निर्भया केस: एमनेस्टी इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए

नई दिल्‍ली। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी ने निर्भया गैंगरेप और हत्या के दोषियों को फांसी की सजा का विरोध किया है। एमनेस्टी इंडिया का कहना है कि मृत्युदंड से महिलाओं के खिलाफ हिंसा खत्म नहीं होती है।
देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया गैंगरेप-हत्याकांड के दोषियों की फांसी की सजा बरकरार रखी है। 4 में से 3 दोषियों द्वारा दायर की गई समीक्षा याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने ये कहकर खारिज कर दिया कि इसका कोई आधार नहीं है लेकिन दूसरी तरफ अंतर्राष्ट्रीय एमनेस्टी मानवाधिकार संस्था ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए हैं। एमनेस्टी इंडिया ने कहा, ‘दुर्भाग्यवश फांसी से महिलाओं के खिलाफ हिंसा खत्म नहीं होती है। यह दिखाने के लिए कोई सबूत नहीं है कि मृत्युदंड यौन हिंसा या किसी अन्य अपराध के लिए निवारक के रूप में काम करता है।’ संस्था ने कहा, ‘निर्भया मामले में दोषियों को मौत की सजा बनाए रखने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला भारत में मृत्युदंड के निरंतर उपयोग की दिशा में एक दुर्भाग्यपूर्ण कदम है।’
मानवाधिकार संगठन द्वारा कहा गया, ‘सरकार को कानूनों के कार्यान्वयन, सजा की दर में सुधार और न्याय सुनिश्चित करने के लिए संसाधन आवंटित करना होगा। जस्टिस वर्मा कमेटी ने बलात्कार के मामलों में मौत की सजा का विरोध किया था। उनकी सिफारिशें यौन उत्पीड़न और बलात्कार पर सुधार कानूनों पर निर्भर थीं।’
2017 में भारत दुनिया के केवल तीन देशों में से एक था, जिसने नए कानूनों को अपनाकर मृत्युदंड का दायरा बढ़ाया था। अप्रैल 2018 में केंद्र सरकार ने 12 साल या उससे कम उम्र के लड़कियों से बलात्कार करने वाले दोषी को मौत की सजा देने के लिए एक अध्यादेश को मंजूरी दी। राजधानी दिल्ली में 16 दिसंबर, 2012 को हुए इस अपराध के लिए निचली अदालत ने 12 सितंबर, 2013 को चार दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी। इस अपराध में एक आरोपी राम सिंह ने जेल में ही आत्महत्या कर ली थी जबकि छठा आरोपी एक किशोर था, जो कि बाद में रिहा हो गया। दिल्ली हाई कोर्ट ने 13 मार्च, 2014 को दोषियों को मृत्यु दण्ड देने के निचली अदालत के फैसले की पुष्टि कर दी थी। इसके बाद, दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थीं जिन पर न्यायालय ने 5 मई, 2017 को फैसला सुनाया था।
दोषियों के वकील का दावा: पब्लिक, पॉलिटिक्स और मीडिया के दबाव में लिया गया फैसला
सुप्रीम कोर्ट द्वारा 16 दिसंबर 2012 को निर्भया गैंगरेप और हत्या मामले में फांसी की सजा से बचने के लिए चार में से तीन दोषियों की दायर पुनर्विचार अर्जी सोमवार को खारिज होने के बाद दोषियों के वकील ने दावा किया कि फैसला पब्लिक, पॉलिटिक्स और मीडिया के दबाव में लिया गया। वकील ए पी सिंह ने कहा कि यह फैसला पब्लिक, पॉलिटिक्स और मीडिया के दबाव लिया गया। मैं इस फैसले से पूर्णतः असहमत हूं क्योंकि उन लोगों के साथ न्याय नहीं किया गया। सिंह ने आगे कहा कि चौथा दोषी अक्षय कुमार जल्द समीक्षा याचिका दायर करेगा। उन्होंने कहा, अक्षय कुमार ने अभी तक समीक्षा याचिका दायर नहीं की है। हम यह जल्द दायर करेंगे। वह आज फैमिली प्रॉब्लम की वजह से कोर्ट में उपस्थित नहीं हो सका। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति आर भानुमति और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने दोषी मुकेश, पवन गुप्ता और विनय कुमार की अर्जी खारिज करते हुए कहा कि 5 मई 2017 के फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए कोई आधार नहीं है।कोर्ट ने कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई के दौरान तीनों दोषियों का पक्ष विस्तार से सुना गया था और अब मौत की सजा बरकरार रखने के शीर्ष कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार के लिए कोई मामला नहीं बनता है। देश की राजधानी दिल्ली में 16 दिसंबर , 2012 को हुए इस दिल दहलादेने वाली जघन्य अपराध के लिए निचली अदालत ने 12 सितंबर, 2013 को 4 दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी। इस क्राइण में एक आरोपी राम सिंह ने जेल में खुदकुशी कर ली थी जबकि छठा आरोपी एक नाबालिग था।दिल्ली हाई कोर्ट ने 13 मार्च 2014 को दोषियों को फांसी देने के निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया था। इसके बाद , दोषियों ने देश की सबसे बड़ी अदालत में अपील की थी जिन पर कोर्ट ने 5 मई 2017 को फैसला सुनाया था।
-एजेंसी

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