No doubt चौकीदार चोर है, पर…

‘चोर’ के यहां भी ‘चोरी’ हो जाए तो वह सबसे पहले ‘चौकीदार’ की ओर इशारा करता है, यह एक सार्वभौमिक सत्‍य है क्‍योंकि ‘चौकीदार’ पर ‘चोरी’ का ‘इल्‍जाम’ लगाने के अनेक लाभ हैं। सबसे बड़ा लाभ तो यही है कि लोगों के साथ-साथ पुलिस का भी ध्‍यान भटक जाता है।
बहरहाल, बात करें देश के चौकीदार की तो No doubt चौकीदार चोर है।
अरे, जिसने 08 नवंबर 2016 की देर शाम अचानक टीवी पर प्रकट होकर कह दिया कि आज रात 12 बजे से वर्तमान में जारी 1000 और 500 के नोट मात्र एक कागज के टुकड़े बनकर रह जाएंगे, वो चोर नहीं तो और क्‍या है। ये बात अलग है कि उसने वो चोरी इतने कलात्‍मक अंदाज में की कि ‘पेशेवर चोर’ भी हक्‍के-बक्‍के रह गए।
चोर ही क्‍यों, लुटेरे और डकैत तक समझ नहीं पाए कि जिन तिजोरियों को सुबह-शाम धूप-दीप दिखाकर पूजा करते थे और उसमें रखी हजार-पांच सौ की गड्डियों को साक्षात लक्ष्‍मी मानते थे, वो अचानक एक अदद ‘चौकीदार’ के कहने से रद्दी का ढेर कैसे बन सकती हैं।
अब तक किस्‍से-कहानियों में सुना था कि लक्ष्‍मी और सरस्‍वती का बैर होता है, लेकिन यह नहीं सुना था कि सरस्‍वती से प्राप्‍त बुद्धि के बल पर लक्ष्‍मी को रातों-रात किसी ने इतना दीन-हीन बना डाला हो।
चौकीदार न किसी के घर में घुसा, न किसी के यहां छापामारी कराई, न तिजोरियों में भरे नोटों की ओर ताक-झांक की…लेकिन तिजोरी खाली कर दी।
सुना है राजा-महाराजाओं के किसी जमाने में ‘चोरी’ को एक किस्‍म की ‘कला’ का दर्जा हासिल था और चोरों के मुखिया को बाकायदा ‘चौर सम्राट’ कहकर संबोधित किया जाता था।
इस ‘चौकीदार चोर’ ने बिना हाथ लगाए जिस तरह चोरों के बड़े-बड़े गिरोहों को सड़क पर ला खड़ा किया, उसने साबित कर दिया कि चोरी कोई मामूली हुनर नहीं, वाकई एक बड़ी आर्ट है।
परिवार को ही पार्टी समझकर वर्षों से कुनबेभर की तिजोरियां भरने में लगे लोग समझ ही नहीं पाए कि जिससे चौकीदारी कराने के लिए पूर्व की भांति कुछ दिनों के लिए कुर्सी की अदला-बदली की थी, उसकी इतनी हिमाकत कैसे हो गई कि समूचे खजाने में सेंध लगा दी। आंखों से काजल निकाल ले गया और किसी को पता तक नहीं लगा।
माना कि इस दौरान गेहूं के साथ कुछ घुन भी पिस गए, और शायद इसीलिए बुजुर्ग बहुत पहले ही यह कह भी गए थे कि गेहूं के साथ घुनों का पिसना लाजिमी है।
कहावतें बनती ही इसलिए हैं ताकि सनद रहें और वक्‍त जरूरत अपनी सार्थकता सिद्ध करने के काम आएं।
तिजोरियों में रखी करेंसी के रद्दी हो जाने का गम भूल भी जाते यदि चौकीदार वहीं थम जाता। चौकीदार ने तो हद कर दी। वह रुकने का नाम नहीं ले रहा। बिना लगाम के घोड़े की तरह व्‍यवहार कर रहा है। पुराने पापों का हिसाब मांग रहा है।
घूम-घूम कर कह रहा है कि गांधी बाबा के सपनों का भारत बनाकर रहूंगा। देश को अलीबाबा और उसके 40 (बचे-खुचे) चोरों से मुक्‍ति दिलाऊंगा। न खाऊंगा न खाने दूंगा।
गांठिया-पापड़ खाकर गुजारा करने और खिचड़ी को ही छप्‍पनभोग मानने वाला चौकीदार, चोर-लुटेरों की भूख को चुनौती दे रहा है। बड़ी समस्‍या यह और है कि डरता भी नहीं है।
संविधान के खतरे में पड़ने की दुहाई दे ली, असहिष्‍णुता का जहर फैला लिया, सेना पर अटैक कर लिया, ईवीएम और चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट के माननीयों तक को निशाना बना लिया। यहां तक कि ‘सर्जीकल स्‍ट्राइक’ को ‘फर्जीकल स्‍ट्राइक’ बता डाला लेकिन झुकने का नाम नहीं लेता।
राफेल जैसे अत्‍याधुनिक फाइटर प्‍लेन को उड़ाते-उड़ाते हाथ थक गए, उसमें भ्रष्‍टाचार का ढोल पीटते-पीटते मुंह सूख गया किंतु चौकीदार है कि मानता ही नहीं।
संसद में सैकड़ों सांसदों के सामने जादू की झप्‍पी दे दी, उससे भी बात नहीं बनी तो पांच मिनट आंख में आंख डालकर जवाब देने का चैलेंज दे दिया लेकिन चौकीदार कहता है कि गांधी जी का असली चेला हूं। न बुरा देखूंगा, न बुरा सुनूंगा।
किसी ने पूछा इसका क्‍या मतलब हुआ, तो कहने लगा- जाने दीजिए जी…मुंह भी नहीं खोलूंगा अन्‍यथा अनर्थ हो जाएगा।
सिर्फ इतना पूछूंगा कि ”झपकती आंख” की आंख में आंख डाली जा सकती है क्‍या। जो आंख संसद से लेकर सड़क तक मौके-बेमौके झपकती और फड़कती हो, उससे कोई आंख मिला भी कैसे सकता है। आंख मिलाना तो दूर, उससे तो कोई आंख लड़ा भी नहीं सकता।
समाजिक मान्‍यता है आंख मारने और उसका बेमकसद व बेमतलब इस्‍तेमाल करने वाले छिछोरे होते हैं।
आंख मारने का सही वक्‍त पर और सही जगह इस्‍तेमाल किया होता तो साढ़े चार साल में एक राष्‍ट्रीय पार्टी के कम से कम चार अंतर्राष्‍ट्रीय नेता देश के अंदर खेल रहे होते, साथ ही भविष्‍य के अध्‍यक्षों की चिंता भी नहीं रहती। राग दरबारी गाने वालों की न अब कमी है और न तब होती।
किसी से किसी की शक्‍ल और गुण मिलाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। चौकीदार के भय ने भविष्‍य के भय का एक भूत और लाकर सिर पर खड़ा करा दिया।
भय के भूत अपने हों या पराए, वो दिमाग पर अटैक तो करते हैं। यह मानना पड़ेगा। दिमाग के चलायमान होने का इससे बड़ा सबूत दूसरा क्‍या होगा है कि चोर बता रहे हैं चौकीदार की नींद उड़ गई है।
किस गधे ने दी थी चौकीदार के गुण-धर्म की जानकारी।
भइया, वो चौकीदार ही क्‍या जिसे नींद आ जाए। चौकीदार का तो काम ही है जागते रहना और जगाते रहना। तभी तो चौकीदार दिन-रात चीख रहा है जागते रहो…। चोरों का बाजार गर्म है। वह न खुद सो रहा है और न जनता को सोने दे रहा है। उसे मालूम है कि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी।
चौकीदार की सख्‍त पहरेदारी का ही परिणाम है कि चोरों की नींद हराम है। वह दिन-रात जागकर, झुंड में एकत्र होकर नजरें गड़ाए हुए हैं कि ये चौकीदार सोता क्‍यों नहीं। आखिर कब सोएगा यह चौकीदार। न सोए तो कम से कम झपकी ही ले ले।
वैसे भी जिसकी खुद की नींद हराम होगी, वही तो बता सकेगा कि कौन क्‍या कर रहा है। देखा जाए तो चोरों ने यह बताकर कि चौकीदार की नींद हराम है, यह साबित कर दिया कि जो भी हो लेकिन इतना जरूर है कि चौकीदार सो नहीं रहा। चौकीदार ने अपनी नींद हराम करके चोरों की नींद उड़ा दी है। बिना ऐसा किए हुए चोरों की नींद उड़ाई भी नहीं जा सकती।
इसीलिए कहता हूं कि No doubt चौकीदार चोर है। उसने पहले तिजोरियों के अंदर पड़े हजार-पांच सौ के बंडल चुराए, फिर चैन चुराया, चैन चोरी हुआ तो दिमाग पर ग्रहण लगा, और अब दिल की बारी है। कार्डियक अरेस्ट का नाम तो सुना ही होगा। पता नहीं, कब किसको गिरफ्त में ले ले। चौकीदार झपकती आंख का काजल चोरी कर ले जाए और रोने को आंसू भी न छोड़े तो दिल को चोट लगना स्‍वाभाविक है। जिसका सबकुछ छिन जाए और रह जाए सिर्फ झपकने को एक आंख, उसका दुख वही जानता है लेकिन चौकीदार कह रहा है- अभी तो 2019 की कहानी बाकी है मेरे दोस्‍त।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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