कीर्ति सिंह की नई अभिव्यक्ति-“मेरे मन की….”

परंपरागत कविता से आगे नये भावबोधों की अभिव्यक्ति, नये मूल्यों और नये शिल्प का अन्वेषण है कीर्ति सिंह की ये कविता- मेरे मन की

 

मैं मान भी लूँ तेरा कहना, बातें मगर मेरे मन की हों,
हर सपना सजाऊं मैं तेरा, रातें मगर मेरे मन की हों।

बारिश मेें बूँदों की रिमझिम, पैरों मेें पायल की छन छन,
हाथों में चूड़ी सब पहनूं, वो आँगन मगर मेरे मन का हो।

चंदा आए तारे देखूं, वो रात सुहानी हो के ना हो,
बस बात मेरी सुनते रहना,  कुछ माने उसके हों के न हों।

कहते हो भूल मैं जाती हूँ,  बातें वो नयी या पुरानी हों,
कैसी भी तुम्हारी हूँ फ़िर भी, धड़कन मैं तुम्हारे दिल की हूँ।

 

तुम यहाँ नहीं पर दूर हो तुम , नज़दीक नहीं मैं दूर सही
इतना तो मुझे है कब से पता, मैं दूर सही पर पास मैं हूँ।

सब कहना सुनना ज़रूरी है, इंसान हैं हम भगवान नहीं,
अच्छा या बुरा वो जो भी हो, तुम कहते रहो मैं सुनती हूँ ।

– कीर्ति सिंह

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