Netaji सुभाष चंद्र बोस की पुण्यतिथि आज

नई दिल्‍ली। Netaji सुभाष चंद्र बोस की पुण्यतिथि आज 18 अगस्‍त को मनाई जाती है बावजूद इसके कि देश की आजादी के लिए आजाद हिंद फौज बनाने वाले Netaji सुभाष चंद्र बोस की मौत आज भी एक रहस्य बनी हुई है।

उनकी मौत को लेकर कई तरह के दावे किए गए, कई सरकारों ने आयोग बनाए और उनका सच उजागर करने को चुनावों में बड़ा मुद्दा बनाया गया। इसके बावजूद आज भी उनकी मौत एक राज की तरह ही है। न उनकी अस्थियां भारत लाई जा सकीं, न उनका पार्थिव शरीर अंतिम संस्कार के लिए मिल सका। आज की पीढ़ी देश की आजादी के इस महान नायक के बारे में कही-सुनी बातों के अलावा कुछ भी नहीं जानती है।

उनकी पुण्यतिथि पर उनसे जुड़े कुछ रोचक तथ्य- 

नेताजी सुभाष चंद्र बोस उनके परिवार में 9 वें नंबर के बच्चे थे।
नेताजी उनके बचपन के दिनों से ही एक विलक्षण छात्र थे, और राष्ट्रप्रेमी भी।
नेताजी ने आजादी की जंग में शामिल होने के लिए भारतीय सिविल सेवा की आरामदेह नौकरी ठुकरा दी। भारतीय सिविल सेवा परीक्षा में उनकी रैंक 4 थी।
जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उन्हें इस कदर विचलित कर दिया कि, वे भारत की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।
नेताजी के कॉलेज के दिनों में एक अंग्रेजी शिक्षक के भारतीयों को लेकर आपत्तिजनक बयान पर उन्होंने खासा विरोध किया, जिसकी वजह से उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया था।
1921 से 1941 के बीच नेताजी को भारत के अलग-अलग जेलों में 11 बार कैद में रखा गया।
1941 में उन्हें एक घर में नजरबंद करके रखा गया था, जहां से वे भाग निकले। नेताजी कार से कोलकाता से गोमो के लिए निकल पड़े। वहां से वे ट्रेन से पेशावर के लिए चल पड़े। यहां से वह काबुल पहुंचे और फिर काबुल से जर्मनी रवाना हुए जहां उनकी मुलाकात अडॉल्फ हिटलर से हुई।
1943 में बर्लिन में रहते हुए नेताजी ने आजाद हिंद रेडियो और फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना की थी।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस महात्मा गांधी की कई बातों और विचारों से इत्तेफाक नहीं रखते थे, और इस पर उनका मानना था कि हिंसक प्रयास के बिना भारत को आजादी नहीं मिलेगी।
नेताजी का ऐसा मानना था कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए सशक्त क्रांति की आवश्यकता है, तो वहीं गांधी अहिंसक आंदोलन में विश्वास करते हैं।
नेताजी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दो बार अध्यक्ष चुना गया था।
1939 के कांग्रेस सम्मेलन में नेताजी स्ट्रेचर पर लाद कर लाए गए. यहां उन्हें गांधीजी की ओर से प्रस्तावित अध्यक्ष पद हेतु पट्टाभि सीतारमैया से अधिक समर्थन मिला और उन्हें दोबारा अध्यक्ष पद पर चुन लिया गया।
अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने के बावजूद उन्होंने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया।
कांग्रेस पार्टी छोड़ने के बाद नेताजी ने 1939 में फॉरवर्ड ब्लॉक नामक संगठन का गठन किया।
नेताजी के मौत की गुत्थी आज भी अनसुलझी है, और यहां तक कि भारत सरकार भी उनकी मौत के बारे में कुछ नहीं बोलना चाहती।
नेताजी के मृत्यु की आज भी पुष्टि नहीं हो सकी है। उनकी जिंदगी के कई साक्ष्य और बातें रूस और भारत में देखे-सुने गए हैं।
लोगों का ऐसा मानना है कि नेताजी साल 1985 तक जीवित रहे हैं। वह भगवानजी के रूप में फैज़ाबाद के एक मंदिर में रहते थे।
ऐसा माना जाता है कि नेताजी की मौत जापान में किसी हवाई दुर्घटना में हुई थी, मगर अब तक इसका कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिल सका है।
17 मई, 2006 को पेश की गई जस्टिस मुखर्जी कमीशन की रिपोर्ट में कहा गया कि रंकजी मंदिर में पाई जाने वाली राख नेताजी की नहीं थी। हालांकि इस रिपोर्ट को भारत सरकार ने ठुकरा दिया, और यह मामला आज भी एक रहस्य ही है।

-एजेंसी

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