Newborn की भोजन-श्वांस नली अलग कर बचाई जिंदगी

-Newborn के चार मिमी व्यास की ग्रास नली में टांके लगाकर चिकित्सक श्याम बिहारी शर्मा ने दिया अविश्वनीय कार्य को अंजाम
-नवजात को पिलाए गए दूध की पहली बूंद के फेफडे में पहुंचते ही बन आई थी बच्चे की जान पर
– केडी हास्पीटल के सर्जन डा. श्याम बिहारी शर्मा को नवजातों की सर्जरी में भी हासिल है महारत

मथुरा। एनएच-टू के अकबरपुर स्थित केडी हास्पीटल में एक Newborn बच्चे की चार मिमी व्यास की ग्रासनली को स्वांस नली से अलग कर एवं काटी गई ग्रास नली को आपस में जोडकर चिकित्सकों ने अविश्वसनीय कार्य को अंजाम दिया है। इससे बच्चे को अब दूध निगलकर पचा पाना संभव हो पा रहा है। वह स्वस्थ है। इससे पूर्व पैदा होते ही पिलाए गए दूध की पहली बूंद ही बच्चे के फेफडे में पहुंचतेे ही बच्चे की जान पर बन आई थी। डा. श्याम बिहारी शर्मा ने ‘वैरी मोस्ट क्रिटीकल‘ आॅपरेशन को केडी हास्पीटल में अंजाम दिया है।

आगरा के शमशाबाद निवासी भूरी सिंह के घर बच्चे का जन्म खुशियां लेकर आया, लेकिन ये खुशियां ज्यादा देर तक कायम नहीं रह सकीं, क्योकि नवजात शिशु दूध नहीं पी पा रहा था। बच्चा के दूध पीते ही खांसी आने लगी और शरीर नीला पड गया। उसे अलीगढ और आगरा के चिकित्सकों को दिखाया। उन्होंने नवजात को जटिल बीमारी बताई। केडी हास्पीटल आने पर डा. हरीश अग्रवाल ने बच्चा और उसका एक्सरे देखकर ईसोफीजियल फिस्टुला नाम की इस बीमारी को पहचाना। केडी हास्पीटल के शिशु शल्य चिकित्सक डा. श्याम बिहारी शर्मा ने जांच में पाया कि एक दिन के बच्चे की ग्रासनली एक जगह पर स्वांस नली से जुडी हुई थी। उन्हें इसे श्वांसनली से काटकर आपस में जोडा जाना बच्चे के जीवन के लिए महती जरुरी लगा। आॅपरेशन के दौरान आहारनाल को श्वांस नली से काटकर बाल बराबर मोटे धागे से बहुत पतली सुई से टांके लगाए गए। इससे अब नवजात आसानी से दूध निगलकर पचा पा रहा है। आॅपरेशन के दौरान डा. इरफान, नर्सिंग स्टाफ योगेश, सिस्टर गंुजन ने सहयोग दिया। आॅपरेशन के बाद बच्चे की देखरेख डा. हरीश अग्रवाल एवं सिस्टर ईशा द्वारा सघन चिकित्सा ईकाई में हुई।

दूध निगलने में मुश्किल हो तो चिकित्सक को दिखाएं-डा. एसबी शर्मा

केडी हास्पीटल के सर्जन डा. श्याम बिहारी शर्मा ने बताया कि यदि नवजात बच्चे के पैदा होने के बाद दूध पिलाने पर उसे जबदस्त खांसी आये और शरीर नीला पड जाए तो हो सकता है कि उसकी आहारनाल की ग्रासनली श्वांसनली से कहीं न कहीं जुडी हो। ऐसे बच्चे के जीवित रहने के न के बराबर चांस होते हंै। क्योंकि भोजन यानि कि दूध जब फेफडों में जाएगा तो बच्चे का न तो श्वसन तंत्र ठीक से काम कर पाएगा और न ही आहार तंत्र। ऐसे मामलों को तुंरत ही केडी हास्पीटल में दिखाएं।

शिशु मृत्यु दर रोकने में सहायक बने माता-पिता: डा. राम किशोर अग्रवाल

आरके ग्रुप के चैयरमेन डा. राम किशोर अग्रवाल और एमडी मनोज अग्रवाल ने कहा कि विदेशों में चिकित्सा विज्ञान ने काफी तरक्की की है। हमारे देश में नवजात शिशु मृत्यु दर को चिकित्सा विज्ञान के विकास की जानकारी रखने वाले जागरुक माता-पिता भी रोकने में काफी मददगार हो सकते हैं।

ब्रजवासियों को केडी हास्पीटल में प्रसव की समस्त सुविधाओं का लाभ उठाते हुए अपने जच्चा और बच्चा की पूर्ण सुरक्षा योग्य चिकित्सकों के हाथों में सौंपनी चाहिए। इससे वे हास्पीटल से जच्चा के साथ सुरक्षित रुप से Newborn को भी घर ले जा सकें।