‘आप’ पर व्‍यंग्य करतीं कुमार विश्‍वास की नई कविताएं

ओजस्वी कवि कुमार विश्वास की कुछ नई रचनाएं एक ओर जहां आम आदमी पार्टी द्वारा उनके साथ किए गए व्‍यवहार को रेखांकित करती हैं वहीं आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल पर करारा व्‍यंग्‍य भी कसती हैं। इनमें से कुछ कविताएं इस प्रकार हैं-

कि मुझे मारकर वह खुश है कि सारा राज उस पर है
यकीनन कल है मेरा आज बेशक उसका आज है
उसे जिद थी कि झुकाओ सर तभी दस्तार बख्शूंगा
मैं अपना सर बचा लाया महल और ताज उस पर है

अब मत बोलो…
पुरानी दोस्ती को इस नई ताकत से मत तौलो
ये संबंधों की तुरपाई है षड्यंत्रों से मत खोलो
मेरे लहजे की छेनी से गढ़े कुछ देवता जो कल
मेरे लफ्जे में मरते थे वो कहते है कि अब मत बोलो

पैगाम करता हूं…
मैं अपने गीतों और गजलों से उसे पैगाम करता हूं
उसकी की दी हुई दौलत उसी के नाम करता हूं
हवा का काम है चलना दिए का काम है जलना
वो अपना काम करती है मैं अपना काम करता हूं

बिछ गया होगा…
फिर उसी ने उसे छुआ होगा
फिर उसी से निभा रही होगी
जिस्म चादर सा बिछ गया होगा
रूह सलवट हटा रही होगी

किस्सा पुराना है…
हर एक नदिया के होठों पर समुंदर का तराना है
यहां फरहाद के आगे खड़ा फिर कोई बहाना है
वही बातें पुरानी थी वही किस्सा पुराना है
तुम्हारे और मेरे बीच में फिर से जमाना है

मशहूर हैं हम भी…
स्वयं से दूर हो तुम भी स्वयं से दूर हैं हम भी
बहुत मशहूर हो तुम भी बहुत मशहूर हैं हम भी
बड़े मगरूर हो तुम भी बहुत मगरूर हैं हम भी
अत: मजबूर हो तुम भी बहुत मजबूर हैं हम भी

चूमकर माथा…
कि फिर मेरी याद आ रही होगी
फिर वो दीपक बुझा रही होगी
अपने बेटे का चूमकर माथा
वो मुझको टीका लगा रही होगी
-एजेंसी

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