरह निकाल बाहर किया हो। यह पहला अवसर है जब लोग मुगलों के उस इतिहास को दोहराने पर मजबूर हो गए हों, जिसे उन्‍होंने इतिहास की किताबों में पढ़कर विस्‍मृत कर दिया था।
चुनावों में खुद को विकास पुरुष साबित करने पर आमादा अखिलेश यादव ने बेशक समाजवादी कुनबे के कलह का पटाक्षेप करने की भरपूर कोशिश की किंतु उनकी कोशिश कामयाब हो नहीं सकी।
कभी मुलायम ने अखिलेश को बतौर मुख्‍यमंत्री मुस्‍लिम विरोधी बताकर उनकी कोशिशों पर पानी फेर दिया तो कभी उनके चचा शिवपाल यादव ने चुनावों बाद अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान करके जता दिया कि अखिलेश का कहा गया हर वाक्‍य अंतिम सत्‍य नहीं है।
इस बीच समाजवादी कुनबे की कलह को मुलायम के अमर प्रेम ने स्‍क्रिप्टेड साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और उसकी खातिर अपने राजनीतिक भविष्‍य को भी दांव पर लगा दिया लेकिन जनता के बीच जो संदेश चला गया, उसकी भरपाई होती दिखाई नहीं दी।
अब तो कथित विकास पुरूष अखिलेश के आगरा-लखनऊ एक्‍सप्रेस-वे तथा लखनऊ मेट्रो जैसे आधे-अधूरे कार्यों सहित डायल 100 पर भी भारी घोटाले का साया पड़ता दिखाई देने लगा है।
कुल मिलाकर अखिलेश सरकार का कार्यकाल पूरा होते-होते आम जनता फिर से यह सोचने पर बाध्‍य हो गई कि उसने पहले मायावती को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का मौका देकर और उसके बाद समाजवादी पार्टी को स्‍पष्‍ट बहुमत देकर आखिर ऐसा क्‍या हासिल कर लिया जिसका उल्‍लेख किया जा सके।
यही कारण है कि इन चुनावों में जनता जनार्दन ने न स्‍पष्‍ट मत जाहिर किया और न स्‍पष्‍ट बहुमत का दावा करने लायक स्‍थिति छोड़ी। हालांकि सभी दल अपने स्‍पष्‍ट बहुमत का दावा कर रहे हैं किंतु उनके दावे का खोखलापन उनकी फीकी हंसी और अंतिम चरण के मतदान हेतु लगाए गए एड़ी से चोटी तक के जोर से जाहिर हो चुका है।
सरकार स्‍पष्‍ट बहुमत वाली बनेगी अथवा अस्‍पष्‍ट बहुमत वाली, यह भले ही 11 मार्च के बाद पता लगेगा लेकिन इस बीच कयास लगाने का सुख कोई कैसे छोड़ सकता है। कयास हमेशा लगाए जाते रहे हैं इसलिए इस मर्तबा भी लगाए जा रहे हैं। मथुरा से मुज़फ्फरनगर तक और काशी से लखनऊ व फैजाबाद तक लोग कयास लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। सट्टा बाजार भी सांस रोक कर भाव तय कर रहा है ताकि कोई बड़ा खामियाजा न भुगतना पड़े।
एक ओर सरकार किसकी बनेगी, इस पर खाई लगाई हो रही है तो दूसरी ओर प्रतिष्‍ठित सीटों पर लड़ने वाले प्रत्‍याशियों की हार-जीत पर। एक ओर किसको कितनी सीटें मिलने पर दांव लगाया जा रहा है तो दूसरी ओर कौन बनेगा मुख्‍यमंत्री के लिए भी भाव ऊपर-नीचे हो रहे हैं।
चूंकि उत्तर प्रदेश में मथुरा की अपनी एक अलग पहचान है और यहां से निकलने वाले नतीजे दूर तक जाते हैं इसलिए मथुरा का सट्टा बाजार काफी गर्म बना हुआ है। सटोरियों की मानें तो इस विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक जनपद में भाजपा को तीन सीटों पर बढ़त मिल सकती है जबकि दो सीटों पर राष्‍ट्रीय लोकदल फाइट में है। समाजवादी पार्टी न कभी यहां मुख्‍य मुकाबले में रही है और न इस बार है। कांग्रेस यदि अपनी यथास्‍थिति बरकरार रख ले तो निश्‍चित ही यह एक बड़ी उपलब्‍धि होगी। बसपा एक सीट पर मुख्‍य मुकाबले में तो दूसरी पर फाइट में बताई जा रही है।
भाजपा के लिए मथुरा प्रतिष्‍ठा का प्रश्‍न है तो रालोद के लिए खोई हुई जमीन हासिल करने का सबब। बसपा को जो मिल जाएगा, वही उसकी उपलब्‍धि होगा।
सट्टा बाजार इन्‍हीं सब स्‍थिति-परिस्‍थितियों के मद्देजनर फूंक-फूंक कर चल रहा है लिहाजा भाव तो तय हैं लेकिन लगाने व खाने वालों का अकाल है।
सटोरियों के जेहन में पिछले नतीजों का वो खौफ बाकी है जो शहरी सीट पर मात्र 500 मतों के अंतर से हुई हारजीत के कारण पैदा हुआ था और मात्र 1500 मतों के अंतर से सपा एक नई इबारत लिखते-लिखते रह गई थी।
श्‍यामसुंदर शर्मा जैसा राजनीति का चाणक्‍य अपनी सीट गंवा बैठा था और मायावती सरकार के कद्दावर मंत्री चौधरी लक्ष्‍मीनारायण हार कर घर बैठ गए थे।
2017 में राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह बता पाना हालांकि आसान नहीं है और किसकी बनेगी सरकार व कौन होगा यूपी का मुख्‍यमंत्री जैसे सवाल यक्ष प्रश्‍न बने हुए हैं किंतु कयासबाजी व सट्टेबाजी फिर भी जारी है।
कल अंतिम चरण की 40 सीटों के लिए मतदान के बाद इस कयासबाजी और सट्टेबाजी में और तेजी आएगी। देखना यह है कि आखिर किसके सिर सेहरा बंधता है और जिसके सिर सेहरा बंधता है वो इस जनधारणा पर कितना खरा उतरता है कि प्रदेश की बदहाली दूर करने के लिए स्‍पष्‍ट बहुमत की सरकारों से कहीं ज्‍यादा जरूरी है स्‍पष्‍ट सोच वाली सरकार। स्‍पष्‍ट नीति वाली सरकार, फिर वो किसी एक पार्टी की हो अथवा दो और तीन पार्टियों की।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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